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जोखिम /देश के सामने लंबी आर्थिक मंदी का छाया है संकट : विशेषज्ञ

  • सरकार द्वारा हाल में किए गए उपायों से अर्थशास्त्रियों को मामूली सुधार की ही उम्मीद
  • नोटबंदी के बाद से ही कई अर्थशास्त्री जता रहे हैं चिंता
  • दूसरी बार मोदी सरकार बनने के उत्साह में हालांकि दब गई हैं अर्थशास्त्रियों की चिंता

Moneybhaskar.com

Sep 17,2019 01:45:00 PM IST

नई दिल्ली. आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक लंबी आर्थिक मंदी के खतरे का सामना कर रही है। हाल में जारी हुए कई आंकड़ों से भी देश में गंभीर आर्थिक सुस्ती का पता चलता है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में देश की विकास दर महज पांच फीसदी दर्ज की गई। सरकारी आंकड़े में बताई गई यह दर पिछले करीब छह साल में सबसे कम है। इसके साथ ही कई सेक्टर मांग में भारी कमी से जूझ रहे हैं।

जल्द दूर नहीं होने जा रही यह मंदी

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक आदित्य बिड़ला ग्रुप के मुख्य अर्थशास्त्री अजित रानाडे ने मौजूदा आर्थिक स्थिति को लेकर कहा कि विकास दर में लगातार पांच तिमाहियों में गिरावट देखी जा रही है। यह अस्थायी मंदी नहीं है। इसके संरचनात्मक कारण हैं, जो जल्दी दूर नहीं होंगे।

2018-19 की दूसरी तिमाही से ही शुरू हो गई है मंदी

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी के प्रोफेसर एनआर भानुमूर्ति ने कहा कि भारत में मंदी असल में 2018-19 की दूसरी तिमाही से ही शुरू हो गई है। अब सरकार ने भी स्वीकार कर लिया है कि मंदी की स्थिति है। सरकार द्वारा हाल में किए गए उपायों से हालांकि मामूली सुधार ही होंगे। चालू वित्त वर्ष की विकास दर 6-6.5 फीसदी रहने की उम्मीद है। यानी मंदी कुछ और तिमाहियों तक बनी रह सकती है।

वैश्विक व राष्ट्रीय स्तर पर किसी अनुकूल हवा की निकट भविष्य में उम्मीद नहीं

लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स के प्रोफेसर मैत्रीश घटक ने कहा कि मंदी सिर्फ वाहन सेक्टर तक ही सीमित नहीं है। कम कीमत वाले बिस्कुट की मांग भी कम हो गई है। कोर सेक्टर की विकास दर गिर गई है। कंज्यूमर कन्फिडेंस इंडेक्स और बिजनेस एक्सपेक्टेशन इंडेक्स दोनों में निराशा झलकती है। वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर किसी अनुकूल हवा की निकट भविष्य में उम्मीद नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी अगले दो साल के लिए भारत के विकास दर अनुमान को घटा दिया है। कई विशेषज्ञ लगातार लिख रहे हैं कि नोटबंदी के बाद आर्थिक रुझान अच्छे नहीं हैं। पर ये आवाज मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के बाद दोबारा मिली सफलता के उत्साह में दबकर रह गई है।

जुलाई-सितंबर तिमाही के लिए भी संभावनाएं उत्साहजनक नहीं

क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी ने कहा कि जुलाई-सितंबर तिमाही के लिए भी संभावनाएं उत्साहजनक नहीं हैं। पहली छमाही में मंदी की स्थिति बने रहने वाली है। दूसरी छमाही में लो-बेस प्रभाव से कुछ आर्थिक तेजी की उम्मीद है।

ग्रामीण इलाकों में भी मांग बढ़ने की उम्मीद नहीं

खरीफ फसलों का उत्पादन बीते साल से कम होने की संभावना है। इसका कारण यह है कि बोए गए क्षेत्र में कमी आई है और बाढ़ ने ग्रामीण इलाकों को तबाह कर दिया है। इसलिए गांवों से मांग बढ़ने की ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती। पानी की बेहतर उपलब्धता से हालांकि रबी फसलों के बेहतर रहने की उम्मीद है। इससे कुछ भरपाई हो सकती है। पर इसके कारण ग्रामीण इलाकों में मांग बढ़ने में कम से कम तीन महीने का वक्त लगेगा।

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