मिसाल /खरपतवार हटाने के लिए स्कूल से ज्यादा छुट्‌टी लेने पर नोटिस मिला तो महज 60 हजार रुपए में मशीन बना दी, साफ किए सैकड़ों तालाब 

Moneybhaskar.com

Jun 17,2019 08:16:19 PM IST

नई दिल्ली. तालाब से खरपतवार हटाने के लिए प्राइवरी स्कूल में टीचर की नौकरी कर रहे एक युवा को बार-बार छुट्‌टी लेनी पड़ती थी। स्कूल ने उन्हें छुटि्टयों की वजह से नोटिस थमा दिया। लिहाजा, इससे निपटने के लिए टीचर ने महज 60 हजार में ऐसी मशीन बना दी जो तेजी से तालाब की सफाई कर सकती है। यही नहीं, ऐसी ही विदेशी मशीन की कीमत एक करोड़ रुपए तक है। इस शिक्षक का नाम है गोदासु नरसिम्हा।


मछली पालन पर निर्भर गांव वाले साल के आधे वक्त खरपतवार हटाने में ही लगे रहते थे


आंध्र प्रदेश का पोचमपल्ली गांव साड़ियों के लिए काफी प्रसिद्ध है। यहां से सिर्फ एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है मुक्तापुर गांव। मछली पकड़ना इस गांव के लोगों का मुख्य पेशा है। स्थानीय तालाबों से यहां के मछुआरे मछलियां पकड़कर बेचते हैं और अपना घर चलाते हैं। लेकिन इन तालाबों में बरसात के मौसम में उग आने वाले खरपतवार से मछुआरे काफी परेशान थे। खरपतवार इतनी तेजी से बढ़ते कि दो-तीन दिन में ही पूरे तालाब को ढक लेते थे। इसके चलते मछलियों तक न तो सूर्य की रोशनी पहुँच पाती और न ही उन्हें पर्याप्त ऑक्सीजन मिल पाता। खरपतवार हटाने के लिए इन मछुआरों को साल के 3 महीने लगातार तालाब की साफ-सफाई करनी पड़ती। यदि मजदूरों से करवाए तो तीन लाख रुपए खर्च हो जाते। वहीं, खरपतवार निकालते समय गंदे पानी में जाने की वजह से गाँव के लोगों को कभी सांप काट लेते, तो कभी उन्हें त्वचा से संबंधित बीमारियां हो जातीं।

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वर्ष 2012 में बनाई पहली मशीन

गोदासु नरसिम्हा मछुआरा होने के साथ-साथ एक प्राइमरी स्कूल में टीचर भी थे। तालाब साफ़ करने के लिए अक्सर उन्हें स्कूल से छुट्टियां लेनी पड़ती थीं और इस वजह से उन्हें स्कूल से नोटिस मिला कि अगर उन्होंने ज्यादा छुट्टी ली तो उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ेगी। इस स्थिति से निपटने के लिए नरसिम्हा ने खुद ही मशीन बनाने की दिशा में काम शुरू कर दिया। नरसिम्हा ने वेबसाइट द बेटर इंडिया को बताया कि गांव के सरपंच और बाकी लोगों ने मदद की। उन्होंने 20, 000 रुपए इकट्ठा करके दिए। सबसे पहले ‘कटिंग मशीन’ बनाई, लेकिन यह मशीन तालाब के बाहर ही कामयाब थी। पानी में इसके ब्लेड काम नहीं कर पा रहे थे। लिहाजा फिर नई मशीन बनाने की जरूरत पड़ी। इस बार गांव के लोगों ने भी मदद से इंकार कर दिया। आखिरकार उनके एक रिश्तेदार ने उन्हें 30,000 रुपए का कर्ज दिया। इससे उन्होंने लिफ्टिंग मशीन तैयार की। नरसिम्हा ने बताया कि मशीन तो तैयार थी और कामयाब भी, पर इसको अंतिम रूप देने के लिए 10,000 रुपए की और जरूरत थी। आखिर में दूसरे गांव के लोगों से यह मदद मिली। वर्ष 2012 में इसे गांव के तालाब में उतारा और कामयाबी भी मिल गई।

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इनोवेशन पर मिला राष्ट्रीय पुरस्कार

अपने गांव के साथ-साथ दूसरे गांवों के तालाबों को भी साफ किया। उनके बारे में जब स्थानीय अखबार में खबर आई, तो ‘पल्ले सृजना’ नामक एक संगठन ने उनसे संपर्क किया। ‘पल्ले सृजना’ की मदद से नरसिम्हा को अपना यह इनोवेशन राष्ट्रीय मंच पर दिखाने का मौका मिला। इसके बाद, हैदराबाद नगर निगम ने उन्हें हैदराबाद के कई तालाब और झीलों की साफ़-सफाई का कार्यभार सौंपा। आरके पुरम लेक, तौलीचौकी का तालाब सहित उन्होंने अब तक लगभग 8-9 झीलों की सफाई की है। द बेटर इंडिया की संवाददाता निशा डागर को नरसिम्हा ने बताया, “अब तक मैंने ओडिशा के एक पॉवर प्लांट के लिए मशीन बनाई है और किसानों के लिए कई मशीनें बनाई हैं। खरपतवार हटाने की अपनी पहली मशीन में भी मैंने बहुत से बदलाव किए हैं। अब एक अच्छी क्वालिटी की मशीन की कुल लागत लगभग 30 लाख रुपए है। अगर इस तरह की मशीन आप विदेशी बाजारों से खरीदें तो लागत कम से कम 1 करोड़ रुपए पड़ेगी।”

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यूट्यूब पर वीडियो देख केन्या से मिला ऑर्डर

नरसिम्हा और उनकी मशीन के बारे में यूट्यूब चैनल पर देखकर केन्या के जल, पर्यावरण एवं सिंचाई मंत्री सलमों ओरिम्बा ने भी उन्हें खरपतवार हटाने की 10 मशीनें बनाने का ऑर्डर दिया है। ओरिम्बो ने भारतीय प्रशासन से संपर्क किया और फिर अपने कुछ अधिकारियों के साथ भारत आकर नरसिम्हा की मशीन का जायजा लिया। उन्हें पुणे, चेन्नई और विशाखापट्टनम से भी मशीन बनाने के ऑर्डर मिले हैं। पने इन कार्यों के लिए नरसिम्हा को भारत सरकार और राज्य सरकार से काफ़ी सराहना मिली है। साल 2015 में उनकी मशीन को राष्ट्रपति भवन में लगी प्रदर्शनी में दिखाया गया था।

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सिर्फ 9 साल की उम्र में खो दिए थे माता-पिता

सिर्फ 9 साल की उम्र में अपने माता-पिता को खो देने वाले नरसिम्हा को उनके बड़े भाई ने पाला। नरसिम्हा हमेशा से ही पढ़ाई में तेज थे और साथ ही उन्हें मशीनों से खेलने का बहुत शौक था। भाई ने जब उनकी पढ़ाई की तरफ ध्यान नहीं दिया वे अपने एक रिश्तेदार के यहां रहने लगे। वहां वे उनके घर का काम करते थे और बदले में जो भी पैसे मिलते, उससे अपने स्कूल की फीस भरते। 10वीं कक्षा के बाद उन्होंने डिप्लोमा करने का फ़ैसला किया और टेस्ट भी क्लियर कर लिया। लेकिन मजबूरी में पढ़ाई छोड़नी पड़ी और अपने गाँव में ही रहकर छोटा-मोटा काम करने लगे। उन्होंने गांव के ही प्राइमरी स्कूल में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया।

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