कृषि को नजरअंदाज करने के चलते बीते साल हुआ 1.5 लाख करोड़ का नुकसान

वि‍जय सरदाना

Jan 06,2017 12:58:00 PM IST
फूड इन्फ्लेशन, बढ़ते इंपोर्ट और घटते एक्सपोर्ट के चलते भारत के एग्रीकल्चर सेक्टर को भारी नुकसान हो रहा है। डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स के मुताबिक, 2014-15 से 2015-16 के बीच कृषि उत्पादों का आयात 19,873 करोड़ रुपए बढ़ गया है। इसी दौरान 25, 832 करोड़ रुपए के कृषि उत्पादों का एक्सपोर्ट मार्केट भारत से हाथों से चला गया। गैर असरदार कृषि और खाद्य सुरक्षा नीतियों के चलते महज एक साल में देश को 45,706 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ रहा है। अगर आप इसमें 30 फीसदी की अनाज की बर्बादी भी जोड़ दें तो ये रकम 1 लाख करोड़ रुपए बैठती है। अगर सभी आंकड़ों को एक जगह रखें तो एग्रीकल्चर सेक्टर की अनदेखी के चलते बीते साल में भारत को तकरीबन डेढ़ लाख करोड़ का घाटा सहन करना पड़ा।
इसके अलावा किसानों को फसल का वाजिब दाम न मिलना भी एक तरह का घाटा है जो कृषि समाज और इकोनॉमी ने उठाया। यह रकम उस कालेधन से कहीं ज्यादा है, जो हम भारतीय इकोनॉमी में मान कर चल रहे थे। इकोनॉमी के बाकी सेक्टरों और पब्लिक हेल्थ पर फूड इन्फ्लेशन के असर को तो अभी जोड़ा ही नहीं किया गया है। भारत में कालेधन से नि‍पटने के लि‍ए नोटबंदी जैसा भारी भरकम फैसला ले लि‍या गया तो क्‍या अब हम यह उम्‍मीद कर सकते हैं कि‍ देश में कृषि‍ और खाद्य सुरक्षा के जुड़े मुद्दों के हल के लि‍ए भी कुछ इसी तरह का एक्‍श्‍न लि‍या जाएगा ?
इकोनॉमि‍क ग्रोथ का संबंध सीधे सीधे फूड इनफ्लेशन से होता है। जहां फूड इनफ्लेशन ज्‍यादा होगा इकोनॉमि‍क ग्रोथ घटेगी क्‍योंकि‍ इसके चलते खाने पीने के अलावा की चीजों पर खर्चा घट जाता है। आने वाले वक्‍त में हमारी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती ये होगी कि‍ पैदावार को कैसे बेहतर कि‍या जाए और अनाज की बर्बादी रुके।
2025 में भारत की जरूरत क्‍या होगी?
फूड एंड एग्रीकल्‍चर ऑर्गनाइजेशन, एफएओ की स्‍टडी के मुताबि‍क, भारत में अभी हर शख्‍स को तकरीबन 525 ग्राम अनाज हर दि‍न मि‍लता है। वहीं चीन में यह 980 और अमेरि‍का में 2850 ग्राम। भारत की प्रति‍व्‍यक्‍ति‍ आय में बढ़ोतरी होने के साथ अगर उपभोग 650 ग्राम तक भी पहुंच जाता है तो सन 2025 में हमें कुल 39 करोड़ टन अनाज की जरूरत होगी। अगर डब्‍ल्‍यूएचओ के मानकों के हि‍साब से देखें तो दालों के मामले में भारत को 2025 तक 3.5 करोड़ टन दालों की जरूरत होगी। इसी तरह से हमें 2.38 करोड़ टन खाने वाले तेल की जरूरत पड़ेगी।
इसके लि‍ए भारत को क्‍या करना होगा?
अगर हमारी पैदावार का लेवल यही रहा तो 2030 में अपनी जरूरतों को पूरा करने के लि‍ए भारत को दोगुनी जमीन पर खेती करनी होगी। अब हमारे सामने यही ऑप्‍शन है कि‍ हम अपनी प्रोडक्‍टीवि‍टी को दोगुना करें या फि‍र दूसरे सोर्स की तलाश करें। आने वाले वक्‍त में खाने की कमी न पड़े इसके लि‍ए हमें हर साल अपनी पैदावार को मजबूत करना होगा। एक अनुमान के मुताबि‍क, हमें हर साल दालों के प्रोडक्‍शन में तकरीबन 15.2 लाख टन की बढ़ोतरी करनी होगी। इसी तरह से गेहूं के उत्‍पादन में 4.1, चावल में 34.1 और दूध के उत्‍पादन में 23.8 लाख टन प्रति‍वर्ष बढ़ोतरी करनी होगी।
पॉलि‍सी मेकर्स को क्‍या करना चाहि‍ए
1 सबसे पहले तो हमें राजनीति‍क बयानबाजी से ऊपर उठते हुए इस फैक्‍ट को स्‍वीकार करना चाहि‍ए कि‍ सि‍चुएशन कंट्रोल में नहीं है। जि‍स तरह से प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का फैसला लि‍या है उसी तरह से प्रधानमंत्री को नेशनल फूड सि‍क्‍योरि‍टी को भी अपने टॉप एजेंडा में शामि‍ल करना चाहि‍ए।
2 जीएसटी से मि‍ली सीख को देखते हुए हमें नेशनल फूड सि‍क्‍योरि‍टी काउंसि‍ल बनानी चाहि‍ए क्‍योंकि‍ खेती राज्‍य का सब्‍जेक्‍ट है इसलि‍ए जब तक राज्‍य इसे लेकर गंभीर नहीं होंगे तब तक केंद्र की पहल का कोई खास मायने नहीं रखेगी।
3 महज एग्रीकल्‍चर पॉलि‍सी की बजाए नेशनल एग्रीकल्‍चर पॉलि‍सी डेवलप करें और एग्रीकल्‍चर यूनि‍वर्सि‍टी को अपने अपने इलाके में पैदावार बढ़ाने की जि‍म्‍मेदारी दी जाए।
4 नीति‍ आयोग को हर राज्‍य के हि‍साब से एक्‍शन प्‍लान बनाना चाहि‍ए और हर ति‍माही इसकी प्रगति‍ रि‍पोर्ट तैयार करनी चाहि‍ए ताकि‍ हम टाइम और संसाधनों की बर्बादी रोक सकें।
5 अंदाजा लगाकर देखें कि‍ पि‍छले एक साल में हमनें जितना रेवन्‍यु लॉस उठाया है अगर उसका 50 फीसदी भी कृषि‍ के वि‍कास में नि‍वेश कर दि‍या जाता तो हम 5000 करोड़ रुपये हर साल बचा पाते।
(लेखक इंटरनेशनल एग्री फूड बि‍जनेस और बायो इकोनॉमि‍क्‍स के एक्‍सपर्ट हैं )
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