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कामयाबी /दार्जलिंग चाय, कड़कनाथ मुर्गे के बाद कोल्हापुरी चप्पल को मिला जीआई टैग

Moneybhaskar.com

Jun 19,2019 05:43:07 PM IST

नई दिल्ली. कोल्हापुरी चप्पलें। आपने फिल्मों में तो यह नाम खूब सूना होगा और संभवत: आप भी इसके मुरीद होंगे। अपनी खास लुक के लिए जाने वाली ये चप्पलें अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी जानी जाएंगी। दरअसल, दार्जलिंग चाय, कड़कनाथ मुर्गे, मलिहाबादी आम के बाद कोल्हापुरी चप्पल को भी जीआई टैग (भौगोलिक संकेतक) मिल गया है। सालाना करीब दो हजार करोड़ रुपए की कोल्हापुरी चप्पल बनाई जाती हैं।

सिर्फ आठ जिलों में निर्मित होने वाले उत्पाद ही जीआई टैग के दायरे में होंगे

अंग्रेजी अखबार ईटी की खबर के मुताबिक पेटेंट, डिजाइन और ट्रेड मार्क के महानिदेशक ने महाराष्ट्र और कर्नाटक के एक खास इलाकों में कोल्हापुरियों के लिए जीआई टैग की अनुमति दी है। इसके तहत महाराष्ट्र और कर्नाटक के 4-4 जिलों को कोल्हापुरी चप्पल बनाने में अग्रणी क्षेत्र के रूप में चुना गया है। इन इलाकों में बनी कोल्हापुरी चप्पल को जीआई टैग दिया गया है। जीआई टैग का मतलब यह है कि केवल इन आठ जिलों में निर्मित जूते-चप्पल कोल्हापुरी टैग के योग्य होंगे। महाराष्ट्र के कोल्हापुर, सोलापुर, सांगली और सतारा जिलों में और कर्नाटक के धारवाड़, बेलगाम, बागलकोट और बीजापुर जिलों को कोल्हापुरी चप्पल बनाने वाले कारीगरों के लिए को संयुक्त रूप से जीआई टैग दिया गया है। उद्यमी संजय तापसे का कहना है कि कोल्हापुर में इस चप्पल को बनाने वाले काफी संख्या में कुशल कारीगर हैं। कर्नाटक इस फुटवियर के थोक उत्पादन (ज्यादा बनाने में) में आगे है। तापसे का परिवार कोल्हापुरी चप्पल का व्यापार करता है।

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20 वीं सदी में ब्रांड के रूप में उभरा

कोल्हापुरी वैसे तो कई सदियों पुराना है लेकिन ब्रांड के रूप में यह 20वीं शताब्दी की शुरुआत में अस्तित्व में आया था। तब कोल्हापुर में जूते का व्यापार शुरू हुआ था। कोल्हापुर में छत्रपति शाहू महाराज (1874-1922) ने इसके उत्पादन को प्रोत्साहित किया और उनके शासन के दौरान 29 सेंटर (पशुओं की खाल से चमड़ा बनाने का काम) खोले गए।

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अब तक 300 से ज्यादा उत्पादों को मिल चुका है जीआई टैग

किसी निश्चित क्षेत्र विशेष के उत्पादों को जियोग्रॉफिल इंडीकेशन टैग (जीआई टैग) दिया जाता है। इस टैग को मिलने से दुनिया भर में उत्पाद विशेष की पहचान स्थापति होती है। और उसकी भौगोलिक स्थिति के नाम पर ही पूरी दुनिया में उत्पाद बिकता है। जैसे चंदेरी की साड़ी, कांजीवरम की साड़ी, दार्जिलिंग चाय और मलिहाबादी आम। अब तक 300 से ज्यादा उत्पादों को जीआई मिल चुका है। भारत में सबसे पहले वर्ष 2004 में दार्जिलिंग चाय को जीआई टैग मिला था। बंगाल का रसगुल्ला, पंजाब का बासमती चावल, महाबलेश्वर स्ट्रॉबेरी, जयपुर के ब्लू पोटरी, बनारसी साड़ी और तिरुपति के लड्डू, मध्य प्रदेश के झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे को जीआई टैग मिल चुका है।

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