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Humanity / मानवता की मिसाल है यह सेना का जवान, आर्थिक स्थिति खराब होने के बावजूद अपनी पूरी पेंशन खर्च कर देता है गाय-बछड़ों पर…

घर में सुविधा के नाम पर सिर्फ एक पुरानी साइकिल है

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नई दिल्ली.

देश के लिए लड़ चुके सेना के पूर्व जवान और पशु प्रेमी सूरज भूषण लोहरा अपनी पूरी पेंशन गाय-बछड़ों पर खर्च कर देता है लेकिन उन्हें इस बात का कोई मलाल नहीं है। झारखंड की राजधानी रांची से करीब 70 किलोमीटर दूर चान्हों में रहने वाले सूरज भूषण लोहरा पशु प्रेम की मिसाल हैं। वो अपनी पत्नी के साथ मिलकर पिछले कई दशकों से 60-70 गाय और बछड़े, 15-20 कुत्तों और इनती ही मुर्गियों को पाल रहे हैं। गाय के बछड़े पूरा दूध पी सकें इसलिए वो कभी गायों को दुहते तक नहीं। इन पशुओं से उनका कोई फायदा नहीं। निस्वार्थ सेवा का ये क्रम कई दशकों से चल रहा है।

 

घर में सुविधा के नाम पर सिर्फ एक पुरानी साइकिल है

सूरज भूषण लोहरा की जेब में हमेशा कुछ रोटियां रहती हैं जिन्हें वो गाय और कुत्तों को खिलाते रहते हैं। हर गाय, बछड़े और कुत्ते को वो किसी न किसी नाम से बुलाते हैं। कुत्तों के लिए बाकायदा थालियां हैं। भले ही घर में खुद के लिए पर्याप्त बर्तन नहीं।
उन्हें हर महीने करीब 19 हजार रुपए की पेंशन मिलती है। डेढ़ एकड़ से ज्यादा खेत भी है। लेकिन पत्नी के पास एक साड़ी नहीं है। घर में सुविधा के नाम पर सिर्फ एक पुरानी साइकिल है।  वे कहते हैं, "मैंने 20 साल तक फौज की सेवा की। अब इन पशुओं की देखभाल करता हूं। हम दोनों (पत्नी की तरफ देखते हुए) सुबह 3 बजे उठते हैं और रात 11 तक इन्हीं के पीछे भागते रहते हैं। कई बार हम खुद नहीं खाते, लेकिन इनके लिए खाने का इंतजाम करते हैं।" एक मीडिया से बातचीत में वे बताते हैं,  हमसे किसी का दुख बर्दास्त नहीं होता। खुद मर जाएंगे, लेकिन दूसरों को दुखी नहीं देख सकते है। कई बार मेरे भी मन में आता है कि सब सुखी के लिए मरते हैं हम क्यों नहीं, लेकिन मेरा दिल कहता है, जब तक हो दूसरों की सेवा करो।"



 

गांव के लोग उड़ाते हैं मजाक

गांव के लोग मजाक में उनके घर को चिड़ियाघर भी कहते हैं। उनके घर में मिट्टी और खपरैल के तीन कमरे हैं। लेकिन इस दंपति के पास रहने और सोने के लिए सिर्फ एक तख्त है। जिसके एक कोने में चूल्हा और कुछ जले बर्तन रखे थे। इनके पास न तो रसोई गैस और ना ही खाना पकाने के लिए कहीं लकड़ियों का इंतजाम। जबकि उनकी पत्नी रोजाना गायों और बछड़ों के लिए रोजाना 40-50 रोटी और 2 से 3 किलो चावल बनाती हैं।

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