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    भारत-मॉरिशस ट्रेड ट्रीटी से शेयर मार्केट में आएगी स्थिरता

    भारत-मॉरिशस ट्रेड ट्रीटी से शेयर मार्केट में आएगी स्थिरता
     
    नई दिल्‍ली।मॉरिशस के पोर्ट लुइस में 10 मई, 2016 को पुराने टैक्‍स सिस्‍टम में बदलाव से जुड़ा समझौता भारत के लिए अहम है। इस समझौते से भारत को टैक्स चोरी रोकने, डबल टैक्सेशन से बचने, फॉरेन इन्वेस्टमेंट में पारदर्शिता लाने के साथ ही उसकी रफ्तार बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है। समझौते के तहत बेनिफिट क्‍लाउज में भी संशोधन किया गया है। इससे सेल कंपनियां बनाकर भारत में इन्‍वेस्‍ट करना अब शायद ही संभव होगा। अब सिर्फ मॉरिशस से ऑपरेट करने वाली सही कंपनियों को ही टैक्‍स समझौते के फायदे मिल पाएंगे। इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा यह है कि भारत को अब कैपिटल गेंस पर टैक्‍स लगाने का अधिकार मिल जाएगा, जिसकी भारत काफी समय से कोशिश कर रहा था।
     
     
    मॉरिशस समेत लगभग सभी टैक्‍स हेवंस में कैपिटल गेंस टैक्‍स काफी कम रहे हैं। मॉरिशस में तो यह टैक्‍स शून्‍य के करीब है। यही वजह है कि भारत में होने वाला लगभग 40 फीसदी इन्‍वेस्‍टमेंट मॉरिशस होकर आता है। इससे डबल टैक्‍सेशन ट्रिटी के तहत सेल कंपनियों को भारत में इन्‍वेस्‍ट करने पर इस टैक्‍स से छूट मिल जाती है। इसका घाटा भारत को होता है। ये कंपनियां भारतीय मार्केट में जब निवेश करती हैं तो मार्केट में दिवाली और होली आ जाती है और निकलती हैं तो हलचल मच जाती है। अब एक अप्रैल 2017 के बाद अक्‍वायर्ड शेयरों पर कैपिटल गेंस टैक्‍स लगने से अब इस हलचल में कमी आने से शेयर मार्केट में स्थिरता आएगी।
     
    नए समझौते के तहत मॉरिशस की सिर्फ उन कंपनियों को टैक्‍स ट्रीटी के फायदे मिलेंगे, जिनके पिछले 12 महीनों का कुल एक्‍सपेंडिचर 27 लाख से अधिक होगा। इससे कर चोरी और कर वंचन में काफी हद तक कमी आने की उम्‍मीद है।
     
    इन सबके अलावा, ट्रीटी के तहत अब दोनों मुल्‍कों के बीच जानकारियों और डाटा का एक्‍सचैंज भी होगा। इससे पी-नोट्स के जरिए इन्‍वेस्‍ट करने वालों के बारे में भी आने वाले दिनों में जानका‍री मिल पाएगी, जो अभी संभव नहीं है। यही वजह है कि भारत के राष्‍ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने पिछले दिनों कहा था कि इन्‍वेस्‍टमेंट से जुड़े डाटा की जानकारी अगर इसी तरह नहीं मिलती रही तो यह देश की सुरक्षा के लिए खतरा है। उन्‍होंने आतंकी तत्‍वों द्वारा भी इस रूट से इन्‍वेस्‍ट करने की आशंका जताई थी। इससे सिक्रेसी संबंधी प्रावधान अब कमजोर पड़ेंगे और इन्‍वेस्‍टर्स के बारे में जानकारी मिल पाएगी।
     
    हालांकि, यहां दिक्‍कत यह है कि मॉरिशस एक मात्र टैक्‍स हेवन नहीं है, जहां से एफआईआई इन्‍वेस्‍ट करते हैं। मॉरिशस के साथ यह संधि होने से इन्‍वेस्‍टर्स अब अन्‍य टैक्‍स हेंवस के जरिए भारत में इन्‍वेस्‍ट के विकल्‍प पर विचार कर सकते हैं। इसीलिए भारत सरकार को इस मामले में एक विस्‍तृत टैक्‍स व्‍यवस्‍था और समझौते पर विचार करना चाहिए।
     
    मॉरिशस के साथ इस संधि से भारत में होने वाले इन्‍वेस्‍टमेंट पर थोड़े समय के लिए भले असर दिखे, लेकिन लंबे समय के लिए यह एक अच्‍छा समझौता साबित हो सकता है।  
     
    अरुण कुमार जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर और ब्‍लैकमनी मामलों के एक्‍सपर्ट हैं।

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