Home » Economy » Policyरिपेयर, रिफॉर्म और डिसरप्‍शन के नाम रहा 2017-economic issues dominates in 2017

रिपेयर, रिफॉर्म और डिसरप्‍शन के नाम रहा 2017, ऐसे छाए रहे आर्थिक मुद्दे

अगर आप पीछे छूट रहे 2017 को अर्थव्‍यवस्‍था के लिहाज से 3 शब्‍दों में याद करना चाहें तो इसे रिपेयर, रिफॉर्म और डिसरप्‍शन

1 of


नई दिल्‍ली। अगर आप पीछे छूट रहे 2017 को अर्थव्‍यवस्‍था के लिहाज से 3 शब्‍दों में याद करना चाहें तो इसे रिपेयर, रिफॉर्म और डिसरप्‍शन के तौर पर याद किया जा सकता है।  साल 2017 नोटबंदी, जीएसटी और जीडीपी जैसे आर्थिक मुद्दे छाए रहे। इन तीनों मुद्दों में आप रिपेयर, रिफॉर्म और डिसरप्‍शन की झलक देख सकते हैं! क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्‍ट डीके जोशी का कहना है कि 2017 रिपेयर, रिफॉर्म और डिसरप्‍श्‍रान के नाम रहा।  आम आदमी हो या सरकार हो या मीडिया में इन आर्थिक मुद्दों से होने वाले नफा नुकसान पर जम कर चर्चा हुई। आजादी के बाद शायद 2017 ऐसा इकलौता साल होगा जिसमें इतने बड़े पैमाने पर आर्थिक मुद्दे छाए रहे। सोशल मीडिया और इंटरनेट का प्रसार बढ़ने की वजह से भी यह मुद्दे घर घर तक पहुंच गए। 
 

नोटबंदी 

 

नोटबंदी का ऐलान 8 नवंबर, 2016 को किया गया था। इसके तहत मोदी सरकार ने 500 रुपए और 1,000 रुपए के पुराने नोट को अवैध घोषित कर दिया था। लेकिन नोटबंदी की वजह से लोगों को कैश को लेकर होने वाली दिक्‍कतों और इसके प्रभाव को लेकर 2017 में पूरे साल बहस होती रही। केंद्र सरकार ने नोटबंदी को अर्थव्‍यवस्‍था को काले धन से मुक्‍त करने का प्रयास बताया। इस लिहाज से आप इसे अर्थव्‍यवस्‍था के रिपेयर के तौर पर देख सकते हैं लेकिन नोटबंदी के बाद कई माह तक कैश की किल्‍लत की वजह से देश में आर्थिक गतिविधियां में गिरावट आई। ऐसे में नोटबंदी को आप डिसरप्‍शन यानी बाधा के तौर पर देख सकते हैं। रिजर्व बैंक के डाटा के अनुसार नोटबंदी के समय देश में कुल 15.28  लाख करोड़ रुपए की करेंसी सर्कुलेशन में थी वहीं जून 2047 तक बैंकों में 15.44 लाख करोड़ रुपए की करेंसी वापस आ गई। इस तरह से लगभग 99 फीसदी करेंसी सिस्‍टम में वापस आ गई। रिजर्व बैंक के डाटा के आधार पर यह भी कहा गया कि जब 99 फीसदी करेंसी वापस आ गई तो काला धन कहां गया। हालांकि केंद्र सरकार ने साफ किया कि बैकिंग सिस्‍टम में जो पैसा वापस आया है उसकी जांच की जा रही है। जांच के बाद पता चलेगा कि इसमें से कितना वैध पैसा है और कितना काला धन है। इनकम टैक्‍स विभाग ने नोटबंदी की अवधि में कैश जमा कराने वाले लगभग 18 लाख लोगों को नोटिस भेज कर ट्रांजैक्‍शन के बारे में जानकारी मांगी। इसमें से लगभग 9 लाख लोगों ने नोटिस का जवाब दिया जबकि बाकी लोगों ने कोई जवाब नहीं दिया है। अब इनकम टैक्‍स विभाग इन लोगों के खिलाफ एक्‍शन की तैयारी कर रहा है। 


जीएसटी 

 

जुलाई 2017 में देश में इनडायरेक्‍ट टैक्‍स के क्षेत्र में सबसे बड़ा सुधार गुड्स एंड सर्विस टैक्‍स (जीएसटी) लागू किया गया। देश के कारोबारी जीएसटी से बड़े पैमाने पर प्रभावित हुए। देश के तमाम हिस्‍सों में जीएसटी को लागू किए जाने का विरोध भी हुआ। जीएसटी की वजह से छोटे कारोबारियों का खर्च बढ़ गया । केंद्र सरकार ने बाद में  तमाम वस्‍तुओं पर जीएसटी रेट में बदलाव भी किए। इकोनॉमिस्‍ट और एक्‍सपर्ट ने दावा किया कि जीएसटी से लॉग टर्म में इकोनॉमी को फायदा होगा। देश में बड़े पैमाने पर चल रही इकोनॉमिक एक्टिविटी फॉर्मल सेक्‍टर में आएगी। हालांकि कम अवधि में जीएसटी की वजह से देश की अर्थव्‍यवस्‍था को झटका लगा है। यानी जीएसटी में आप रिपेयर, रिफॉर्म और डिसरप्‍शन तीनों चीजों की झलक देख सकते हैं। 
 
जीडीपी 
 
सकल घरेलू उत्‍पाद यानी जीडीपी ग्रोथ के लिहाज से भी 2017 बेहद अहम साल रहा। 2017 में अप्रैल- जून तिमाही में जीडीपी ग्रोथ रेट गिर कर 5.7 फीसदी के स्‍तर पर आ गई। सरकार ने 1 जुलाई से जीएसटी लागू करने की घोषणा कर दी थी। इसकी वजह से कंपनियों ने अपना स्‍टॉक क्लियर करने पर जोर दिया और मैन्‍यूफैक्‍चरिंग गतिविधियों में गिरावट आई। मई 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद पिछली 13 तिमाही में यह सबसे कम जीडीपी ग्रोथ रेट था। जीडीपी ग्रोथ रेट में गिरावट जून 2016 से ही शुरू हो गई थी। जून 2016 में जीडीपी ग्रोथ 7.9 फीसदी थी। सितंबर 2016 में यह गिर कर 7.5 फीसदी के स्‍तर पर आ गई। दिसंबर 2016 में यह गिर कर 7 फीसदी और मार्च 2017 में यह 6.1 फीसदी पर आ गई। वहीं अप्रैल- जून 2017 में यह गिर 5.7 फीसदी के स्‍तर पर आ गई। जून तिमाही में जीडीपी में गिरावट को विपक्ष ने बड़ा मुद्दा बनाया। मीडिया में भी इस पर चर्चा और बहस हुई। यह मामला इतना बड़ा हो गया कि इस पर लोग और सार्वजनिक जगहों पर भी चर्चा करने लगे। इस तरह से जीडीपी ग्रोथ रेट को 2017 में अर्थव्‍यवस्‍था के लिहाज से डिसरप्‍शन यानी बाधा के तौर पर देख सकते हैं। 
 
 अवधि जीडीपी ग्रोथ रेट 
जून, 2016  7.9 %
सितंबर 2016  7.5 %
दिसंबर 2016  7 %
मार्च 2017  6.1%
जून 2017  5.7%

सोर्से- भारत सरकार 

 

आगे पढ़ें-  नौकरियों पर फंसी मोदी सरकार 

 

 

युवाओं को नहीं मिली नौकरियां 

 

2017 में युवाओं को नौकरियां न मिलने का मुद्दा भी मोदी सरकार के लिए परेशानी का सबब बना रहा। श्रम मंत्रालय के डाटा के मुताबिक मोदी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में नौक‍रियां 60 फीसदी तक कम गईं। यानी नौकरियों के लिहाज से 2017 का साल डिसरप्‍शन यानी बाधा का रहा। 2017 में युवाओं को नौकरियां न देना मोदी सरकार की बड़ी विफलता के तौर पर देखा गया। विपक्ष ने श्रम विभाग के डाटा को आधार बनाते हुए मोदी सरकार पर खूद निशाना साधा। वहीं नौकरी के मोर्चे पर मोदी सरकार की नाकामी और इससे युवाओं में पैदा हो रहे असंतोष पर मीडिया के साथ घर घर में चर्चा हुई।

साल नौकरियां 
2014 4.21 लाख 
2015 1.35 लाख 
2016 1.35 लाख 

सोर्स-श्रम मंत्रालय 
 

prev
next
मनी भास्कर पर पढ़िए बिज़नेस से जुड़ी ताज़ा खबरें Business News in Hindi और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट