Home » Economy » PolicyModi Govt : मोदी सरकार के चार साल, अच्‍छे दिन आए या नहीं

मोदी के वादों का 4 साल में हुआ ये हाल, आप खुद तय करें कि अच्‍छे दिन आए या नहीं

चार साल पहले आज ही के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में केंद्र में एनडीए की सरकार बनी थी।

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नई दिल्ली। चार साल पहले आज ही के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में केंद्र में एनडीए की सरकार बनी थी। यूपीए के 10 साल के शासन के बाद बीजेपी की अगुआई वाले एनडीए ने अच्छे दिन के वादों के साथ भारी बहुमत जीता       था। भाजपा का वादा था कि उनकी सरकार बनने के बाद अच्छे दिन हर तरह से आएंगे। यानी कि लोगों को महंगाई से राहत मिलेगी, कर्ज सस्ता होगा, हर साल 1 करोड़ नौकरियां मिलेंगी। सबके पास घर होगा, बिजनेस करना आसान होगा, किसान की इनकम डबल हो जाएगी। आइए जानते हैं कि 4 साल में मोदी सरकार के काम-काज से देश की जनता जो कन्ज्यूमर भी है और उसमें से एक बड़ा वर्ग बिजनेसमैन भी है, उसके लिए अच्छे दिन का क्या मतलब रहा...
 
 
कंज्‍यूमर 
 
महंगाई : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब सत्‍ता संभाली थी, उस समय सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती महंगाई थी। लेकिन अच्‍छी बरसात और क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट की वजह से महंगाई में कमी आई। क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्‍ट  डीके जोशी ने बताया कि साल 2013-14 में महंगाई दर 9.5 फीसदी थी, जो 2017-18 में 3.6 फीसदी तक पहुंच गई और 2018-19 में 4.6 फीसदी पहुंचने का अनुमान है। यहां यह उल्‍लेखनीय है कि पिछले कुछ दिनों से क्रूड ऑयल की कीमतों में वृद्धि की वजह से पेट्रोल डीजल की कीमतें रिकॉर्ड बढ़ोतरी तक पहुंच गई है। पिछले पांच साल के दौरान महंगाई दर इसप्रकार रही। 
2013-14 9.5 फीसदी 
2014-15  6 फीसदी 
2015-16  5 फीसदी
2016-17 4.5 फीसदी 
2017-18 3.6 फीसदी 
2018-19 
4.6 फीसदी (अनुमानित) 

 

लोन : चार साल के दौरान लोन भी सस्‍ता हुआ है।  क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, चार साल के दौरान एमसीएलआर में 116 बेस प्‍वाइंट, हाउसिंग लोन रेट में 190 बेस प्‍वाइंट, ऑटो लोन रेट में 150 बेस प्‍वाइंट की कमी आई है। 
 
बिजली : आम आदमी के लिए बिजली की उपलब्‍धता एक बड़ा मुद्दा है। मोदी सरकार ने इस ओर ध्‍यान भी दिया है। CEA के आंकड़ों के मुताबिक - 

 

साल

कमी

2013-14

-42,428 एमयू (-4.2%)

2014-15

-38130 एमयू ( -3.6%)

2015-16

-23,522 एमयू (-2.1%)

2016-17

-7,461 एमयू (-0.7%)

2017-18

- 8,567 एमयू (1.7% )

घर : प्रधानमंत्री ने शहरों में 2 करोड़ और गांवों में 1 करोड़ घर बनाने का लक्ष्‍य रखा था। लेकिन 21 मई 2018 तक केवल 443966 घर ही बन पाए हैं। जबकि गांवों में 8,38,140 घर ही बन पाए हैं।  वहीं, प्राइवेट डेवलपर्स की नकेल कसने के लिए रियल एस्‍टेट रेग्‍युलेशन एक्‍ट (रेरा) लाया गया, लेकिन राज्‍यों ने अब तक ढंग से लागू नहीं किया, जिस कारण लगभग 30 लाख लोगों को पैसा चुकाने के बावजूद घर नहीं मिल पाया है। 

 
बिजनेस 
 
ईज ऑफ डूइंग बिजनेस : किसी भी देश की अर्थव्‍यवस्‍था के लिए यह बेहद जरूरी है कि देश में बिजनेस करना आसान हो। इसी के चलते मोदी सरकार ने ईज ऑफ डुइंग बिजनेस के लिए कई महत्‍वपूर्ण फैसले लिए। जिसकी बदौलत वर्ल्‍ड बैंक की ग्‍लोबल रैंकिंग में भारत का स्‍थान 130 से घटकर 100 पर पहुंच गया है। इंटिग्रेटिड एसोसिएशन्‍स ऑफ माइक्रो, स्‍मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज के अध्‍यक्ष राजीव चावला के मुताबिक, उद्योग आधार, डिमोनि‍टाइजेशन, जीएसटी जैसे कड़े कदमों के कारण इंडस्‍ट्री को फौरी दिक्‍कतें हुई, जिसका फायदा कारोबारियों को मिलेगा। 
 
क्रेडिट : बिजनेस के ग्रोथ में क्रेडिट की मजबूत हिस्‍सेदारी होती है। लेकिन मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान भारत की क्रेडिट ग्रोथ अब तक सबसे कम स्‍तर पर पहुंच गई। 2016-17 में इंडस्‍ट्री का क्रेडिट ग्रोथ (-)1.9 फीसदी तक पहुंच गया। बैंकर्स का कहना है कि क्रेडिट ग्रोथ कम होने की वजह दो है। एक तो बिजनेस एक्टिवटीज कम होना, दूसरा एनपीए बढ़ने की वजह से बैंकों द्वारा लोन न देना। हालांकि 2017-18 में इसमें मामूली सुधार हुआ। आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, इंडस्‍ट्री का क्रेडिट ग्रोथ इस प्रकार रहा - 

 

2013-14

13.1 फीसदी

2014-15

5.6 फीसदी

2015-16

2.7 फीसदी

2016-17

(-) 1.9 फीसदी

2017-18

0.7 फीसदी

 

 

 
रिफॉर्म : सरकार ने कई बिजनेस रिफॉर्म भी किए। क्रिेसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, इन्‍सॉल्‍वेंसी एवं बैंकरप्‍सी कोड में बदलाव और टैक्‍सेशन (जीएसटी) दो बड़े रिफॉर्म हैं, जो बिजनेस ग्रोथ के लिए अहम साबित होंगे। इसके अलावा लेबर रिफॉर्म ने छोटे कारोबारियों का बिजनेस करना आसान कर दिया। 
 
स्‍टार्ट-अप्‍स : युवाओं को स्‍वरोजगार के प्रति आकर्षित करने के लिए मोदी सरकार ने कई नई योजनाएं शुरू की। इसमें स्‍टार्ट-अप इंडिया एक बड़ी मुहिम शुरू की गई। हालांकि अब तक आंकड़े बताते हैं कि अब तक 99 स्‍टार्ट-अप को ही फंड दिया गया। वहीं, सरकार के स्‍टैड अप इंडिया और मुद्रा स्‍कीम की वजह से नए एंटरप्रेन्‍योर की संख्‍या बढ़ी है। मुद्रा रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2016-17 में कुल 3.97 करोड़ कारोबारियों को मुद्रा लोन दिया गया, जिसमें से 99.89 लाख नए कारोबारी हैं। इसके अलावा अब कंपनी का रजिस्ट्रेशन टाइम 4-5 दिन से घटकर 1 पर आ गया है।
 
नौकरी पेशा
 
 
नौकरियों के अवसर : मोदी सरकार ने वादा किया था कि हर साल 1 करोड़ नई नौकरियां दी जाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। नौकरियों के अलग-अलग आंकड़ों को लेकर विवाद जरूर गहराता रहा और नौकरियां बढ़ने की बजाय कम होने के आरोप सरकार पर लगे। हालांकि, एसबीआई के चीफ इकोनॉमिस्‍ट डॉ. सौम्‍या कांति धोष की रिपोर्ट के मुताबिक, 2017-18 में लगभग 67 लाख नई नौकरियां पैदा हुई।  वहीं, इससे पहले 2015 में 1.55 लाख और 2016 में 2.31 लाख नौकरियों के मौके पैदा कर पाई।  
 
टैक्‍स कम हुआ कि नहीं : मई 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी, देश में 5.17 करोड़ टैक्सपेयर थे। जो चार साल में बढ़कर 8 करोड़ हो गए हैं। भाजपा का वादा था कि वह धीरे-धीरे टैक्स रेट में कटौती करेगी। इन 4 साल में कटौती के फ्रंट पर सैलरीड क्लास को साल 2016-17 में टैक्स स्लैब में बदलाव से थोड़ी राहत दी गई। सरकार ने इसके तहत एंट्री टैक्स स्लैब के रेट को 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दिया था। इससे 5 लाख तक के इनकम वालों को थोड़ी राहत मिली। इसके अलावा और कोई बड़ी राहत नहीं दे पाई। हालांकि टैक्स डिडक्शन लिमिट 2 लाख से बढ़ाकर 2.5 लाख कर सेविंग बढ़ाने की जरुर कोशिश की। खुद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस बार के बजट पेश करने के बाद स्वीकार किया था, कि अभी वेतनभोगी पर टैक्स का बोझ ज्यादा है।
 

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कितनी बढ़ी इनकम : सैलरी क्‍लास आदमी अपने अच्‍छे दिन की कल्‍पना अपने सैलरी इंक्रीमेंट से करता है। एक सर्वे में यह अनुमान लगाया गया था कि साल 2015-16 में भारतीय कंपनियां अपने कर्मचारियों को औसतन 10.7 फीसदी इंक्रीमेंट देंगी, जबकि 2018-19 में इसमें कमी आई और अनुमान लगाया गया कि औसतन 9.4 फीसदी इंक्रीमेंट होगा। 
 
सेविंग्‍स : भारतीय परिवारों के लिए उनकी सेविंग्‍स उनकी खुशहाली का एक बड़ा आधार होता है। मोदी सरकार के कार्यकाल में सेविंग्‍स में कमी आने की रिपोर्ट्स सामने आई हैं। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की साल 2016-17 की एनुअल रिपोर्ट के मुताबिक इस साल ग्रोस नेशनल डिस्‍पोजेबल इनकम के मुकाबले हाउसहोल्‍उ सेक्‍टर की ग्रोस सेविंग्‍स 18.7 फीसदी रही, जो साल 2014-15 में 20 फीसदी थी। 
 
4 साल और शेयर बाजार 
पिछले 4 साल की बात करें तो सेंसेक्स में 41 फीसदी तेजी रही है। 26 मई 2014 को सेंसेक्स 24716 के स्तर पर था, जो 25 मई 2018 को 34924 के स्तर पर पहुंच गया। 29 जनवरी 2018 को सेंसेक्स ने अपना ऑलटाइम हाई 36443 बनाया था। वहीं, इस दौरान निफ्टी ने 42 फीसदी ग्रोथ दिखाई। वहीं, जनवरी 2018 में निफ्टी ने पहली बार 11000 का स्ता भी पार किया।
तारीख                          सेंसेक्स 
26 मई 2014 24716  
26 मई 2015 27531
26 मई 2016 26366
26 मई 2017 31028
25 मई 2018

34924

 

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लाइफ स्‍टाइल 

 

ऑटो सेल्‍स : देश में यदि कारों की संख्‍या बढ़ रही है तो अनुमान लगाया जाता है कि लोगों के पास एक्‍सट्रा इनकम आ रही है। जबकि टू-व्‍हीलर सेल्‍स बढ़ने का मतलब है कि रूरल इकोनॉमी ग्रो कर रही है, जबकि कॉमर्शियल व्‍हीकल बढ़ने का मतलब है कि इकोनॉमी बूस्‍ट कर रही है। आइए, जानते हैं कि पिछले 5 साल में व्‍हीकल्‍स की सेल्‍स कैसे बढ़ी - 

 

साल

कार की सेल्‍स

टू-व्‍हीलर्स की सेल्‍स

कॉमर्शियल सेल्‍स

2013-14

25 लाख 

1.48 करोड़ 

6.32 लाख 

2014-15

26 लाख 

1.52 करोड़

6.14 लाख 

2015-16

27.89 लाख 

1.64 करोड़

6.85 लाख 

2016-17

30.47 लाख 

1.75 करोड़

7.14 लाख 

2017-18

32.87 लाख 

2.01 करोड़

8.56 लाख 

 

सफर : यदि आपके पास प्राइवेट व्‍हीकल नहीं है तो आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट का सहारा लेते हैं। ऐसे में, यह जरूरी है कि आपके लिए जानना जरूरी है कि रेलवे का सफर कितना कंफर्टेबल रहा। आंकड़े बताते हैं कि रेलवे में सफर करना लोगों के लिए आसान नहीं रहा। एक स्‍टडी के मुताबिक, अकेले बिहार जाने वाली ट्रेनें जो 2015 में औसतन 80 मिनट लेट होती थी, वो 2016 में 93 मिनट और 2017 में 104 मिनट मिनट लेट रही। रेल यात्री डॉट इन की स्‍टडी के मुताबिक, 2017 में उत्‍तर प्रदेश की ओर जाने वाली ट्रेनें औसतन 95 मिनट, पंजाब में 67 मिनट, गोवा में 64 मिनट और आसाम में 62 मिनट लेट चली। जहां रेल एक्‍सीडेंट की बात है तो एक्‍सीडेंट में कमी जरूर आई है। जैसे कि साल 2014-15 में 135 एक्‍सीडेंट हुए थे, जो 2015-16 में घटकर 107 और 2016-17 में 104 हो गए। जबकि 2017-18 में केवल 73 एक्‍सीडेंट रिकॉर्ड किए गए। 

 

सोशल सिक्‍योरिटी 
सरकार ने सोशल सिक्‍योरिटी को लेकर तीन बड़ी योजनाएं शुरू की। जिनमें प्रधानमंत्री जीवन ज्‍योति बीमा योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना और अटल पेंशल योजना शामिल हैं। परफॉरमेंस रिपोर्ट बताती है‍ कि प्रधानमंत्री जीवन ज्‍योति बीमा योजना और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के तहत लगभग 18  करोड़ लोगों का बीमा किया जा चुका है। जबकि 1 करोड़ से अधिक लो अटल पेंशन योजना का लाभ उठा रहे हैं। 

 

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