Home » Economy » Policy4 साल में कहां चूक गए मोदी, क्‍यों नहीं आया काला धन

4 साल में कहां चूक गए मोदी, जानिए नौकरी से लेकर जीडीपी तक का हाल

मोदी सरकार ने सत्‍ता में अपना 4 साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है। इन चार सालों में सरकार का काम काज कैसा रहा

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नई दिल्‍ली। मोदी सरकार अब ऐसे पड़ाव पर पहुंच  गई है। जहां से उसके काम-काज का अब लेखा-जोखा तैयार होगा। उनके कार्यकाल के 4 साल में कई मुद्दे हैं, जिस पर सरकार लोगों की उम्मीद पूरी तरह से खरी नहीं उतर पाई है। यानी कही न     कहीं सरकार चूक गई है। आइए जानते हैं ऐसे मुद्दों का हाल..

 

काला धन 

 

भारतीय जनता पार्टी ने आम चुनाव के घोषणापत्र में विदेश में जमा भारतीयों का काला धन वापस लाने का वादा किया था। मोदी सरकार ने सत्‍ता में आते ही विदेश में जमा काले धन का पता लगाने और इसे वापस लाने के लिए स्‍पेशल इन्‍वेस्‍टीगेशन टीम (एसआईटी) बनाने की घोषणा की थी।  चार साल के बाद भी मोदी सरकार को विदेश में जमा काले धन का पता लगाने और उसे वापस लाने में खास सफलता नहीं मिली है। हालांकि मोदी सरकार ने देश में मौजूदा काले धन का पता लगाने ओर काला धन पैदा होने से रोकने के लिए जरूर कई कदम उठाए हैं। इन कदमों में नोटबंदी, 2 लाख रुपए से अधिक के कैश ट्रांजैक्‍शन पर रोक लगाने, बेनामी प्रॉपर्टी ट्रांजैक्‍शन अमेंडमेंट एक्‍ट 2016 शामिल है।

 

इसके अलावा मोदी सरकार ने स्विटजरलैंड, सिंगापुर, मारीशस और पनामा जैसे देशों के साथ डबल टैक्‍स अवॉयडेंस एग्रीमेंट किए। इससे ऐसे भारतीयों के संदिग्‍ध ट्रांजैक्‍शन के बारे में सरकार को जानकारी मिल रही है जो इन देशों के बैंक अकाउंट में पैसा जमा कराते हैं और इस पैसे पर भारत में टैक्‍स नहीं देते हैं। 

 

कालेधन पर नहीं लगा अंकुश 

 

इकोनॉमिस्‍ट पई पनिंदकर ने moneybhaskar को बताया कि एसआईटी विदेश में जमा काले धन पर अभी तक कुछ नहीं कर पाई है। इसके अलावा नोटबंदी से भी काले धन पर लगाम लगाने में सरकार को सफलता नहीं मिली है। काला धन अब भी पैदा हो रहा है और सरकार काले धन रिकवर नहीं कर पा रही है। 

 

रोजगार 

 

मोदी सरकार ने सत्‍ता में आने के बाद युवाओं को ट्रेनिंग देकर रोजगार मुहैया कराने के लिए स्क्लि इंडिया स्‍कीम शुरू की। इसके अलावा सरकार ने स्टार्टअप और  स्‍टैंडअप इंडिया स्‍कीम भी शुरू की लेकिन इन स्‍कीमों को जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया गया। इसकी वजह से रोजगार के मोर्चे पर चार साल में मोदी सरकार कुछ खास सुधार नहीं कर पाई है। मोदी सरकार के चार साल के काम काज पर तैयार की गई रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की रिपोर्ट में कहा गया है कि रोजगार के मोर्चे पर चुनौतियां हैं। क्‍योंकि बड़े पैमाने पर रोजगार मुहैया कराने वाले सेक्‍टर कंस्‍ट्रक्‍शन और मैन्‍यूफैक्‍चरिंग का प्रदर्शन कमजोर रहा है।

 

हाल में सरकार की ओर से जारी किए गए जॉब पेरोल डाटा से पता चलता है कि अर्थव्‍यवस्‍था का बड़ा हिस्‍सा तेजी से संगठित क्षेत्र में शामिल हो रहा है। लेकिन जॉब पेरोल डाटा के आधार पर यह कहना कि युवाओं को बड़े पैमाने पर नौकरी मिल रही है जल्‍दबाजी होगी। वहीं पई पनिंदकर का कहना है कि देश में कोई भरोसेमंद डाटा नहीं है जिसके आधार पर रोजगार को लेकर कोई सही राय बनाई जा सके। हालांकि यह सही है कि रोजगार के मोर्च पर खास सुधार नहीं हुआ है। 

 

60 फीसदी कम हो गईं नई नौकरियां 

साल  नई नौकरियां 
2014 4.21 लाख 
2015  1.35 लाख 
2016  1.35 लाख 

सोर्स- लेबर ब्‍यूरो 

 

एग्रीकल्‍चर  क्राइसिस

 

मोदी सरकार सत्‍ता किसानो की इनकम दोगुनी करने के वादे के साथ सत्‍ता में आई थी। लेकिन चार साल में इनकम दोगुनी होने के बजाए किसानों की इनकम पहले से भी कम हो गई है। एग्री एक्‍सपर्ट विजय सरदाना के मुताबिक किसानों को अपनी उपज की सही कीमत नहीं मिल रही है। खाद्यान के रिकॉर्ड उत्‍पादन होने का फायदा किसानों को सही कीमत न मिलने की मिलने की वजह से नहीं हो पा रहा है। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के अनुसार वित्‍त वर्ष 2015- 2018 के बीच औसत कृषि जीडीपी ग्रोथ रेट घट कर 2.4 फीसदी पर आ गई है। वहीं वित्‍त वर्ष 2010 से 2014 के बीच औसत कृषि जीडीपी ग्रोथ रेट 4.3 फीसदी थी।

 

रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार एग्रीकल्‍चर एंड एलाइड सेक्‍टर के लिए बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ पिछले चार साल के सबसे निचले स्‍तर पर आ गई है। मार्च 2 017-2018 में यह 3.8 फीसदी रही है जबकि मार्च 2014-15 एग्रीकल्‍चर एंड एलाइड सेक्‍टर के लिए बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ 15 फीसदी थी। बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ में बड़ी गिरावट एग्रीकल्‍चर सेक्‍टर की क्राइसिस का साफ संकेत है। किसानों को अपनी उपज की लागत पर 50 फीसदी मुनाफे के साथ न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य का अब भी इंतजार है। हालांकि मोदी सरकार ने आम बजट 2018 में उपज की लागत पर 50 फीसदी मुनाफे के साथ न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य तय करने की बात कही है। सीएसओ के डाटा के अनुसार देश में एक किसान परिवार की सालाना इनकम 20,000 रुपए है। 

 

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जीडीपी ग्रोथ 

 

अर्थव्‍यवस्‍था की मजबूती के लिए मोदी सरकार ने अपने चार साल के कार्यकाल में आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए कई कदम उठाएं हें। जैसे मोदी सरकार ने एनपीए की समस्‍या से निपटने और कारोबार करना आसान बनाने के लिए इनसॉल्‍वेंसी एंड बैंकरप्‍शी कोड, 2016 से लेकर आई। इसके अलावा रियल एस्‍टेट सेक्‍टर को रेगुलेट करने के लिए रेगुलेटरी अथॉरिटी बनाई। साथ मोदी सरकार इंडस्‍ट्री को सहूलियत देने के लिए फिक्‍स्ड टर्म जॉब का कांसेप्‍ट भी लेकर आई है। सरकार ने यह कदम अर्थव्‍यवस्‍था को रफ्तार देने के लिए उठाए। लेकिन नोटबंदी और जीएसटी की वजह से अर्थव्‍यवस्‍था को झटका लगा। मोदी सरकार के चार साल के काम काज पर रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने एक रिपोर्ट तैयार की है। रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार के कार्यकाल में वित्‍त वर्ष 2015-2018 के बीच औसत जीडीपी ग्रोथ रेट 7.3 फीसदी रही है। यह यूपीए सरकार के पहले के पांच साल की तुलना में कम है। वित्‍त वर्ष 2010 से 2015 के बीच औसत जीडीपी ग्रोथ रेट 7.5 फीसदी रही थी। 

 

 

फ्रॉड का सिंबल बने विजय माल्‍या और नीरव मोदी 

 

शराब कारोबारी विजय माल्‍या बैंकों का 9 हजार करोड़ रुपए से अधिक का कर्ज चुकाए बिना विदेश भाग गए। इसके अलावा नीरव मोदी ने भी पंजाब नेशनल बैंक में 13 हजार रुपए करोड़ रुपए फ्रॉड करने के बाद देश छोड़ दिया। इन दो मामलों को मोदी सरकार की बड़ी असफलता के रूप में देखा जा रहा है कि सरकार इन दोनों को देश छोड़ने से नहीं रोक पाई और न ही इनको अब तक विदेश से वापस लाने में सफल हुई है। इन दो मामलों से आम जनता के बीच मोदी सरकार की साख कमजोर हुई है और जनता में यह धारणा बनी है कि अमीर कारोबारी मोदी सरकार में भी भ्रष्‍ट सिस्‍टम का फायदा उठा कर सरकारी बैंकों के पैसों को हड़प रहे हैं और सरकार कोई कारगर कदम नहीं उठा रही है। 

 


 

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