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सरकार को किसानों की फिक्र ही नहीं है

किसानों की समस्याा और सरकार के रवैये पर प्रस्तुुत है कृषि अर्थशास्त्री देवेंदर शर्मा का लेख

Agri Economist Devender Sharma wrote a article for money bhaskar
 
 
मध्‍यप्रदेश और महाराष्‍ट्र में आंदोलन के बाद से एक बा‍र फिर किसानों के बारे में बहस का सिलसिला शुरू हो गया है। हालांकि अब दोनों राज्‍यों की सरकारों ने कि‍सानों का कर्ज माफ करने का वादा कर रही है, लेकिन अभी भी कई मुद्दे पीछे छूट रहे हैं। जिन पर सरकार बात तक करने को तैयार नहीं है। फसलों के न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य को लेकर सरकार पहले ही हाथ खड़े कर चुकी है। कि‍सानों को उनकी लागत के हि‍साब से फसलों के दाम उपलब्‍ध कराने को सरकार तैयार नहीं है।
 
कि‍सानों पर फोकस ही नहीं है
 
कि‍सान और उनकी समस्‍याएं सरकार के फोकस एरि‍या में है ही नहीं। 11वीं पंचवर्षीय योजना में एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर के लि‍ए कुल 1 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान कि‍या गया। इसी तरह से 12वीं पंचवर्षीय योजना में कुल 1.5 लाख करोड़ इनवेस्‍टमेंट का प्‍लान है। वहीं, अगर आप सीएजी की रि‍पोर्ट देखें तो दि‍ल्‍ली एयरपोर्ट के नि‍र्माण में ही 1.62 लाख करोड़ की गड़बड़ी की बात कही गई है। जबकि एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर से जुड़ी 60 करोड़ जनता के लि‍ए आप 1 से 1.5 लाख करोड़ का इनवेस्‍टमेंट करते हैं। इस तरह की इकोनॉमि‍क पॉलि‍सी से कि‍सानों का कैसे भला होगा।
 
सरकार कंज्‍यूमर के बारे में सोचती है
 
सरकार की नीति‍यों के चलते समाज के दो वर्गों में रि‍फ्ट पैदा हो रहा है। सरकार महंगाई को कंट्रोल करने और कंज्‍यूमर को खुश करने या उसे शांत करने के लि‍ए कि‍सान का गला घोंट रही है। आर्थि‍क नीति‍यां ही इस सोच के साथ बनाई जाएंगी तो कि‍सानों के अपनी फसल के सही दाम नहीं मि‍ल पाएंगे।
 
ई नाम नया नहीं है
 
केंद्र सरकार ने कुछ समय पहले किसानों को खुश करने के लिए ई-नाम (E NAM) लॉन्च किया, लेकिन यह कॉन्‍सेप्‍ट नया नहीं है। इससे पहले मध्‍यप्रदेश में ई चौपाल आई थी। कई अर्थशास्‍त्रि‍यों ने इसके गुणगान कि‍ए थे, मगर आज कोई ई चौपाल की बात नहीं करता। ई चौपाल का मकसद भी वही था जो आज ई-नाम का है। हालांकि‍ अब वक्‍त बदल रहा है। अगर लोगों को कि‍सानों की समस्‍याओं के बारे में बताया जाए तो वो उसे समझेंगे।  
 
(लेखक देवेंदर शर्मा कृषि अर्थशास्‍त्री हैं) 
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