सोलर /रिन्युएबल बिजली की उत्पादन लागत कम हो गई, लेकिन उपभोक्ताओं को नहीं मिल रहा फायदा

  • रिन्युएबल के लिए ट्रांसमिशन की उचित व्यवस्था नहीं होने से बढ़ जाती है कुल लागत

Moneybhaskar.com

Aug 14,2019 05:36:00 PM IST

नई दिल्ली। रिन्युएबल (नवीकरणीय) ऊर्जा की लागत कम हो रही है, लेकिन इसका फायदा उपभोक्ताओं को नहीं मिल रहा है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के मुताबिक पिछले दो साल में पवन ऊर्जा की लागत 2.50 रुपए प्रति यूनिट हो गई तो सोलर बिजली की लागत 2.20 रुपए प्रति यूनिट तक पहुंच गई, लेकिन इसका फायदा उपभोक्ताओं को नहीं मिल रहा है। विशेषज्ञ इसके लिए बिजली सेक्टर से जुड़े इंफ्रास्ट्रक्चर में कमी को जिम्मेदार बता रहे हैं। उनका कहना है कि बिजली के ट्रांसमिशन की सुविधा के भारी अभाव की वजह से उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली नहीं मिल पा रही है। ट्रांसमिशन सुविधा की कमी के कारण ट्रांसमिशन की लागत बढ़ जाती है और बिजली वितरण कंपनियों तक पहुंचते-पहुंचते बिजली की लागत अधिक हो जाती है। उपभोक्ता को बिजली की सप्लाई बिजली वितरण कंपनी (डिस्कॉम) करती है।

कुल क्षमता के मुकाबले वह टरबाइन सिर्फ 20 फीसदी बिजली का ही उत्पादन करता है

विशेषज्ञों के मुताबिक पवन ऊर्जा के लिए अगर कोई डेवलपर टरबाइन लगाता है तो कुल क्षमता के मुकाबले वह टरबाइन सिर्फ 20 फीसदी बिजली का ही उत्पादन करता है। मान लीजिए टरबाइन की क्षमता 10 मेगावाट की है तो उससे सिर्फ 2 मेगावाट बिजली का ही उत्पादन होगा। अब अगर डेवलपर्स उस बिजली के ट्रांसमिशन के लिए अपने पैसे से तार बिछाने का काम करता है तो उसकी लागत काफी अधिक हो जाती है और थर्मल के मुकाबले वह बिजली अधिक महंगी हो जाती है। क्योंकि एक बार तार बिछने के बाद वहां से 2 मेगावाट बिजली को ट्रांसमिट करें या 10 मेगावाट, दोनों की लागत एक होगी। ऐसे में, इस्तेमाल में नहीं आने वाली ट्रांसमिशन लाइन की लागत का बोझ भी उपभोक्ताओं को सहना पड़ता है। रिन्युएबल एनर्जी के प्रसार के साथ ही इस प्रकार की लागत बढ़ती जाएगी।

पावर डेवलपर्स को ट्रांसमिशन लाइन की व्यवस्था अपने स्तर पर करनी पड़ती है

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर रिन्युएबल बिजली की उत्पादन लागत का फायदा उपभोक्ताओं को देना है तो रिन्युएबल एनर्जी के लिए अलग से ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर को तैयार करने की जरूरत है ताकि उन बिजली को आसानी से ग्रिड तक पहुंचाया जा सके। अधिकतर रिन्युएबल एनर्जी के प्लांट पहाड़, रेगिस्तान या समंदर से सटे दूरदराज के इलाके में लगाए जाते हैं जहां आबादी काफी कम होती है जिस कारण उन इलाकों में बिजली की मांग काफी कम होती है। ऐसे में, पावर डेवलपर्स को ट्रांसमिशन लाइन की व्यवस्था अपने स्तर पर करनी पड़ती है। डिस्कॉम तक पहुंचते-पहुंचते बिजली की लागत अधिक हो जाती है जिसका खामियाजा डिस्कॉम को झेलना पड़ता है। भारत में डिस्कॉम की हालत पहले से खराब चल रही है और आने वाले सालों में डिस्कॉम के घाटे में बढ़ोतरी होने जा रही है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के मुताबिक अगले साल डिस्कॉम का घाटा 264 अरब रपए के स्तर तक पहुंच जाएगा जो 228 अरब रुपए हैं।

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