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मोदी 2.0 / मोदी के सामने सिंधिया का महल ढहा, खुद के करीबी से ही शिकस्त मिलने के करीब

इतिहास में सिंधिया राजवंश तीसरी बार हारने के करीब

Sindhiya's palace collapses in front of Modi, close to getting himself beaten by close proximity

नई दिल्ली. वैभवशाली महल की चकाचौंध देखकर किसी भी आंखे चौंधियां जाए। परीकथाओं जैसे राजसी ठाठ। दीवारों पर सोने का पेंट, चांदी की ट्रेन से खाना परोसे जाने जैसे किस्से। लेकिन इसे अलग पहचान राजनीति की भी। अकेले के दम पर कभी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को नाको चने चबवाने वाली राजमाता सिंधिया की यह विरासत है। उनकी बेटी वसुंधरा भाजपा से राजस्थान की दो बार मुख्यमंत्री रहीं तो बेटा माधव राव सिंधिया कांग्रेस से मंत्री। दूसरी पीढ़ी में माधव राव के बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी जीत का ही स्वाद चखा। लेकिन लोकसभा चुनाव 2019 के परिणामों ने सबको चौंका दिया। मोदी की आंधी में सिंधिया की राजधानी रहे ग्वालियर के वैभवशाली महल में दरारें पड़ गईं। इतिहास में यह तीसरी बार होने जा रहा है जबकि सिंधिया राजवंश का प्रत्याशी हारने के करीब है। 

गुना से पांचवीं वार चुनाव लड़ रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया का किला मोदी लहर में दरकने लगा। सिंधिया के करीबी सिपहसलार रहे केपी यादव ने भाजपा का प्रत्याशी बनकर उनके गढ़ में सेंध लगा दी। अभी परिणाम घोषित नहीं हुआ है लेकिन सिंधिया करीब सवा लाख वोटों से पिछड़ चुके हैं। माना जा रहा है कि सिंधिया की हार की औपचारिक घोषणा ही शेष है। अब सिंधिया परिवार से राजस्थान की पूर्व सीएम वसुंधरा को भिंड से और राजमाता विजयाराजे को रायबरेली में इंदिरा गांधी से एक-एक बार हार मिली है। 

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गुना सीट पर नहीं हुई राजवंश की हार 


इस लोकसभा सीट पर पहली बार लोकसभा चुनाव 1957 में कराए गए। इस चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर विजयाराजे सिंधिया विजयी हुईं। उन्होंने हिंदू महासभा के वीजी देशपांडे को हराया था। अगले चुनाव में महल उम्मीदवार कांग्रेस के रामसहाय पांडे चुनाव जीतने में कामयाब रहे। 1967 में इस सीट पर उपचुनाव में कांग्रेस को यहां से पहली बार हार का सामना करना पड़ा। सिंधिया के सहयोग से स्वतंत्र पार्टी के जे बी कृपलानी को जीत मिली। इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में स्वतंत्र पार्टी की ओर कांग्रेस की पूर्व नेता विजयाराजे सिंधिया लड़ीं। उन्होंने कांग्रेस के डीके जाधव को यहां पर शिकस्त दी।  साल 1971 में विजयाराजे के बेटे माधवराव सिंधिया जनसंघ के टिकट पर पहली बार चुनावी मैदान में उतरे और जीत हासिल की। माधवराव सिंधिया 1977 में फिर यहां से चुनाव लड़े लेकिन निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर। इस चुनाव में उन्होंने बीएलडी के गुरुबख्स सिंह को हराया। 1980 के लोकसभा चुनाव में वो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े और जीते भी। जबकि 1984 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक नए महल समर्थित उम्मीदवार महेंद्र सिंह को टिकट दिया। महेंद्र सिंह बीजेपी के उम्मीदवार को हराने में कामयाब रहे। 1989 के चुनाव में यहां से विजयाराजे सिंधिया एक बार फिर यहां से लड़ीं और तब के कांग्रेस के सांसद महेंद्र सिंह को शिकस्त दी। इसके बाद से विजयाराजे सिंधिया ने यहां पर हुए लगातार 4 चुनावों में जीत का परचम फहराया। 1999 लोकसभा चुनाव में माधवराव सिंधिया ने इस सीट पर कांग्रेस की वापसी कराई। 1999 के चुनाव में उन्होंने यहां से जीत हासिल की। 2001 में उनके निधन के बाद 2002 में हुए उपचुनाव में उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया यहां से लड़े। गुना की जनता ने उन्हें निराश नहीं किया। अपने पहले ही चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने शानदार जीत हासिल की। इसके बाद से हुए हर चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया यहां से जीतते आ रहे हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के आगे हर लहर टकरा कर यहां से वापस चली गई। यहां तक कि 2014 में मोदी लहर में जब कांग्रेस के दिग्गज नेताओं को हार का सामना करना पड़ा था तब भी ज्योतिरादित्य सिंधिया यहां पर जीत हासिल करने में कामयाब हुए थे।

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ऐसा है ज्योतिरादित्य का महल 


ज्योतिरादित्य सिंधिया लोकसभा चुनाव के छठवें चरण के सबसे अमीर प्रत्याशी रह हैं।  वे हाल ही में तब चर्चा में आए जब विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने जीत हासिल की। तब उनका नाम मुख्यमंत्री पद के लिए उछला था। सिंधिया के पास पैतृक संपत्ति में 40 एकड़ में फैला ग्वालियर का जय विलास पैलेस है। इस महल का वैभव पूरे भारत में मशहूर है। इसकी दीवारों पर सोने से पेंट किया गया है। राजसी वैभव से भरे इस महल में भोजन परासने के लिए चांदी से बनी ट्रेन चलती है। महल का निर्माण 1874 में जीवाजी राव सिंधिया ने करवाया था। लेफ्टिनेंट कर्नल सर माइकल फिलोज ने  डिजाइन तैयार किया गया था।  महल की छतों पर सोना लगा है। इसके 40 कमरों में अब म्यूजियम है।  पैलेस में रायल दरबार हॉल है, जो 100 फीट लंबा-50 फीट चौड़ा और 41 फीट ऊंचा है। इसकी छत पर 140 सालों से 3500 किलो के दो झूमर टंगे हैं। इसे टांगने के लिए इंजीनियरों ने छत पर 10 हाथियों को 7 दिनों तक खड़ा रखा था।   इन झूमरों को बेल्जियम के कारीगरों ने बनाया था। पैलेस के डाइनिंग हॉल में चांदी की ट्रेन है जो खाना परोसने के काम आती है। 1,240,771 वर्ग फीट के क्षेत्र में महल फैला हुआ है। माना जाता है कि जिस वक्त इस महल का निर्माण किया गया था, तब इसकी कीमत 1 करोड़ थी, लेकिन आज इस विशाल और आकर्षक महल की कीमत अरबों में है।

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