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चुनावी बाॅन्ड पर सुप्रीम कोर्ट का डंडा, 30 मई तक बाॅन्ड की राशि और देने वाले के बैंक खाते की देनी होगी जानकारी

सियासी चंदे के रूप में दो साल में भाजपा को मिले 1800 करोड़ से अधिक, कांग्रेस से पांच गुना अधिक

Supreme Court Seeks Electoral Bond Donor Details From Parties
  • 2017-18 में चुनावी बाॅन्ड के माध्यम से भाजपा को 210 करोड़ रुपए मिले जबकि अन्य राजनैतिक पार्टियों को 11 करोड़ रुपए।
  • इलेक्टोरल बाॅन्ड पूरी तरह से टैक्स फ्री है। न तो चंदा देने वालों को टैक्स लगता है और न ही चंदा लेने वालों को।
  • सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश एक गैर सराकरी संगठन की याचिका की सुनवाई के दौरान आया है।

नई दिल्ली. सियासी चंदे को लेकर सुप्रीम कोर्ट का मिजाज सख्त हो गया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने सभी पार्टियों को 30 मई तक चुनावी बाॅन्ड के रूप में मिली चंदे की राशि एवं बाॅन्ड के रूप में चंदा देने वालों के बैंक खाते के विस्तृत जानकारी चुनाव आयोग को देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनावी बाॅन्ड खरीद कर उन्हें चंदा देने वालों की पहचान की जानकारी भी आयोग को दी जाए। गुरुवार को चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि 2017-18 में चुनावी बाॅन्ड (electorol bond) के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को 210 करोड़ रुपए मिले जबकि अन्य राजनैतिक पार्टियों को 11 करोड़ रुपए। आयोग ने कोर्ट को बताया कि संपूर्ण सियासी चंदे के रूप में भाजपा को 2016-17 में 990 करोड़ रुपए तो 2017-18 में 997 करोड़ रुपए मिले। ये राशि इन दो साल में कांग्रेस को मिले संपूर्ण सियासी चंदे से पांच गुना अधिक है। मार्च 2019 में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दिए अपने हलफनामे में कहा था कि इलेक्टोरल बाॅन्ड से चुनावी चंदे में पारदर्शिता खत्म हो गई।

 

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एक याचिका की सुनवाई के दौरान दिया फैसला

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश एक गैर सराकरी संगठन की याचिका की सुनवाई के दौरान आया है। याचिका में इलेक्टोरल बाॅन्ड स्कीम की वैलिडिटी को चुनौती दी गई जिसमें कहा गया है कि या तो इलेक्टोरल बाॅन्ड पर रोक लगाई जाए या फिर इलेक्टोरल बाॅन्ड के माध्यम से सियासी पार्टियों को चंदा देने वालों के नाम का खुलासा किया जाए ताकि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता आ सके। मौजूदा सरकार ने 2 जनवरी, 2018 को इलेक्टोरल बाॅन्ड की अधिसूचना जारी की थी। विधान सभा और लोक सभा चुनाव में एक फीसदी वोट पाने वाले राजनैतिक दल इलेक्टोरल बाॅन्ड के माध्यम से धन प्राप्त करने के हकदार हैं।

 

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क्या है सियासी चंदे का खेल और क्या है इलेक्टोरल बांड

इलेक्टोरल बाॅन्ड के रूप में सियासी चंदे का यह खेल पूरी तरह से टैक्स फ्री भी है यानी कि न तो चंदा देने वालों को टैक्स लगता है और न ही चंदा लेने वालों को। एनडीए की पहली सरकार ने कारपोरेट कंपनियों को राजनैतिक चंदे पर टैक्स में छूट लेने की इजाजत दी। राजनैतिक पार्टियों को चंद की राशि पर पहले से ही कोई टैक्स नहीं लगता।कांग्रेस की सरकार ने चंदे के लिए इलेक्टोरल ट्रस्ट बनाने की सुविधा दी।

 

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कंपनियों को दी गई चंदे को गोपनीय रखने की छूट

मौजूदा सरकार ने वित्त विधेयक 2017 में कंपनियों के लिए राजनैतिक चंदे पर लगी अधिकतम सीमा को हटा दी। यानी कि कंपनियां अपनी मर्जी के मुताबिक चंदा दे सकती है। इससे पहले कंपनियां अपने तीन साल के शुद्ध लाभ का अधिकतम 7.5 फीसदी हिस्सा ही चंदे के रूप में दे सकती थी। कंपनियों को यह भी छूट मिल गई कि वे चाहे तो अपने चंदे को गोपनीय रखें।

 

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