जानें, कहां बनता है आपका तिरंगा झंडा, हर किसी को बनाने की नहीं है छूट 

Know the facts of National Flag : देश 70वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। देश में जगह-जगह राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया जा रहा है, लेकिन हर भारतीय की आन, बान और शान के प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज के बारे में जानते हैं कि ये तिरंगा कहां बनाते हैं। आइए, आज हम आपको इस बारे में पूरी जानकारी दे रहे हैं। 
 

Money Bhaskar

Jan 25,2019 04:17:00 PM IST

नई दिल्‍ली। देश 70वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। देश में जगह-जगह राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया जा रहा है, लेकिन हर भारतीय की आन, बान और शान के प्रतीक राष्ट्रीय ध्वज के बारे में जानते हैं कि ये तिरंगा कहां बनाते हैं। आइए, आज हम आपको इस बारे में पूरी जानकारी दे रहे हैं।

अकेला अधिकृत संस्थान


- कर्नाटक खादी ग्रामोद्वोग संयुक्‍त संघ (फेडरेशन) (KKGSS) खादी व विलेज इंडस्‍ट्रीज कमीशन द्वारा सर्टिफाइड देश की अकेली ऑथराइज्‍ड नेशनल फ्लैग मैन्‍यूफैक्‍चरिंग यूनिट है।
- यह कर्नाटक के हुबली शहर के बेंगेरी इलाके में स्थित है और इसे हुबली यूनिट भी कहा जाता है।
-KKGSS की स्‍थापना नवंबर 1957 में हुई थी और इसने 1982 से खादी बनाना शुरू किया।
- 2005-06 में इसे ब्‍यूरो ऑफ इंडियन स्‍टैंडर्ड्स (BIS) से सर्टिफिकेशन मिला और इसने राष्‍ट्रीय ध्‍वज बनाना शुरू किया।
- देश में जहां कहीं भी आधिकारिक तौर पर राष्‍ट्रीय ध्‍वज इस्‍तेमाल होता है, यहीं के बने झंडे की होती है सप्‍लाई।
- विदेशों में मौजूद इंडियन एंबेसीज के लिए भी यहीं बनाए जाते हैं झंडे।
- इसके अलावा ऑर्डर व कुरियर के जरिए कोई भी कर सकता है खरीद।

धागा व कपड़ा बनाने के लिए अलग यूनिटें


- KKGSS की बागलकोट यूनिट में हाई क्‍वालिटी के कच्‍चे कॉटन से बनाया जाता है धागा
- गाडनकेरी, बेलॉरू, तुलसीगिरी में कपड़ा होता है तैयार, फिर हुबली यूनिट में होती है डाई व बाकी की प्रॉसेस
- जीन्‍स से भी ज्‍यादा मजबूत होता है कपड़ा
- केवल कॉटन और खादी के बनते हैं झंडे
- हाथ से मशीनों व चरखे के जरिए बनाया जाता है धागा

टेबल से लेकर राष्‍ट्रपति भवन तक के झंडे



1- सबसे छोटा 6:4 इंच- मीटिंग व कॉन्‍फ्रेंस आदि में टेबल पर रखा जाने वाला झंडा
2- 9:6 इंच- वीवीआईपी कारों के लिए
3- 18:12 इंच- राष्‍ट्रपति के वीवीआईपी एयरक्राफ्ट और ट्रेन के लिए
4- 3:2 फुट- कमरों में क्रॉस बार पर दिखने वाले झंडे
5- 5.5:3 फुट- बहुत छोटी पब्लिक बिल्डिंग्‍स पर लगने वाले झंडे
6- 6:4 फुट- मृत सैनिकों के शवों और छोटी सरकारी बिल्डिंग्‍स के लिए
7- 9:6 फुट- संसद भवन और मीडियम साइज सरकारी बिल्डिंग्‍स के लिए
8- 12:8 फुट- गन कैरिएज, लाल किले, राष्‍ट्रपति भवन के लिए
9- सबसे बड़ा 21:14 फुट- बहुत बड़ी बिल्डिंग्‍स के लिए

आसान नहीं है देश का राष्‍ट्रीय ध्‍वज बनाना


- BIS करता है क्‍वालिटी चेक, डिफेक्‍ट होने पर कर देता है रिजेक्‍ट
- हर सेक्‍शन पर कुल 18 बार होता है क्‍वालिटी चेक, 10 फीसदी हो जाते हैं रिजेक्‍ट
- KVIC और BIS द्वारा निर्धारित रंग के शेड से अलग नहीं होना चाहिए रंग
- केसरिया, सफेद और हरे कपड़े की लंबाई-चौड़ाई में नहीं होना चाहिए जरा सा भी अंतर
- अगले-पिछले भाग पर अशोक चक्र की छपाई होनी चाहिए समान
- फ्लैग कोड ऑफ इंडिया 2002 के प्रावधानों के मुताबिक, झंडे की मैन्‍यूफैक्‍चरिंग में रंग, साइज या धागे को लेकर किसी भी तरह का डिफेक्‍ट एक गंभीर अपराध है और ऐसा होने पर जुर्माना या जेल या दोनों हो सकते हैं।
- इतने चरणों में बनता है राष्‍ट्रीय ध्‍वज- धागा बनाना, कपड़े की बुनाई, ब्‍लीचिंग व डाइंग, चक्र की छपाई, तीनों पटिृयों की सिलाई, आयरन करना और टॉगलिंग (गुल्‍ली बांधना)
- जापान की 30 मशीनों का हो रहा है इस्‍तेमाल


देश में अकेली यूनिट

KKGSS खादी व विलेज इंडस्‍ट्रीज कमीशन द्वारा सर्टिफाइड देश की अकेली ऑथराइज्‍ड नेशनल फ्लैग मैन्‍यूफैक्‍चरिंग यूनिट है।

250 लोग करते हैं काम

- धागा बनाने से लेकर झंडे की पैंकिंग तक में 250 लोग करते हैं काम
- मात्र 10-20 पुरुष, बाकी है महिलाएं
- 8-10 घंटे तक होता है काम
- हुबली यूनिट के वर्कर्स की डेली इनकम है मात्र 350 रुपए रोजाना तक।
- वहीं बागलकोट खादी वीविंग सेंटर की महिलाओं की डेली इनकम है मात्र 100 रुपए तक
-इन वर्कर्स की इनकम में पिछले 6 महीनों में 10 से 20 फीसदी तक की बढ़त हुई है।

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