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...जब देश के नामी धन्नासेठ को मामूली किसान ने चुनाव में दी थी मात

चुनाव प्रचार के लिए अपने कर्मचारियों को दे दिए थे सवैतनिक अवकाश

When a small farmer defeated kk birla in Jhunjhunu lok sabha constituency
  • जीत के लिये बिड़ला ने क्षेत्र में पानी की तरह पैसा बहाया था
  •  केके बिड़ला की मृत्यु के बाद  2009 में एक डाक टिकट भी जारी किया था

नई दिल्ली। राजस्थान में झुंझुनू लोकसभा क्षेत्र एक खास चुनाव के लिये याद किया जाता है जब देश के बड़े उद्योगपति के के बिड़ला को एक सामान्य परिवार के किसान के हाथों हार का सामना करना पड़ा। समाचार एजेंसी की खबरों के मुताबिक वर्ष 1971 में लोकसभा चुनाव में झुंझुनू क्षेत्र से उस समय के देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों में से एक कृष्ण कुमार बिड़ला स्वतंत्र पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़े थे। कांग्रेस ने उनके सामने एक सामान्य किसान परिवार के शिवनाथ सिंह गिल को मैदान में उतारा था। उस चुनाव में कांग्रेस ने राजा बनाम रंक का नारा दिया था। इन्दिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थी। पाकिस्तान के दो टुकड़े करने, बैंकों का राष्ट्रीयकरण करने, गरीबी हटाओ" के नारे से देश में उनके पक्ष में जबरदस्त हवा चल रही थी। इन्दिरा गांधी की लहर में बिड़ला शिवनाथ सिंह गिल से 98 हजार 949 मतों से हार गये थे। उस चुनाव में कांग्रेस के शिवनाथ सिंह गिल को दो लाख 23 हजार 286 (59.79 प्रतिशत) एवं के. के. बिड़ला को एक लाख 24 हजार 337 (33.30 प्रतिशत) मत मिले थे। उस चुनाव में हुयी बिड़ला की हार दुनिया भर में सुर्खियां बन गई थी।

जीत के लिये बिड़ला ने क्षेत्र में पानी की तरह पैसा बहाया था


1971 के चुनाव में वोट डालने वाले बुजुर्गों ने बताया कि वह चुनाव ऐतिहासिक था। जीत के लिये बिड़ला ने क्षेत्र में पानी की तरह पैसा बहाया था। पूरे लोकसभा क्षेत्र में लोगों को कम्बल, रजाई एवं अन्य सामग्रियां बंटवाई गयी थी। गांव- गांव में बिड़ला के चुनावी कार्यालय खोले गये थे, जहां लोगों के खाने के पूरे इंतजाम किये गये थे। शेखावाटी क्षेत्र के जो लोग बिड़ला परिवार के कारखानो में नौकरियां करते थे, उन सबको  सवैतनिक अवकाश देकर झुंझुनू में प्रचार करने के लिये भेजा गया था। अपने चुनाव प्रचार के दौरान बिड़ला कहते थे कि यदि चुनाव जीत गया तो झुंझुनू जिले में बड़ा कारखाना लगा दूंगा ताकि यहां के लोगो को रोजगार के लिये बाहर नहीं जाना पड़े, लेकिन उस समय देशभर में जनता को इन्दिरा गांधी में नई रोशनी दिख रही थी। लोगों में एक जुनून व्याप्त था। लिहाजा मतदाताओं ने बिड़ला की एक नहीं सुनी। उस चुनाव में इन्दिरा गांधी के नाम पर वोट डाला गया था। किसान एवं उद्योगपति की इस ऐतिहासिक टक्कर में किसानों ने एकजुटता दिखाई, और जीत कांग्रेस के किसान नेता शिवनाथ सिंह गिल की हुई।

 1971 से पहले चार चुनावों में झुंझुनू सीट पर धन्नासेठों का ही कब्जा था


 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के जाट प्रत्याशी शिवनाथ सिंह गिल की जीत से जाट बहुल झुंझुनू लोकसभा सीट पर पहली बार जाटों को अपनी  वोट की ताकत का एहसास हुआ था। उसके बाद 1980, 1985 और 1991 को छोड़कर झुंझुनू से सदैव जाट प्रत्याशी ही जीतता आ रहा है। वर्ष 1971 से पहले चार चुनावों में झुंझुनू सीट पर धन्नासेठों का ही कब्जा था। वर्ष 1952 से 1962 तक लगातार तीन बार कांग्रेस के प्रत्याशी एवं उद्योगपति आर.आर. मोरारका जीतते रहे थे। 1967 के चुनाव में यहां से कांग्रेस का वर्चस्व टूटा एवं स्वतंत्र पार्टी के प्रत्याशी एवं उद्योगपति राधाकृष्ण बिड़ला ने कांग्रेस के मोरारका को हराया था, लेकिन 1971 में के के बिड़ला की हार ने देश की राजनीति से उद्योगपतियों को ही दूर कर दिया।

 केके बिड़ला की मृत्यु के बाद  2009 में एक डाक टिकट भी जारी किया था


राजस्थान में झुंझुनू जिले के पिलानी के निवासी के के बिड़ला के पिता घनश्यामदास बिड़ला की गिनती उस समय देश के शीर्ष उद्योगपतियों में होती थी। वह महात्मा गांधी के भी करीबी रहे थे। के के बिड़ला के पिता सेठ घनश्यामदास बिड़ला ने ही पिलानी में विश्व प्रसिद्व बिड़ला प्रौद्योगिकी एंव विज्ञाान संस्थान (बिट्स)की स्थापना की थी, जहां देश -विदेश के हजारों छात्र अनवरत अध्ययनरत है। 1971 में चुनाव हारने के बाद वह कांग्रेस के करीब चले गये और 1984 से 2002 तक राजस्थान से कांग्रेस से राज्यसभा सदस्य रहे। भारत सरकार ने केके बिड़ला की मृत्यु के पश्चात उनकी स्मृति में 2009 में एक डाक टिकट भी जारी किया था। 

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