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    Outlook 2016: डेयरी इंडस्‍ट्री की 5% हो सकती है ग्रोथ रेट

    Outlook 2016: डेयरी इंडस्‍ट्री की 5% हो सकती है ग्रोथ रेट
     
     
    भारतीय डेयरी इंडस्‍ट्री आज कई तरह की समस्‍याओं का सामना कर रही है। लगातार दूसरे साल कमजोर मानसून रहने से जहां इसकी ग्रोथ को धक्‍का लगा है। वहीं सरकार द्वारा सब्सिडी को सिर्फ कॉपरेटिव्‍स तक सीमित रखने से प्राइवेट इंडस्‍ट्री के लिए मार्केट और खराब हो गया है। इससे एक्‍सपोर्ट के मोर्च पर भी इस सेक्‍टर की स्थिति कमजोर हुई है। डेयरी इंडस्‍ट्री के समक्ष एक तरफ प्रोडक्‍शन बढ़ाने की तो दूसरी तरफ सरप्‍लस प्रोडक्‍शन के बेहतर उपयोग की चिंता है। इन सबके बावजूद इस सेक्‍टर की ग्रोथ इस साल पांच फीसदी को छूट सकती है। 
     
     
    वर्ष 2015 घरेलू और अंतरराष्‍ट्रीय दोनों डेयरी इंडस्‍ट्री के लिए बेहद उथल-पुथल भरा रहा। हालांकि, दिसंबर में वर्ल्‍ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (डब्‍ल्‍यूटीओ) की नैरोबी मिनिस्‍टीरियल कॉन्‍फ्रेंस से इस इंडस्‍ट्री के लिए कुछ अच्‍छी खबर जरूर निकलकर सामने आई। पहली दफा डब्‍ल्‍यूटीओ ने सदस्‍य देशों के लिए सब्सिडी हटाने और कृषि उत्‍पादों के फ्री ट्रेड को बढ़ावा देने जैसे मामले को कानूनी रूप से बाध्‍यकारी बना दिया। भारतीय किसानों, खासकर दुग्‍ध उत्‍पादकों के लिए यह अच्‍छी खबर है।
     
    अमेरिका, ईयू और कनाडा में दुग्‍ध उत्‍पादकों को 15 अरब डॉलर, 11 अरब डॉलर और 6 अरब डॉलर की सब्सिडी दी जाती है। जबकि भारत में 2014-15 के दौरान 65 अरब डॉलर मूल्‍य के कुल 14.1 करोड़ टन दूध का उत्‍पादन हुआ। साफ है कि विकसित देशों द्वारा सब्सिडी वापस लेने से भारतीय दुग्‍ध उत्‍पादक इन देशों की प्रतिस्‍पर्द्धा में उतर सकेंगे। इससे 2015 में मिल्‍क प्रोडक्‍ट्स की अंतरराष्‍ट्रीय कीमतों में आई तेज गिरावट के बाद इंटरनेशनल एक्‍सपोर्ट मार्केट का रिवाइवल संभव होगा और भारतीय उत्‍पादकों की हिस्‍सेदारी बढ़ेगी।
     
    2013 के दौरान इंटरनेशनल डेयरी ट्रेड में स्किम मिल्‍क पाउडर (एसएमपी) की कीमतें प्रति टन 4200 अमेरिकी डॉलर थीं। लेकिन 2015 में भारी गिरावट के साथ कीमतें प्रति टन 1320 डॉलर पर आ गईं। हालांकि 2015 के दिसंबर में कीमतें थोड़ी बढ़कर प्रति टन 2400 डॉलर के करीब पहुंचने में सफल रहीं। भले ही भारत एक क्‍लोज्‍ड डोमेस्टिक डेयरी इकोनॉमी है, इसके बावजूद अंतरराष्‍ट्रीय कीमतों का उस पर असर होता है।
     
    2013-14 में भारत का डेयरी एक्‍सपोर्ट 3318.57 करोड़ रुपए का था। 2014-15 में यह कम होकर 1205.40 करोड़ रुपए का रह गया। इसी तरह 2015 के अप्रैल-सितंबर के दौरान एक्‍सपोर्ट में भारी कमी दर्ज की गई और यह 355.57 करोड़ रुपए का दर्ज किया गया। इसका एक बड़ा कारण यह है कि इंटरनेशनल मार्केट की तुलना में भारत में डेयरी कमोडिटी की कीमतें काफी अधिक हैं। इन सबके अलावा, भारत का एक्‍सपोर्ट सिर्फ वैल्‍यू एडेड ब्रांडेड डेयरी प्रोडक्‍ट्स तक ही सीमित है।
     
    भारत में मिल्‍क पाउडर का सरप्‍लस स्‍टॉक है, इसके बावजूद देश से एक्‍सपोर्ट सीमित ही रहा है। अनुमानित रूप से प्राइवेट सेक्‍टर डेयरी प्‍लांट्स के पास 50,000-60,000 टन एसएमपी और डेयरी कॉपरेटिव्‍स के पास 120,000-140,000 टन एसएमपी एक्‍सपायर होने के करीब हैं। सेंट्रल डिपार्टमेंट ऑफ डेयरी डेवलपमेंट ने 2015 के अक्‍टूबर में कॉपरेटिव डेयरी को एसएमपी की रीप्रोसेसिंग के लिए 176 करोड़ रुपए दिए। यह सब्सिडी वास्‍तविक रीप्रोसेसिंग कॉस्‍ट तक सीमित है, जो 25 रुपए प्रतिकिलो एसएमपी से अधिक नहीं हो सकती है। और यह सब्सिडी भी तब मिलेगी जब राज्‍य भी इतनी राशि दे और दुग्‍ध उत्‍पादक दूध की लगातार खरीद करते रहें।
     
    सब्सिडी के मामले में डेयरी एक्‍सपर्ट का मानना है कि इस तात्‍कालिक राहत से इस इंडस्‍ट्री को फायदा नहीं होगा। उल्‍टा सब्सिडी को कॉपरेटिव्‍स तक सीमित रखने से प्राइवेट इंडस्‍ट्री के लिए मार्केट और खराब हो जाएगा। प्राइवेट इंडस्‍ट्री भी लगभग कॉपरेटिव्‍स के बराबर ही मिल्‍क की प्रोसेसिंग करती है। इसके अलावा, एसएमपी की शेल्‍फ लाइफ सुधारना भी आसान नहीं है। डेयरी प्‍लांट्स को एक्‍सपायर करने जा रहे एसएमपी की शेल्‍फ लाइफ बढ़ाने के लिए 80-85 फीसदी ताजे दूध की जरूरत होती है। साफ है कि एक्‍सपायर करने जा रहे एसएमपी को उपयोगी बनाने के लिए कॉपरेटिव्‍स को वर्तमान स्‍टॉक से 5-7 गुना अधिक स्‍टॉक का निर्माण करना होगा। इससे रिवाइव होने के बदले यह सेक्‍टर और अधिक मंदी की चपेट में आ जाएगा। बेहतर होता अगर सब्सिडी का उपयोग एक्‍सपोर्ट को रिवाइव करने के लिए होता।
     
    2015 में महाराष्‍ट्र समेत देश के कई हिस्‍सों में सूखे की स्थिति रही। इसके बावजूद राज्‍य में दूध का उत्‍पादन अच्‍छा रहा। इसकी वजह यह भी रही कि खराब फसल का उपयोग लोगों ने मवेशियों के चारा के रूप में किया। इसके अलावा फसल खराब होने से किसानों ने दुग्‍ध उत्‍पादन पर अधिक ध्‍यान दिया। इन वजहों से दूध के उत्‍पादन में इजाफा हुआ।
     
    2015 के आखिर में एसएमपी और अधिक बढ़ रहा था और दूध के उत्‍पादन में भी इजाफा दर्ज किया गया। एसएमपी की घरेलू कीमत पहले ही गिरकर 145 रुपए प्रतिकिलो पर पहुंच गई है। ऐसे में 2016 में प्रतिकिलो 25-30 रुपए की एक्‍सपोर्ट सब्सिडी देने से 2015 के स्‍टॉक्‍स को खत्‍म करने में मदद मिलेगी। सब्सिडी से एक्‍सपोर्ट प्रतिस्‍पर्द्धी होगा और इंडस्‍ट्री मजबूत होगी।
     
    2016 का आउटलुक कई सारे फैक्‍टर्स पर निर्भर करता है। इनमें सबसे अहम मानसून है। अच्‍छी बात यह है कि 2015 के आखिरी क्‍वार्टर में दक्षिणी भारत में बारिश ठीकठाक रही, जिससे दूध का उत्‍पादन अच्‍छा रह सकता है। हालांकि अभी तक प्राप्‍त संकेतों से साफ है कि 2016 में भी मानसून सामान्‍य से कम रहेगा। लगातार कमजोर मानसून से मवेशियों का चारा और कम हो सकता है। दुग्‍ध उत्‍पादन पर इसके असर से इंकार नहीं किया जा सकता है। लेकिन देशभर में अलग-अलग असर होने से 2016 में भी दुग्‍ध उत्‍पादन में 3-4 फीसदी की वृद्धि की उम्‍मीद की जा रही है।
     
    केंद्र और राज्‍य सरकारों ने दुग्‍ध उत्‍पादन में इस साल 3.5-4.5 फीसदी के इजाफा का अनुमान व्‍यक्‍त किया है। पिछले चार दशक से यह ग्रोथ रेट लगभग एक समान है। जबकि पिछले एक दशक के दौरान गायों की क्रॉसब्रीडिंग में इजाफा के कारण माना जा रहा है वार्षिक ग्रोथ रेट 5 फीसदी से भी अधिक हो सकती है। दूध उत्‍पादन का भूमिहीन और सीमांत किसानों समेत देश के 15 करोड़ से अधिक दुग्‍ध उत्‍पादकों की जीविका पर सीधा असर होता है। तमाम समस्‍याओं के बावजूद भारत दुनिया का सबसे बड़ा दुग्‍ध उत्‍पादक देश है और 2020 तक उत्‍पादन के लगभग 181 एमएमटी हो जाने का अनुमान है।
     
    भले ही यह अनपटा लगता हो, लेकिन सच यह है कि भारतीय डेयरी सेक्‍टर के समक्ष आज ‘सरप्‍लस मिल्‍क’ का बेहतर उपयोग भी एक समस्‍या है। इसके लिए संस्‍थागत व्‍यवस्‍था करने की जरूरत है। इस मामले में अधिकांश विकसित देशों ने स्‍कीम बना रखी है। उदाहरण के लिए, ईयू ‘प्राइवेट स्‍टोरेज ऐड (पीएसए)’ नाम से एक स्‍कीम चलाता है। इसी तरह की स्‍कीम अमेरिका में भी चल रही है। भारत में भी इस तरह की स्‍कीम ईजाद करने की जरूरत है। लेकिन भारत में डेयरी सेक्‍टर के सपोर्ट के लिए इस तरह की कोई स्‍कीम नहीं बनाई गई है।
     
    भारत में प्राइवेट और कॉपरेटिव दोनों तरह के डेयरी प्‍लांटों को अपने संसाधन की व्‍यवस्‍था करने के लिए छोड़ दिया गया है। कुछ राज्‍यों में कॉपरेटिव डेयरी प्‍लांट स्थिति से निपटने के लिए वहां की सरकार से कुछ फंड और सब्सिडी लेने में सफल रहे हैं। जबकि प्राइवेट डेयरी प्‍लांट के लिए अभी भी मदद के नाम पर कुछ भी उपलब्‍ध नहीं है। यह स्थिति तब है, जब अनाजों और शुगर के लिए एमएसपी की घोषणा की जाती है।
     
    दूध के लिए भले ही एमएसपी की घोषणा नहीं की जा सकती है, लेकिन एसएमपी के बफर स्‍टॉक का निर्माण करके स्थिति को बेहतर बनाया जा सकता है। सरप्‍लस उत्‍पादन को देखते हुए सरकार नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड का निर्माण कर सकती है। इससे 50-60 हजार टन एसएमपी के स्‍टॉक के साथ 8-10 हजार टन व्‍हाइट बटर का स्‍टॉक बनाया जा सकता है। इसके अलावा, भारत सरकार को डेयरी प्रोडक्‍ट्स के एक्‍सपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए वर्तमान सब्सिडी प्रोग्राम को भी जारी रखने की जरूरत है। सब्सिडी रोकने से इस सेक्‍टर को धक्‍का लगता है, जिससे यह सेक्‍टर अपने ब्रांड के एक्‍सपोर्ट और प्रमोशन की योजना बनाने में कामयाब नहीं हो पा रहा है।
     
    डॉ आर एस खन्‍ना इंटरनेशनल डेयरी कंसलटेंट हैं। 

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