जानकारी /लिव-इन में रह रही महिलाओं के पास होते हैं कई अधिकार, जरूर जानें

  • सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक लिव-इन रिलेशनशिप न अपराध है और न ही पाप।

Moneybhaskar.com

Dec 06,2019 04:22:36 PM IST

नई दिल्ली. शादी के बंधन में बंधे बिना पति-पत्नी की तरह यानी लिव-इन रिलेशन में रहने का चलन तेजी से बढ़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसको कानूनी मान्यता दे दी है। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, लिव-इन रिलेशनशिप न अपराध है और न ही पाप। शादी करने या न करने और सेक्सुअल रिलेशनशिप बनाने का फैसला पूरी तरह से निजी है। लिहाजा 18 की उम्र पूरी कर चुकी लड़की और 21 की उम्र पूरी कर चुका लड़का लिव-इन में रह सकते हैं। लिव-इन में अगर पार्टनर के साथ रिश्ते टूट जाता है तो महिलाओं के पास कई ऐसे अधिकार है जिसका वे इस्तेमाल कर सकती है।


लिव-इन रिलेशन की पांच कैटेगरी

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशन को पांच अलग-अलग कैटेगरी में शामिल किया है। ये कैटेगरी है-

  1. वयस्क और अविवाहित स्त्री-पुरुष के घरेलू संबंध।
  2. शादीशुदा पुरुष और अविवाहित महिला से संबंध।
  3. अविवाहित पुरुष और शादीशुदा महिला के संबंध।
  4. शादीशुदा पुरुष और अविवाहित महिला के संबंध।
  5. समलिंगिंग पार्टनर के साथ लिव-इन रिलेशन।

क्या है अधिकार

गुजारा भत्ता की कर सकती है मांग- घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम-2005 के तहत महिला लिव-इन पार्टनर पत्नी की तहत गुजारा भत्ता की मांग कर सकती है। यह दावा सिर्फ पुरुष लिव-इन पार्टनर के जीवित रहने पर ही किया जा सकता है।

संपत्ति पर हक- अगर लिव-इन में रहने वाली महिला अपने पार्टनर की संपत्ति पर कानूनी अधिकार चाहती है तो उसको अपने नाम वसीयत करा लेनी चाहिए। ऐसा नहीं करने पर लिव-इन में रहने वाली महिला को अपने पार्टनर की संपत्ति में कोई अधिकारी नहीं मिलेगा। इसके अलावा महिला को पार्टनर के इंश्योरेंस पाॅलिसी में भी नाॅमिनी के रूप में खुद को दर्ज करवाना चाहिए। लिव-इन में रहने वाले एग्रीमेंट के जरिए भी लिव-इन पार्टनर की संपत्ति में हक हासिल कर सकते हैं। इसके लिए लिव-इन में रहने वालों को रजिस्ट्रार ऑफिस में एग्रीमेंट का पंजीकरण करवा लेना चाहिए। इस एग्रीमेंट में संपत्ति के हक को लेकर स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए।

लिव-इन में जन्मे बच्चों को मिलते हैं पूरे कानूनी अधिकार- अगर लिव-इन में महिला अपने पार्टनर के साथ लंबे समय तक रहते हैं और उनके संबंधों से होने वाले संत्तान को वैध माना जाता है। हिंदू मैरिज एक्ट के सेक्शन 16 के तहत लिव-इन से जन्मे बच्चे को वो सभी कानूनी अधिकारी मिलते हैं जो एक शादीशुदा दंपति से जन्मे बच्चे को मिलते हैं। सीआरपीसी के सेक्शन 125 में उनके हितों को सुरक्षा दी गई है।

विदेश में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जागरूक- अगर कोई महिला विदेश में लिव-इन रिलेशनशिप में रहती है, तो उसको वहां के स्थानीय कानून के तहत अधिकार मिलते हैं। हर देश में इसको लेकर अलग-अलग कानून हैं। इससे भी अहम बात यह है कि विदेश में लिव-इन में रहने वाले लोग अपने कानूनी अधिकार को लेकर बेहद अलर्ट रहते। हालांकि भारत में लिव-इन में रहने वाले लोग अपने कानूनी अधिकार को लेकर काफी लापरवाही बरतते हैं, जिसके चलते कई बार उनको दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

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