दो साल में नहीं बढ़ी फसलों की पैदावार, न मिली खाद्य सुरक्षा

डॉ.सीडी मायी और भगीरथ चौधरी

Nov 07,2016 07:47:00 PM IST
केंद्रीय कृषि और किसान कल्‍याण मंत्रालय के एजेंडे के कारण बीते दो साल के दौरान बीज और जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में कई गलत नीतियां और प्रशासनिक कदम सामने आए हैं। इन नीतिगत उपायों ने न तो फसलों की पैदावार बढ़ाने में खास योगदान किया और न ही इनसे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हो पाई। साथ ही ये नीतियां प्रधानमंत्री के 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के सपने को पूरा करने के लिए कोई आइडिया पेश नहीं कर पाईं। इनमें से तीन नीतिगत फैसलों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
पहला आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम के तहत हाइब्रिड कॉटन बीज का अधिकतम खुदरा मूल्य तय करने से संबंधित है। दूसरा कृषि मंत्रालय द्वारा कृषि में जीएम टेक्‍नॉलोजी के लिए लाइसेंस देने से संबंधित गाइडलाइंस से संबंधित है। तीसरा और अंतिम मायको द्वारा 2005 में BGIIRRFlex कॉटन टेक्नोलॉजी की कमर्शियल रिलीज के आवेदन को वापस लेने को लेकर है, जिसका मतलब नई पीढ़ी की कीट प्रतिरोधी तकनीक पेश करने से है।
यहां सवाल खड़े होते हैं कि क्‍या बीटी कॉटन की एमआरपी फिक्‍स करना भारत में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की दिशा में उठाया गया कदम है?
क्‍या निजी कृषि प्रौद्योगिकियों की अनिवार्य लाइसेंसिंग को लागू करने और द्विपक्षीय विवादों में हस्‍तक्षेप से भारत में ईज ऑफ डू‍इंग बिजनेस में योगदान संभव होगा?
अंतिम यह है कि क्‍या प्राइवेट कंपनियों पर नई तकनीक से हटने का दबाव डालने से भारत में ईज ऑफ डूइंग की राह आसान होगी?
दरअसल, कृषि मंत्रालय द्वारा जारी जीएम टेक्‍नोलॉजी के समझौतों के लिए लाइसेंसिंग की गाइडलाइंस का ड्राफ्ट नोटिफिकेशन भारत के कृषि क्षेत्र के लिए खतरे की घंटी है। खुशकिस्मती की बात थी कि इस नोटिफिकेशन को वापस ले लिया गया और इस पर जनता से टिप्पणियां मांगी गईं। इस नोटिफिकेशन के कारण लड़ाई मॉन्‍सेंटो बनाम बायलेटर एग्रीमेंट्स का उल्‍लंघन करने वाली कंपनियों से हटकर सरकार बनाम मल्टीनेशनल कंपनियों और संभावित टेक्‍नोलॉजी प्रोवाइडर्स में तब्दील हो गई। पहले यह लड़ाई केवल कॉटन तक सीमित थी, लेकिन बाद में खुद ही पूरे जैव प्रौद्योगिकी और कृषि क्षेत्र में फैल गई। 2002 से पहले कॉटन की खेती बीटी वैरायटीज और हाइब्रिड बीजों के बिना होती थी, लेकिन बाद में बीटी टेक्‍नोलॉजी आने से कॉटन इकोनॉमी का गणित ही बदल गया। 2001 में कॉटन के हाइब्रिड बीजों का बिजनेस केवल 450 करोड़ रुपए के आसपास था, जो 2015 तक कई गुना बढ़कर 4 हजार करोड़ से ज्यादा हो गया। देश की 49 बीज कंपनियों और राज्य बीज निगमों के साथ द्विपक्षीय समझौते करने वाले तकनीक प्रदाताओं ने कॉटन पैदावार बढ़ाने में खासी मदद की। इससे जहां कॉटन की पैदावार तिगुनी हो गई, वहीं एक्‍सपोर्ट को भी बढ़ावा मिला। इससे देश के सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लगभग 75 लाख कपास किसानों को लाभ हुआ।
एक अनुमान के मुताबिक बीटी कॉटन से टेक्‍नोलॉजी प्रोवाइडर्स, बीज कंपनियों और किसानों को 1:1:40 के अनुपात में फायदा होता है। हालांकि, 2015-16 में जब प्रबंधन की कमियों और तकनीक कुप्रबंधन के चलते बीटी टेक्‍नोलॉजी का मूल्‍य कम होता दिख रहा था तो कुछ स्थानीय बीज कंपनियों ने द्विपक्षीय समझौतों पर सवाल उठाने शुरू कर दिए और टेक्‍नोलॉजी प्रोवाइडर्स को लाइसेंस फीस साझा करने से भी इनकार कर दिया। नेशनल सीड एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एनएसएआई) के अंतर्गत आने वाली बीज कंपनियों ने कहा था कि कृषि मंत्रालय ने बड़ी चतुराई और बेमन से एकतरफा गाइडलाइंस जारी कर दीं, जिन्हें टाले जाने की जरूरत है। इसकी वजह यह है कि यह आईपीआर कानूनों का उल्लंघन है और इससे भारत की अंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति को खासा धक्‍का लगा था, क्योंकि इसके लिए भारत ने डब्ल्यूटीओ में हस्ताक्षर किए हैं।
सरकार ने 7 दिसंबर 2015 को कॉटन प्राइस (कंट्रोल) ऑर्डर, 2015 के अंतर्गत बीटी कॉटन हाइब्रिड्स के एमआरपी तय करने की वजह आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम, 1955 के प्रावधानों को बताया। इस क्रम में बीटी कॉटन BGII हाइब्रिड सीड्स की एमआरपी निर्धारित करते हुए इसके 450 ग्राम के पैकेट की एमआरपी 830 रुपए से घटाकर 800 रुपए कर दी गई। इसका मतलब है कि सभी नौ कॉटन उत्पादक राज्यों में कॉटन के बीज की कीमतों में एकरूपता लाने के लिए BGII कॉटन हाइब्रिड बीजों की एक समान एमआरपी तय करना जरूरी था। बेमन से ही सही लेकिन इस प्राइस कंट्रोल ऑर्ड से कॉटन हाइब्रिड सीड की ट्रेट वैल्‍यू 49 रुपए फिक्‍स कर दी गई, जबकि लाइसेंसी और लाइसेंसर के बीच हुए द्विपक्षीय समझौते के तहत यह पहले 163 रुपए तय की गई थी। ऐसा यह दिखाने के लिए किया गया कि कृषि मंत्रालय उनके भले के लिए काम करने को उत्सुक है। इस तरह सरकार ने किसानों को 30 रुपए का लाभ तो पहुंचाया, लेकिन अप्रत्‍यक्ष रूप से बीटी कॉटन हाइब्रिड सीड्स की मार्केटिंग से जुड़ी कंपनियों को इससे 84 रुपए का लाभ हुआ, जो साल का लगभग 350 करोड़ रुपए बैठता है। इसका सबसे ज्यादा फायदा नुजीवीडू और कावेरी सीड की अगुआई में टॉप 5 बीज कंपनियों को हुआ। वास्तव में इसका फायदा किसानों को होना चाहिए था और यह कृषि मंत्रालय के लिए ‘किसान हितैषी’ के तौर पर सामने आने का मौका भी था। अगर लाइसेंस शुल्क में 114 रुपए प्रति पैकेट की कमी का पूरा लाभ किसानों को दिया जाता तो बीजीआई कॉटन बीज की कीमत 716 रुपए प्रति पैकेट हो जाती। इससे जहां कृषि मंत्रालय की साख बढ़ती, वहीं लगातार दो सूखों का सामना करने वाले छोटे किसानों को भी वास्तविक फायदा होता।
यह स्‍पष्‍ट तौर पर कहा जा सकता है कि कृषि मंत्रालय ने अपने हिसाब से लाइसेंसिंग एग्रीमेंट के लिए एकतरफा गाइलाइंस जारी कीं, जबकि सरकार कॉटन हाइब्रिड सीड की एमआरपी को आवश्‍यक वस्‍तु अधिनियम, 1956 के तहत फिक्‍स कर सकती है। 2016 की ड्राफ्ट लाइसेंसिंग गाइडलाइंस बदकिस्मती से संसद द्वारा लागू पीपीपी और एफआर और पेटेंट कानून को एक दूसरे के खिलाफ और सहायक बनाती हैं। इसके साथ ही ड्राफ्ट लाइसेंसिंग गाइडलाइन ने आपसी समझौतों के मूल अधिकारों दूर कर दिया। जाहिर तौर पर यह नोटिफिकेशन प्रतिस्पर्धी कॉटन सेक्‍टर पर कई नकारात्‍मक प्रभाव डालेगा। इसका सबसे ज्‍यादा नुकसान यह होगा कि कोई भी उद्यमी सीड सेक्‍टर में नई तकनीक लाने से डरेगा। यह कृषि क्षेत्र में मेक इन इंडिया के कांसेप्‍ट को भी प्रभावित करेगा, जो प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्‍ट है।
ड्राफ्ट लाइसेंसिंग गाइडलाइन को टालना एक अस्‍थायी राहत है। हालांकि महज लाइसेंसिंग गाइडलाइंस के विचार के बाद ही त्वरित प्रतिक्रिया के तौर पर टेक्नोलॉजी डेवलपर्स ने मौजूदा खरीफ सत्र, 2016 में जीएम कॉटन तकनीक का फील्ड ट्रायल टालने का फैसला किया। बीते दो दशकों में 2016 पहला साल है, जब टेक्‍नोलॉजी डेवलपर्स ने कृषि क्षेत्र में में कोई फील्‍ड ट्रायल नहीं किया। बीजीआईआईआरआर फ्लेक्स कॉटन पॉलिसी को वापस लेने से भी कॉटन सीड सेक्‍टर में कोई बड़ा शोध एवं विकास (आरएंडडी) या तो बाधित होगा या फिर बिल्‍कुल रुक जाएगा। इनमें नाइट्रोजन यूज एफीसिएंट (एनयूई) कॉटन, सूखा सहने में सक्षम कॉटन, BGIIRRF कॉटन, वाइडर स्‍ट्राइक कॉटन प्रजातियां शामिल हैं।
बीटी टेक्‍नोलॉजी पिछले 15 साल से इस्‍तेमाल में आ रही है और कोई भी तकनीक स्थायी नहीं होती। आरएंडडी किसी भी तकनीक का बहुत महत्‍वपूर्ण अंग होता है। चरणबद्ध तरीके से मौजूदा जीएम टेक्‍नोलॉजी की जगह ज्यादा उत्‍पादन और प्रभावी जीएम ट्रेट्स लेंगी। इससे 4 करोड़ बेल्‍स कॉटन उत्‍पादन के लक्ष्‍य को हासिल किया जा सकता है। हालांकि कृषि मंत्रालय के एकतरफा गाइडलाइन जारी करने के फैसले से भारतीय बीज उद्योग को दो गुटों में बंट गया है। एक तरफ वे लोग हैं जो आईपी का सम्मान करते हैं और दूसरी तरफ वे हैं जो इससे बचते हैं। आगे बीज कंपनियों की लड़ाई और भी तेज होने वाली है। तकनीक शुल्क को फिक्‍स करना और कृषि मंत्रालय की ओर से जारी गाइडलाइन्‍स इस लड़ाई को बढ़ाने का काम करेंगी।
संक्षेप में कह सकते हैं कि अपने फायदे के लिए कुछ बीज कंपनियां भारत में बीज और जैव प्रौद्योगिकी उद्योग की हार का कारण बन रही हैं। कृषि मंत्रालय को इस उद्योग के अनुकूल माहौल बनाने के लिए कुछ समय और संसाधन खर्च करने की जरूरत है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो प्रधानमंत्री का किसानों की आय दोगुनी करने का सपना एक नारा बनकर ही रह जाएगा।
(लेखक डॉ. सीडी मायी और भगीरथ चौधरी साउथ एशिया बायोटेक्‍नोलॉजी सेंटर के संस्‍थापक निदेशक हैं।)
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