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18 करोड़ दलित युवाओं को सरकार नहीं दे सकती नौकरी, बिजनेस के लिए करें तैयार : कांबले

moneybhaskar.com ने दलित चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्‍ट्री (डिक्‍की) के फाउंडर चेयरमैन मिलिंद कांबले से बातचीत की

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नई दिल्‍ली। एससी/एसटी एक्‍ट में कथित बदलाव के विरोध में शुरू हुए दलित आंदोलन को लेकर देश में बहस छिड़ी हुई है। इस आंदोलन के साथ-साथ लोग दलित आरक्षण पर भी बहस कर रहे हैं। दलित संगठनों का आरोप है कि केंद्र सरकार आरक्षण खत्‍म करने की तैयारी कर रही है, हालांकि गृह मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा के राष्‍ट्रीय अमित शाह इससे इंकार कर रहे हैं। बावजूद इसके, मुद्दा गरमाया हुआ है। ऐसे में, सवाल यह उठता है कि लगभग 70 साल बाद भी देश में दलित आरक्षण पर राजनीति क्‍यों हो रही है? दलितों की आर्थिक दशा में सुधार क्‍यों नहीं हुआ? दलित युवाओं के सामने आगे क्‍या विकल्‍प हैं? ऐसे कई अहम सवालों को लेकर मनीभास्‍कर के राजू सजवान ने दलित चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्‍ट्री (डिक्‍की) के फाउंडर चेयरमैन मिलिंद कांबले से बातचीत की। प्रस्‍तुत हैं, इस बातचीत के अंश : 

 
कोई सरकार 18 करोड़ दलित युवाओं को नौकरी नहीं दे सकती। 
दलित आंदोलन के बाद उठ रहे सवालों के जवाब में मिलिंद कांबले ने कहा कि हर वर्ग को अपनी बात सरकार तक पहुंचाने के लिए लोकतंत्र में आंदोलन की पूरी आजादी है, लेकिन जिस तरह से इस आंदोलन में हिंसा हुई, उसका समर्थन नहीं किया जा सकता, हिंसा की किसी को इजाजत नहीं। जहां तक आरक्षण की बात है तो केवल आरक्षण दलितों की समस्‍या का समाधान नहीं है। देश में लगभग 18 करोड़ युवा दलित हैं, जिनकी उम्र 20 से लेकर 35 साल है। और इतनी बड़ी संख्‍या को कोई भी सरकार नौकरी नहीं दे सकती। उन्‍हें रोजगार के अवसर प्रदान करने होंगे। स्किल डेवलपमेंट और सेल्‍फ इम्‍प्‍लॉयमेंट स्‍कीम्‍स को प्रमोट करना होगा। मुझे लगता है कि वर्तमान सरकार इस दिशा में काम कर रही है। 
 
राजनीतिक पार्टियों ने नहीं किया इकोनॉमिक डेवलपमेंट पर फोकस 
कांबले ने कहा कि देश को आजाद हुए 70 साल से अधिक समय हो चुका है, बावजूद इसके अब तक दलितों की स्थिति में कुछ ज्‍यादा अंतर नहीं आया। इसकी वजह यह रही कि राजनीतिक दलों और दलित संगठनों ने दलितों को इमोशनल इश्‍यू पर ही अटकाये रखा। उनके इकोनॉमिक डेवलपमेंट के बारे में न तो सोचा और ना ही सरकारों पर दबाव बनाया, ताकि सरकारें दलित समाज के इकोनॉमिक डेवलपमेंट के लिए ठोस पॉलिसी बनाएं। उन्‍होंने कहा कि इकोनॉमिक डेवलपमेंट से दलित समाज की बहुत सारी समस्‍याएं दूर हो जाएंगी। 
 
प्राइवेट सेक्‍टर में भी हो आरक्षण 
डिक्‍की चेयरमैन ने कहा कि बेशक आरक्षण सभी समस्‍याओं का समाधान नहीं है, लेकिन अभी दलितों को आरक्षण की जरूरत है। गर्वनमेंट सेक्‍टर में ही नहीं, बल्कि प्राइवेट सेक्‍टर में भी दलितों को आरक्षण मिलना चाहिए। इससे बेरोजगार दलितों को रोजगार मिलेगा और उनकी आर्थिक दशा सुधरने से कुछ तो हालात सुधरेंगे। 
 
 मोदी सरकार का काम अच्छा
साल 2005 में मिलिंद कांबले ने डिक्‍की की स्‍थापना की थी। तब से कांबले एक्टिव हैं। वह कहते हैं कि उन्‍होंने पिछली सरकार के साथ भी काम किया और इस सरकार के साथ भी काम कर रहे हैं। लेकिन दलितों में स्‍वरोजगार की भावना पैदा करने और उन्‍हें रोजगार उपलब्‍ध कराने की दिशा में मोदी सरकार जिस तरह काम कर रही है, वह काफी अच्छा है। 
 
मुद्रा 
मोदी सरकार ने अब तक का सबसे बड़ा फाइनेंशियल इन्‍क्‍लूजन प्रोग्राम चलाया, जिसे प्रधानमंत्री मुद्रा स्‍कीम कहा जाता है। इस स्‍कीम के तहत 12 करोड़ लोगों को लोन दिया गया। इसमें से 18 फीसदी एससी और 5 फीसदी एसटी हैं। सरकार ने जन धन योजना चला कर दलितों के बैंक खाते खोलकर उन्‍हें फॉर्मल बैंकिंग से जोड़ा और इसके बाद उन्‍हें मुद्रा योजना के तहत लोन दिया गया। 
 
स्‍टैंड अप इंडिया 
इसके अलावा सरकार ने स्‍टैंड अप इंडिया स्‍कीम के तहत 10 लाख से लेकर 1 करोड़ रुपए तक का लोन देना शुरू किया। अब तक 9000 एससी वर्ग और 3000 एसटी वर्ग के लोगों को लोन दिया जा चुका है। स्‍टैंड अप इंडिया की औसत लैंडिंग अमाउंट 16 लाख रुपया है। बिजनेस शुरू करने के लिए यह काफी है। वेंचर कैपिटल फंड स्‍कीम के तहत दलितों को फाइनेंशियल और अन्‍य तरह की सपोर्ट दी जा रही है। 
 
नेशनल एससी/एसटी हब 
कांबले के मुताबिक, मोदी सरकार ने एक और अहम कदम उठाया है। मिनिस्‍ट्री ऑफ एमएसएमई के तहत नेशनल एससी / एसटी हब की शुरुआत की है। जिसका मकसद एससी और एसटी वर्ग को जागरूक करना है, ताकि वे अधिक से अधिक संख्‍या में सरकारी स्‍कीम्‍स का फायदा उठा सकें। 
 
आगे पढ़ें : सरकारी कंपनियों को माइंडसेट बदलना होगा 

 

सरकारी कंपनियों का माइंड सेट बदलेगा 
एक और बड़ी योजना है, पब्लिक प्रोक्‍योरमेंट पॉलिसी। कांबले ने कहा कि इस स्‍कीम के तहत छोटे कारोबारियों से बड़ी सरकारी कंपनियों को अपनी कुल खरीद का 20 फीसदी हिस्‍सा खरीदना होता है। इस 20 में से 4 फीसदी हिस्‍सा एससी व एसटी कारोबारियों से की जा रही है। इस साल अब तक सरकारी कंपनियां एससी व एसटी कारोबारियों से 373 करोड़ रुपए की खरीददारी कर चुकी हैं। हालांकि अभी भी कई कंपनियां पुराने माइंडसेट के कारण कोई न कोई बहाना बना कर खरीददारी नहीं कर रही हैं, लेकिन सरकार ने इन आंकड़ों को पब्लिक डोमिन में डालना शुरू कर दिया है। इसका फायदा यह होगा कि सरकारी कंपनियों पर खरीददारी का दबाव बनेगा और उन्‍हें अपना माइंडसेट बदलना होगा।
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