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डेयरी प्रोडक्ट्स पर GST से उत्पादकों को लगेगा झटका

अन्‍य इंडस्‍ट्रीज की तुलना में भारत के दुग्‍ध उत्‍पादकों पर डेयरी सेक्‍टर से जुड़ी नीतियों का प्रत्‍यक्ष असर होता है।

the dairy sector has direct implication on the milk producers in India
 
जीएसटी से संबंधित अभी तक प्राप्‍त जानकारियों से इस बात के पर्याप्‍त संकेत हैं कि सभी उत्‍पादों पर न्‍यूनतम जीएसटी दर 18 फीसदी रह सकती है। हालांकि अभी यह साफ नहीं है कि यह दर सभी डेयरी उत्‍पादों पर लागू होगी या नहीं। लेकिन अगर प्रोसेस्‍ड डेयरी प्रोडक्‍ट्स को भी इस दायरे में लाया जाता है तो यह दुर्भाग्‍यपूर्ण होगा। क्‍योंकि अन्‍य इंडस्‍ट्रीज की तुलना में भारत के दुग्‍ध उत्‍पादकों पर डेयरी सेक्‍टर से जुड़ी नीतियों का प्रत्‍यक्ष असर होता है।
 
 
भारत में कई मामलों में दुग्‍ध उत्‍पादन की प्रकृति भी अनोखी है। यह भूमिहीन श्रमिकों के लिए सबसे अधिक रकम और सबसे अच्‍छा रोजगार देने वाला सेक्‍टर है। दूध से ग्रामीण परिवारों की कुल आय का एक-तिहाई हिस्‍सा आता है। जबकि भूमिहीन श्रमिकों के मामलों में डेयरी का योगदान उनकी कुल आय का लगभग आधा है। अनुमानित रूप से ग्रामीण परिवारों की संख्‍या 6.8 करोड़ है। इनमें से तीन-चौथाई भूमिहीन, सीमांत या फिर छोटे किसान हैं और ये दूध उत्‍पादन से जुड़े हुए हैं।
 
ग्रामीण भारत में दूध से लोगों को खाद्य सुरक्षा ही नहीं पोषण सुरक्षा भी मिलती है। अगर किसी किसान के पास दूध देने वाली एक गाय या भैंस भी है तो वह आत्‍महत्‍या नहीं करेगा। क्‍योंकि दूध उसके लिए प्रतिदिन की आय और उसके परिवार के लिए खाद्य सुरक्षा उपलब्‍ध कराता है। डेयरी सेक्‍टर से आने वाली ग्रामीण आय के वितरण में अंतर भी काफी कम है। असमानता का पैमाना- गिनी कॉ-एफिशिएंट भी इस बात की तसदीक करता है। साफ है कि दूध के स्रोत के स्‍वामित्‍व से अधिकांश ग्रामीण आबादी जुड़ी हुई है। इस सेक्‍टर से आने वाली आय से अधिकांश लोग लाभान्वित होते हैं। इससे यह भी साफ है कि इस सेक्‍टर की प्रगति से ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍था का अधिक संतुलित विकास संभव होगा।  
 
दूध कृषि पर आधारित एक मात्र ऐसा प्रोडक्‍ट है, जिसकी सबसे अधिक वैल्‍यू है। इसकी वैल्‍यू गेहूं और चावल दोनों की कुल वैल्‍यू से भी अधिक है। पिछले 25 वर्षों के दौरान दूध के उत्‍पादन में सालाना 4-4.5 फीसदी की ग्रोथ दर्ज की गई है। कृषि से आने वाली कुल आय में मवेशियों का योगदान 28-30 फीसदी है।
 
दूध खासकर शाकाहारियों के लिए प्रोटीन का सबसे बड़ा स्रोत है। लोगों की पोषण संबंधी जरूरतों के लिहाज से दूध काफी जरूरी है। बच्‍चे अपने पोषण के लिए काफी हद तक दूध पर निर्भर होते हैं। साफ है कि दूध के अधिक उत्‍पादन से किसानों के साथ ही बाकी लोगों की सेहत भी बेहतर होगी। दूध और दूध से बने प्रोडक्‍ट्स की ऊंची कीमतों का वहन कर पाना समाज के गरीब तबके से आने वाले लोगों के लिए मुश्किल होगा।
 
दूध काफी जल्‍दी खराब होता है। इसलिए, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और कन्‍वर्जन करके इसे लंबे समय तक चलने वाले प्रोडक्‍ट्स में बदलना लग्‍जरी नहीं, बल्कि जरूरत है। मिल्‍क पाउडर, बटर, घी, पनीर जैसे मिल्‍क प्रोडक्‍ट्स दूध की लाइफ बढ़ा देते हैं, और ऐसा नहीं करने पर दूध खराब हो जाता है। हालांकि मिल्‍क प्रोसेसिंग और डेयरी प्रोडक्‍ट्स की मैन्‍युफैक्‍चरिंग के लिए संयंत्रों के निर्माण में काफी अधिक पैसे खर्च होते हैं। इसी तरह, डेयरी प्रोडक्‍ट्स के उचित रखरखाव के लिए बेहद विश्‍वसनीय और मजबूत कोल्‍ड चेन की जरूरत होती है। इसलिए इन उत्‍पादों की बिक्री और वितरण के नेटवर्क पर भी काफी अधिक पूंजी लगती है।
 
इन फैक्‍टर्स पर विचार करते हुए कृषि उत्‍पादों की तरह मिल्‍क प्रोडक्‍ट्स को भी एक्‍साइज ड्यूटी, सेल्‍स टैक्‍स और ऐसे अन्‍य टैक्‍स से मुक्‍त करना उचित कदम होगा। सरकार अगर ऐसा करती है तो उसका गंभीर असर इंडियन डेयरी इंडस्‍ट्री की ग्रोथ पर होगा।  
 
वर्तमान कर व्‍यवस्‍था के अनुसार कच्‍चे दूध, पास्‍चुराइज्‍ड–पैकेज्‍ड दूध, दही, छाछ, लस्‍सी और इनके वैरिएंट जैसे फ्रेश डेयरी प्रोडक्‍ट्स पर कोई टैक्‍स नहीं लगता है। महज कुछ राज्‍यों में र्स्‍टलाइज्‍ड-स्‍वीटेंड-फ्लेवर्ड मिल्‍क को छोड़कर सभी डेयरी प्रोडक्‍ट्स पर एक्‍साइज ड्यूटी लगती है। उत्‍तर प्रदेश और राजस्‍थान को छोड़कर देशभर में घी पर लगी मंडी फीस को भी खत्‍म कर दिया गया है। इन दोनों राज्‍यों में भी इसे कम करके महज दो फीसदी कर दिया गया है। मिल्‍क पाउडर पर वैट 2-5 फीसदी, चक्‍का (श्रीखंड के लिए बुनियादी कच्‍ची सामग्री), टेबी बटर, क्रीम, कार्टून में पैक्‍ड यूएसटी मिल्‍क पर पांच फीसदी है।
 
जीएसटी- वैट, एक्‍साइज ड्यूटी, चुंगी, एंट्री टैक्‍स, मंडी फीस, सेस आदि के बदले एक मात्र टैक्‍स का रूप लेने जा रही है। अपुष्‍ट रिपोर्टों के मुताबिक मिनिमम जीएसटी रेट 18 फीसदी प्रस्‍तावित है। केंद्र सरकार ने सभी तरह के टैक्‍स पर विचार करते हुए इसे तय किया है। डेयरी इंडस्‍ट्री को अगर कृषि का दर्जा और डेयरी प्रोडक्‍ट्स को प्रोसेस्‍ड फूड्स के बदले कृषि उत्‍पाद का दर्जा दिया जाए तो यह इस सेक्‍टर के लिए काफी लाभदायक होगा।
 
ऊंची जीएसटी रेट अगर लागू होती है तो उसका दुग्‍ध उत्‍पादकों पर प्रत्‍यक्ष असर होगा। डेयरी शायद एक मात्र इंडस्‍ट्री है जहां कंज्‍यूमर से ली जाने वाली कीमत का लगभग 70 फीसदी हिस्‍सा दुग्‍ध उत्‍पादक को दिया जाता है। भारत की कोई भी फूड प्रोसेसिंग इंडस्‍ट्री किसानों की इस तरह की ऊंची उम्‍मीदों पर खरा उतरने में सक्षम नहीं है। वास्‍तव में अधिकांश वैसे देशों में जहां की डेयरी इंडस्‍ट्री डेवलप है, वहां कंज्‍यूमर द्वारा चुकाई जाने वाली रकम की 35 फीसदी से अधिक राशि दुग्‍ध उत्‍पादकों को नहीं दी जाती है। इसलिए आशंका है कि जीएसटी दर ऊंची होने से दुग्‍ध उत्‍पादकों को मिलने वाली दूध की कीमतें कम हो सकती हैं।
 
जीएसटी की दर ऊंची होने से डेयरी प्रोडक्‍ट्स की कीमतें भी अधिक हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में उपभोक्‍ता प्रोसेस्‍ड डेयरी फूड्स के साथ ही दूध की खपत कम करने के लिए बाध्‍य हो सकते हैं। ऐसे में अगर कंज्‍यूमर परंपरागत वेंडर की तरफ रुख करते हैं तो संगठित डेयरी सेक्‍टर जो लगातार वेंडर्स के मार्केट पर कब्‍जा करता आ रहा है, उसका आकार और पहुंच कम हो जाएगी। इससे कॉपरेटिव्‍स समेत संगठित डेयरी सेक्‍टर के विस्‍तार और निवेश प्रभावित होंगे।
 
साफ तौर पर जीएसटी की ऊंची दर दुग्‍ध उत्‍पादकों को दूध के बदले मिलने वाली रकम को कम कर देगी। ऐसे में दुग्‍ध उत्‍पादकों के लिए गायों और भैंसों का प्रबंधन मुश्किल हो जाएगा। दुग्‍ध उत्‍पादन बढ़ाने के लिए मवेशियों की खरीद में निवेश से वे हिचकिचाएंगे। ऐसे में डेयरी इंडस्‍ट्री को जीएसटी के दायरे में लाने के मामले में थोड़ा नरम रवैया अपनाना जरूरी है। सरकार को यहां किसानों के हितों से जुड़ी नीति अपनानी चाहिए।
 
सरकार को सभी तरह के लिक्विड मिल्‍क, र्स्‍टलाइज्‍ड मिल्‍क्‍स, दही, छाछ, लस्‍सी, श्रीखंड, पनीर आदि पर जीएसटी नहीं लगानी चाहिए। इसके बदले सभी डेयरी प्रोडक्‍ट्स पर चार फीसदी जीएसटी लगाने के लिए एक अलग कैटेगरी बनानी चाहिए। डेयरी से टैक्‍स के रूप में आने वाली कम रकम को घाटा नहीं समझकर एक तरह का निवेश मानना चाहिए। क्‍योंकि इससे दूध उत्‍पादन बढ़ने के साथ ही राष्‍ट्रीय खाद्य और पोषण संबंधी सुरक्षा सुनिश्चित होने के साथ ही ग्रामीण खुशहाली भी बढ़ेगी।
 
डॉ आर एस खन्‍ना इंटरनेशनल डेयरी कंसलटेंट हैं।
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