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सुझाव /जीएसटी की खामियां दूर करने पर काम करे सरकार

  • बजट ऐसे समय में प्रस्तुत किया जाने वाला है जब भारतीय अर्थव्यवस्था तीव्र मंदी के दौर से गुजर रही है

Moneybhaskar.com

Jan 24,2020 01:34:21 PM IST

नई दिल्ली. भारत नए साल में अपने पहले सबसे बड़े वित्तीय कार्यक्रम-केंद्रीय बजट 2020 के लिए खुद को तैयार कर रहा है, ऐसे में 1 फरवरी, 2020 को सभी की निगाहें वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण पर होंगी, जब वह संसद में अपना दूसरा बजट पेश करेंगी। बजट ऐसे समय में प्रस्तुत किया जाने वाला है जब भारतीय अर्थव्यवस्था तीव्र मंदी के दौर से गुजर रही है तथा 2019-20 की जुलाई-सितंबर की तिमाही में जीडीपी गिरकर 4.5% तक पहुंच गया। लगातार पांच तिमाहियों के दौरान आर्थिक विकास में गिरावट के साथ, वर्ष 2024 तक भारतीय अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने के सपने को साकार करने के लिए अत्यंत कठिन प्रयास करना होगा।

नीति-निर्माताओं और हितधारकों के लिए पूरी एकाग्रता के साथ प्रयास करना जरूरी है

घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मोर्चों पर सरकार को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है तथा वह हाथों में लिए गए इस कार्य की गंभीरता से अच्छी तरह अवगत है। सरकार ने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए नीति-निर्माताओं और हितधारकों के बीच पूरी एकाग्रता के साथ प्रयासों का आह्वान किया है। अर्थव्यवस्था के सभी प्रमुख क्षेत्रों को मंदी से उबारने, उपभोग को बढ़ावा देने तथा निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए कठिन प्रयासों की आवश्यकता है।

बजट में ज्यादा ध्यान दिए जाने वाले क्षेत्र

  • हालांकि वर्ष 2020 का बजट भारतीय अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाने की महत्वाकांक्षी योजना के लिए रूप-रेखा निर्माण का अवसर देता है, लेकिन ऐसा करने के लिए सबसे पहले ऑटो सेक्टर को पुनर्जीवित करने पर विशेष ध्यान दिया जाना बेहद जरूरी है। 2018-19 में देश की जीडीपी में 7.5% का योगदान देने वाला यह सेक्टर, साल 2019 को कभी याद नहीं करना चाहेगा।
  • सोसाइटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के अनुसार पिछले साल देश में कार की बिक्री में 19% की गिरावट दर्ज की गई, साथ ही कमजोर मांग के कारण मौजूद वित्त-वर्ष में बिक्री मंद रहने की उम्मीद है और उत्सर्जन हेतु सख्त मानदंडों को लागू किए जाने की वजह से क़ीमतों में वृद्धि सुनिश्चित है।

  • इस क्षेत्र में मंदी के विषय पर काफी परिचर्चा हो चुकी है, और बजट 2020 में इस समस्या के समाधान को शामिल किया जाना चाहिए। रियल एस्टेट सेक्टर की तर्ज पर ऑटो सेक्टर को प्रोत्साहन देने से खरीदारों और निर्माताओं का भरोसा फिर से हासिल किया जा सकेगा जिसकी बेहद जरूरत है, साथ ही इस प्रक्रिया से मंदी के दौर से गुजर रही अर्थव्यवस्था को ऊपर उठाने में भी मदद मिलेगी। उल्लेखनीय है कि, पिछले साल सरकार ने संघर्षरत रियल एस्टेट सेक्टर के लिए 25,000 करोड़ रुपए के वैकल्पिक निवेश कोष (एआईएफ) की स्थापना की और खरीदारों को घरों के समय पर वितरण को सुनिश्चित किया।

  • गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) द्वारा सामना किए गए क्रेडिट संकट से निपटना, आगामी बजट में ध्यान दिए जाने वाले प्रमुख क्षेत्रों में शामिल रहेगा। क्रेडिट रेटिंग में गिरावट के साथ-साथ 2018 के अंत में IL&FS कंपनी के डूबने के बाद तो इस क्षेत्र के लिए तरलता संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है, जिसमें फंड मैनेजर्स को बड़े पैमाने पर ऋणमुक्ति हेतु मोचन अनुरोध किए जा रहे हैं। भारत में कुल ऋण में NBFCs का योगदान लगभग 20% है, जिसे देखते हुए इस क्षेत्र में तरलता संकट की स्थिति अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है, विशेष रूप से छोटे एवं मध्यम आकार के व्यवसायों (SMEs) के लिए, जो पूंजी जुटाने के लिए इन वैकल्पिक ऋणदाताओं पर निर्भर हैं। इसलिए, बजट में इस समस्या का समाधान निकालने के साथ-साथ इस क्षेत्र में धन के प्रवाह को सुव्यवस्थित करने के लिए भी प्रावधान करना चाहिए।

  • इस बार के बजट में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की खामियों को दूर करने पर भी ध्यान दिया जाएगा। जीएसटी को 1 जुलाई, 2017 से लागू किया गया और उसके बाद से ही यह जीएसटी परिषद के जांच के दायरे में है, और तब से लेकर आज तक यह सुनिश्चित करने के लिए इसमें कई बदलाव यह गए हैं कि इसे सभी के लिए अनुकूल बनाया जा सके। हालांकि, शुरुआती कई महीनों तक जीएसटी का संग्रहण बेहद सामान्य रहा जिससे सरकारी खजाने पर दबाव बढ़ गया। अगले कुछ महीनों में और आने वाले वित्त-वर्ष में भी जीएसटी संग्रहण में सुधार की संभावना नहीं दिखाई दे रही है। अनुमानों के अनुसार, सरकार इस वित्त-वर्ष में जीएसटी संग्रहण के अपने लक्ष्य से 50,000 करोड़ रुपए पीछे रह सकती है। कई बार संशोधित किए जाने के बावजूद, जीएसटी का अनुपालन अभी भी व्यवसायों के लिए एक चुनौती बना हुआ है, और इसलिए वित्त मंत्री को जीएसटी के अनुपालन को आसान एवं सरल बनाने वाले समाधान प्रस्तुत करने की आवश्यकता है। सभी दरों पर जीएसटी में कटौती के साथ एक सरलीकृत जीएसटी से दोनों पक्षों के लिए स्थिति फायदेमंद होगी। इस तरह अधिकाधिक संख्या में व्यवसायों को अपने जीएसटी रिटर्न को आसानी से दर्ज करने की सुविधा मिलेगी, साथ ही सरकार के राजकोष में अपेक्षा के अनुरूप धनराशि भी जमा होगी।

आम आदमी के लिए विशेष ध्यान दिए जाने वाले क्षेत्र

  • आम आदमी के नजरिए से देखा जाए, तो किसी भी बजट के बाद हर व्यक्ति सबसे पहले आयकर के स्लैब पर ध्यान देता है और इस बार भी कहानी कुछ ऐसी ही होगी। ऐसी आशंका जताई जा रही है कि, कॉरपोरेट टैक्स में कटौती के बाद आयकर स्लैब में भी बड़ा बदलाव देखा जा सकता है।

  • व्यक्तिगत आयकर के पूरी तरह निरीक्षण हेतु गठित अखिलेश रंजन टास्कफोर्स अपने सुझावों के साथ-साथ नए प्रत्यक्ष कर संहिता पर अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है, जिसे अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। अगर खबरों की मानें तो इस रिपोर्ट में बड़े पैमाने पर बदलाव का प्रस्ताव दिया गया है, और इस बड़े बदलाव के बाद आयकर के स्लैब का दायरा भी बढ़ेगा।
  • उपभोग को प्रोत्साहन देने के लिए, आयकर दरों में कटौती की जा सकती है। हालांकि, लोगों द्वारा अतिरिक्त धन खर्च नहीं किए जाने की स्थिति में सरकार की व्यय क्षमता प्रभावित हो सकती है, और इस तरह कई मौजूदा परियोजनाओं और योजनाओं पर रोक लग सकती है।

गौरतलब है कि, जून-सितंबर 2019 की तिमाही में कॉर्पोरेट टैक्स को 30% से घटाकर 22% तक लाने के बाद कंपनियों के मुनाफे में 11% की वृद्धि देखी गई, फिर भी अतिरिक्त धनराशि के व्यय का मार्ग अभी तक नहीं निकल पाया है। इस प्रकार, करों में कटौती को अमल में लाकर वित्त-मंत्री संतुलन स्थापित कर सकती हैं, साथ ही इस बात को सुनिश्चित करने हेतु प्रावधान किया जाना भी जरूरी है कि इसका सरकारी खजाने पर कोई प्रभाव नहीं पड़े।

लेखक- राहुल जैन, हेड, पर्सनल वेल्थ एडवाइजरी, एडलवाइज

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