मजदूर दिवस /खेतों में मजदूरी करते थे पिता, बेटा बन गया अरबपति

  • कंपनी ने पिछले 20 सालों में कभी भी लोन या उधार नहीं लिया।
  • पिछले 10 सालों से 60 करोड़ रुपए का कैश बैकअप बनाकर रखा हुआ है।

money bhaskar

May 01,2019 11:46:46 AM IST

नई दिल्ली. आज मजदूर दिवस है। मजदूरी या नौकरी करते-करते लोगों की जिंदगी बीत जाती है लेकिन एक शख्स ने सरकारी नौकरी छोड़ देश में बढ़ते थाइराइड की बीमारी पर रिसर्च की और फिर बना दी देश की सबसे बड़ी पैथालॉजी सेंटर की चेन। तमिलनाडू के इस अरबपति के पिता दूसरे के खेतों में मजदूरी करते थे। खुद की भी नौकरी चली गई लेकिन यही जिंदगी का टर्निंग पाइंट बना। फिर उन्होंने खोला थायरोकेयर सेंटर। और आज इसकी बदौलत वे अरबपति हैं।


महज तीन साल की नौकरी के बाद हो गए थे बेरोजगार


मेडिकल डायग्नोस्टिक सेक्टर की मौजूदा सबसे बड़ी कंपनियों में से एक, थायरोकेयर और उसके संस्थापक अरोकियास्वामी वेलुमणि एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता दूसरों के खेत में मजदूरी करते थे। तमिलनाडु के एक छोटे से गांव के रहने वाले वेलुमणि ने बड़े ही विपरीत हालात में शुरूआती पढ़ाई की। क्वॉर्ट्ज इंडिया के मुताबिक वेलु ने केमिस्ट्री से अपना ग्रैजुएशन पूरा किया। इसके बाद 1979 में वह कोयंबटूर की एक फार्मा कंपनी में बतौर केमिस्ट काम करने लगे। उस वक्त वेलु की उम्र महज 20 साल थी और उन्हें 150 रुपए मासिक वेतन मिलता था। तीन साल बाद कंपनी बंद हो गई और वेलु बेरोज़गार हो गए।

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बेरोजगारी से मिला टर्निंग पाइंट

वेलुमणि इस मौके को ही अपने जीवन का टर्निंग पॉइंट मानते हैं। नौकरी जाने के बाद वेलु ने भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बीएआरसी, मुंबई) में लैब असिस्टेंट की नौकरी के लिए आवेदन दिया। उन्हें नौकरी भी मिल गई, लेकिन कुछ वक़्त बाद ही उन्होंने आगे पढ़ने का मन बना लिया। 1985 में उन्होंने मास्टर डिग्री की पढ़ाई शुरू की और 1995 तक उन्होंने थायरॉइड बायोकेमिस्ट्री में पीएचडी भी कर ली। क्वार्ट्ज़ इंडिया के हवाले से वेलु ने बताया कि उन दिनों वह पढ़ाई और कमाई दोनों साथ-साथ करते थे। भाभा अनुसंधान केंद्र, वैज्ञानिकों को पढ़ने और रिसर्च करने की छूट देता था।

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मुंबई में खुला पहला सेंटर, पत्नी ने भी छोड़ी नौक्री

वेलु यूअर स्टोरी डॉट काम को बताते हैं कि 1982 तक उन्हें यह भी नहीं पता था कि थायरॉइड ग्रंथि (ग्लैंड) कहां होता है, लेकिन 1995 में अपनी पीएचडी पूरी करने के बाद वह थायरॉइड बायोकेमिस्ट्री के एक्सपर्ट हो गए। भाभा अनुसंधान केंद्र में वेलु ने 14 साल काम किया और इसके बाद उन्होंने बेशुमार अनुभव को ऑन्त्रप्रन्योरशिप के साथ जोड़ने का फ़ैसला लिया। वेलु ने थायरॉइड बीमारी की जांच के लिए टेस्टिंग लैब की चेन खोलने का इरादा बनाया। वेलु ने अपने प्रोविडेंट फ़ंड (1 लाख रुपए) को निवेश के तौर पर इस्तेमाल किया। दक्षिण मुंबई में पहला सेंटर खुला और 37 साल की उम्र में वेलु ने अपने बिजनेस की शुरूआत की। वेलु की पहली सहयोगी बनीं उनकी पत्नी। वह स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया में काम करती थीं और वेलु के बिज़नेस में सहयोग देने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। वेलुमणि बताते हैं कि हर बिज़नेस की तरह, शुरूआती दिनों में उनके बिज़नेस को भी संघर्ष के लंबे दौर से गुज़रना पड़ा। अपने दशकों के अनुभव से वेलु बताते हैं कि जब आप संघर्ष में ही मज़ा लेना सीख लेते हैं, तब ही आप तरक्की कर सकते हैं।

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