बदलाव  /घर के पास रोजगार का विकल्प दे रही हैं ऑनलाइन काम करने वाली कंपनियां, छोटे शहरों पर फोकस 

Moneybhaskar.com

Jun 19,2019 02:49:00 PM IST

नई दिल्ली. जब ई-कॉमर्स और खाद्य प्रौद्योगिकी (फूड-टेक) कंपनियां महानगरों में अपनी सेवाएं शुरू कर रही थीं तो छोटे शहर के युवा नौकरी के लिए महानगरों की तरफ कूच कर रहे थे। लेकिन अब स्थितियां बदल रही हैं। फ्लिपकार्ट, जोमैटो, स्विगी जैसी ई-कॉमर्स कंपनियों का कारोबार महानगरों से निकलकर छोटे शहरों में फैल रहा है। इसलिए रोजगार की तलाश में महानगर आए लोग भी इन्हीं कंपनियों के जरिए घर वापसी कर रहे हैं।



कंपनियां अपने शहर से काम करने का दे रही हैं मौका


अंग्रेजी अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी खबर के मुताबिक दिल्ली, मुंबई और बेंगलूरु जैसे महानगरों में काम करने वाले लोग ई-कॉमर्स कंपनियों के साथ काम करने के लिए अपने घरों को लौट रहे हैं। उन्हें नौकरी के साथ ही बेहतर आबो-हवा और सस्ती दरों पर सभी सुविधाएं भी मिल रही हैं। मैसूरु से ताल्लुक रखने वाले मधु कुमार उन्हीं में से हैं। कुमार बेंगलूरु में स्विगी के साथ काम कर रहे थे तो घर पर उनकी मां बीमार हो गईं। स्विगी ने कुमार को घर लौटने का मौका दिया और मैसूरु में ही नौकरी देने की पेशकश भी उनके सामने रखी। फ्लिपकार्ट के साथ बेंगलूरु में काम करने वाले सतीश माहले भी ऐसे ही हालात से गुजर रहे थे। कंपनी ने उन्हें उनके शहर कारवाड़ लौटने में उनकी मदद की। कुमार और महाले उन सैकड़ों कर्मचारियों और डिलिवरी पार्टनर (आपूर्ति साझेदार) में शामिल हैं, जो ऑनलाइन वाणिज्य कंपनियों के साथ हैं और अब अपने शहरों में ही या उनके करीब रोजगार पा रहे हैं।

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एक साल में सैकड़ों डिलीवरी पार्टनर अपने शहर लौटे

स्विगी के उपाध्यक्ष (विपणन) श्रीवत्स टी एस कहते हैं, 'पूरे देश में स्विगी तेजी से विस्तार कर रही है। जो लोग दो-तीन साल से महानगरों में हमारे साथ डिलिवरी पार्टनर के तौर पर काम कर रहे थे, वे अपने शहर जाकर हमारा परिचालन संभाल रहे हैं। पिछले एक साल में सैकड़ों डिलिवरी पार्टनर अपने शहर लौटे हैं क्योंकि स्विगी वहां भी पहुंच चुकी है।' देश के 200 शहरों में स्विगी के करीब 2 लाख सक्रिय डिलिवरी पार्टनर है और कंपनी हर 2 दिन में किसी नए शहर में कारोबार शुरू कर रही है। सूत्रों ने कहा कि बेंगलूरु जैसे शहर में स्विगी का डिलिवरी पार्टनर बनकर 25,000 से 30,000 रुपये महीने कमाए जा सकते हैं। छोटे शहरों में यह रकम 20,000 रुपये हो सकती है, लेकिन रहन-सहन अपेक्षाकृत सस्ता होने से आदमी इतने में भी ठाठ से रह सकता है।

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छोटे शहरों में तेजी से बढ़ रही है ई-कामर्स कंपनियों की मांग

ई-कॉमर्स एवं कंज्यूमर इंटरनेट में विशेषज्ञता रखने वाली सलाहकार कंपनी प्रैक्सिस ग्लोबल अलायंस के प्रबंध निदेशक मधुर सिंघल कहते हैं, 'यह क्षेत्र महानगरों से निकलकर छोटे शहरों में कारोबार के लिए तैयार हो गया है। ज्यादातर छोटे शहरों में संगठित खुदरा एवं रेस्तरां कारोबारों का अभाव है। इससे फूड-टेक कंपनियों को इन जगहों पर तेजी से विस्तार का मौका मिल गया है। जोमेटो और स्विगी लोगों को उनके शहरों में ही रोजगार का विकल्प दे रही हैं।' वॉलमार्ट नियंत्रित फ्लिपकार्ट भी इस रुझान को भली-भांति समझ चुकी है। कंपनी के अनुसार छोटे शहरों में ई-कॉमर्र्स कंपनियों की पहुंच और विक्रेताओं एवं घरेलू विनिर्माताओं की तादाद बढऩे से आर्थिक अवसर बढ़ गए हैं। फ्लिपकार्ट में चीफ कॉरपोरेट अफेयर्स अधिकारी रजनीश कुमार ने बिजनेस स्टैंडर्ड से बातचीत में कहते हैं, 'हम अब अगले 20 करोड़ लोगों तक ई-कॉमर्स की सुविधा पहुंचाने की कोशिश में जुटे हैं। छोटे शहरों से अधिक से अधिक लोग हमारे साथ जुड़ रहे हैं। इससे शहरीकरण का एक समान विस्तार होने के साथ ही महानगरों से लोग अब अपने शहरों की ओर लौट रहे हैं।' जब अमेरिका की दिग्गज रिटेल कंपनी वॉलमार्ट ने पिछले साल 16 अरब डॉलर में फ्लिपकार्ट का अधिग्रहण किया था तो अनुमान लगाया गया था कि इससे देश में अगले दस साल में करीब एक करोड़ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा होंगे।

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हर महीने 50 नए शहरों में शुरू हो रही हैं सेवाएं


गुड़गांव की फूड डिलिवरी कंपनी जोमेटो को अलीबाबा की कंपनी आंट फाइनैंशियल, सिकोया और ग्लेड ब्रुक कैपिटल पार्टनर्स जैसे निवेशकों का समर्थन हासिल है। कंपनी हर महीने करीब 50 नए शहरों में अपनी सेवाएं शुरू कर रही है। कंपनी का कहना है कि वह न केवल फूड डिलिवरी और रेस्तरां कारोबार का विस्तार कर रही है बल्कि छोटे शहरों में रोजगार सृजन भी कर रही है। कंपनी के 300 से अधिक शहरों में 200,000 से अधिक पार्टनर हैं जिनमें 54 फीसदी दूसरे और तीसरी श्रेणी के शहरों में हैं। सितंबर 2018 में यह आंकड़ा 12 फीसदी था। जोमेटो के प्रवक्ता ने कहा कि पार्टनरों के साइकिल और ई-बाइक का इस्तेमाल करने से भी फूड डिलिवरी की गुंजाइश बढ़ रही है। मुख्य रूप से छोटे शहरों के यह रुझान देखा जा रहा है। मोटरबाइक की तुलना में साइकिल के रखरखाव में मामूली खर्च आता है और इसके लिए ड्राइविंग लाइसेंस की भी जरूरत नहीं पड़ती है।

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