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खास खबर: आर्थिक वजहों से टूट जाते हैं राजनीतिक रिश्ते, ये है स्पेशल स्टेटस का गणित

चंद्र बाबू नायडू को राज्य के लिए जब फाइनेंशियल सपोर्ट मिल रहा था, फिर क्यों वह स्पेशल स्टेटस चाहते है

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नई दिल्‍ली।  स्पेशल स्टेट्स के नाम पर बरसों पुरानी नरेंद्र मोदी और चंद्र बाबू नायडू की दोस्ती टूटने के कगार पर पहुंच  गई है। यह नाता तब टूट रहा है, जब आंध्र प्रदेश सरकार  को मोदी सरकार फाइनेंशियल सपोर्ट देने का वादा कर रही थी। ऐसे में सवाल उठता है कि चंद्र बाबू नायडू को राज्य के लिए जब फाइनेंशियल सपोर्ट मिल रहा था, फिर क्यों वह स्पेशल स्टेटस चाहते है। आखिर स्पेशल स्टेटस से ऐसा क्या फायदा होता है जिस पर वह टस से मस नहीं हुए। भले ही, उन्हें अपनी  दोस्ती तोड़नी पड़ी। दरअसल, इसके पीछे की वजह केवल पॉलिटिकल नहीं है। किसी भी आर्थिक रूप से पिछड़े राज्य के लिए स्पेशल स्टेटस मिलना कई मायने में खास होता है, जिसका नायडू की तरह नीतीश कुमार तक दांव चल चुके हैं। संविधान विशेषज्ञ से लेकर रिसर्च ऑर्गनाइजेशन का कहना है कि स्पेशल स्टेटस किसी भी राज्य को कई सहूलियतें देता है, जो उसे फाइनेंशियल सपोर्ट के रूप में नहीं मिलती है। ऐसे में खास तौर से क्षेत्रीय पार्टियां अपने पॉलिटिकल कैरियर को इसके लिए दांव पर लगा देती है।

 

स्पेशल स्टेटस मिलने से ये होते हैं फायदे
पीआरएस लेजिस्लिेटिव रिसर्च ने कहा कि इस कैटेगिरी में राज्यों को डालने का उद्देश्य उन्हें केंद्र से सहायता और टैक्स रियायतें मुहैया कराना होता है। इस कैटेगरी में आने वाले राज्य आम तौर पर पिछड़े या गरीब हुआ करते हैं। इन राज्‍यों को केंद्र से मिलने वाली नॉर्मल सेंट्रल असिस्‍टेंस (एनसीए) के तहत 90% ग्रांट और 10% लोन मिलता है। जबकि सामान्‍य राज्‍यों को 30% ग्रांट और 70% लोन मिलता है। स्‍पेशल स्‍टेटस वाले राज्‍यों को केंद्र से मिलने वाले आवंटन की बात करें तो फंड और उसके वितरण का कोई एक पैमाना नहीं होता और ये राज्य को मिलने वाले प्लान के आकार और पिछले योजनागत खर्च पर निर्भर करता है। 

 

मोदी सरकार क्यों नहीं देना चाहती है स्टेट्स
मोदी सरकार का कहना है कि 14वें वेतन आयोग के मुताबिक अब किसी भी राज्‍य को स्‍पेशल कैटेगरी का स्‍टेटस नहीं दिया जाएगा। दरअसल, सरकार बार-बार राज्‍यों से उठने वाली स्‍पेशल स्‍टेट्स की मांग से परेशान होकर यह व्‍यवस्‍था की है कि अब किसी भी राज्‍य को यह स्‍टेट्स नहीं दिया जाएगा। 


केवल फाइनेंशियल सपोर्ट क्यों राज्यों को मंजूर नहीं
जानकारों के मुताबिक, राज्‍य सरकारें चाहती हैं कि उन्‍हें स्‍पेशल स्‍टेट्स दिया जाए, ताकि केंद्र के हर तरह के सपोर्ट में उसका हिस्‍सा अपने आप राज्‍य को मिल जाए। इस मामले से जुड़े एक वरिष्‍ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि केंद्र सरकार फाइनेंशियल सपोर्ट उस राज्‍य को देगी, जहां उनकी पार्टी या सहयोगियों की सरकार है, जबकि राज्‍य को यदि स्‍पेशल कैटेगरी का स्‍टेटस मिल जाता है तो विपक्षी पार्टी की सरकार होने के बावजूद उन्‍हें केंद्र से सपोर्ट मिलता रहेगा। यही वजह है कि स्‍पेशल स्‍टेटस मिलना राज्‍य के पक्ष में रहता है। 

 

क्या अब भी सरकार दे सकती है स्टेट्स 
पूर्व कानून मंत्री एवं सीनियर एडवोकेट शांति भूषण ने moneybhaskar.com को बताया कि अलग राज्‍य बनने के बाद आंध्र प्रदेश को ज्‍यादा पैसे की जरूरत है। आंध्र को अपने इंस्‍टीट्यूशंस खड़े करने हैं। राजधानी बनानी है। आंध्र को राजस्‍व घाटा भी हो रहा है। ऐसी स्थिति में जब राज्‍य सरकार अपने स्‍तर पर राज्‍य की इकोनॉमी में सुधार नहीं कर पाती तो वह केंद्र से स्‍पेशल स्‍टेटस की मांग करती है, ताकि उसे केंद्र सरकार नॉर्मल से अधिक फाइनेंशियली हेल्‍प मिल सके। टीडीपी की मांग सही है और अगर केंद्र सरकार चाहे तो यह स्‍टेटस दे सकती है, क्‍योंकि संविधान बदलने या आयोग के नियम बदलने का अधिकार सरकार के पास है। 

 

आगे पढ़ें : क्‍या है पूरा विवाद 

क्‍या है पूरा विवाद

 

दरअसल आंध्रप्रदेश और केंद्र सरकार के बीच राज्‍य की आर्थिक स्थिति को लेकर मतभेद है। आंध्र प्रदेश का कहना है कि उसको 16 हज़ार करोड़ रुपए का राजस्व घाटा हुआ है। जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि आंध्र को केवल 4000 करोड़ रुपए का राजस्व घाटा हुआ है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश राजधानी अमरावती के लिए 33 हज़ार करोड़ और पोलवरम के लिए 33 हज़ार करोड़ रुपए मांग रहा है, जबकि केंद्र ने पोलवरम के लिए 5 हज़ार करोड़ रुपए दिए हैं जबकि अमरावती के लिए 2500 करोड़ दे चुका है, जिसमें गुंटूर-विजयवाड़ा के लिए 500-500 करोड़ रुपए शामिल है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश चाहता है कि हडको और नाबार्ड से फ़ंडिंग राज्‍यों को फंडिंग मिले, जबकि केंद्र चाहता है कि वर्ल्ड बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से पैसा लिया जाए। 

 

इन राज्‍यों को मिला है स्‍पेशल स्‍टेटस
शुरुआत में सिर्फ़ तीन राज्यों- असम, नगालैंड और जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों को विशेष दर्जा दिया गया था लेकिन बाद में अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिज़ोरम, सिक्किम, त्रिपुरा और उत्तराखंड जैसे आठ और राज्यों को ये दर्जा दिया गया.

 

बिहार में भी उठ चुकी है मांग 
2005 में जब बिहार और झारखंड अलग अलग हुए थे तो तब से ही बिहार भी स्‍पेशल स्‍टेटस की डिमांड कर रहा है। यूपीए सरकार में तो नीतिश कुमार ने मुख्‍यमंत्री के तौर पर इस मुद्दे को उठाया और यूपीए के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। इसके अलावा जम्‍मू कश्‍मीर में भी स्‍पेशल स्‍टेटस को लेकर विवाद हो चुका है। 

 

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