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8-9 फीसदी ग्रोथ के लिए भारत को करने होंगे और इकोनॉमिक रिफॉम्‍स, नोबेल विजेता रौबिनी की राय

नोबेल पुरस्कार विजेता नूरिएल रौबिनी का मानना है कि भारत 8 से 9 फीसदी की दर से आर्थिक प्रगति कर सकता है।

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नई दिल्‍ली. नोबेल पुरस्कार विजेता नूरिएल रौबिनी का मानना है कि भारत को अगर 8 से 9 फीसदी की दर से आर्थिक प्रगति करनी है, तो उसे और ज्‍यादा आर्थिक सुधार करने होंगे। हालांकि उन्‍होंने क्रूड ऑयल के दाम के बढ़ने के प्रति चेताया भी है। 


 

भारत का भविष्‍य अच्‍छा

उन्‍होंने कहा कि क्रूड के दाम बढ़ने से महंगाई बढ़ने का खतरा भी बढ़ेगा। इसके अलावा ट्रेड और फिस्‍कल बैलेंस्‍ड पर भी दबाव आ सकता है। हालांकि उन्‍होंने कहा कि मेरा आकलन है कि भारत का भविष्‍य लॉन्‍ग टर्म में काफी अच्‍छा है। अगर कुछ और आर्थिक सुधार किए जाएं तो भारत और तेजी से तरक्‍की कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो भारत की जीडीपी 8 से 9 फीसदी की गति से बढ़ना भी संभव है। वे यहां आयोजित इंडिया इकोनॉमिक कॉनक्‍लेव में बोल रही थीं।

 

अभी भी अच्‍छी है जीडीपी की दर

भारत की अर्थव्‍यवस्‍था चालू वित्‍तीय वर्ष में 6.6 फीसदी की गति से बढ़ने का अनुमान है। हालांकि यह पिछले साल की जीडीपी 7.1 फीसदी के मुकाबले कम है। हालांकि वित्‍तीय वर्ष  2018-19 में अनुमान है कि जीडीपी में 7 से 7.5 फीसदी की दर से बढ़त दर्ज हो सकती है।

 

 

भारत की क्रूड के आयात पर निर्भरता ज्‍यादा

उन्‍होंने कहा कि भारत की क्रूड ऑयल पर निर्भरता काफी ज्‍यादा है, इसलिए इसके दाम बढ़ने से शार्ट टर्म में  महंगाई बढ़ने का खतरा ज्‍यादा है। उन्‍होंने कहा कि जहां तक क्रूड ऑयल प्राइस की बात है वह अभी 70 डालर प्रति बैरल के ऊपर हैं, लेकिन यह टैम्‍परेरी फैक्‍टर के चलते हैं। हालांकि उन्‍होंने उम्‍मीद जताई कि ऑयल के दाम लॉन्‍ग टर्म में नीचे आएंगे।

 

शेल गैस एंड रिन्‍यूबल इनर्जी दो महत्‍वपूर्ण मुद्दे

उन्‍होंने कहा कि मीडियम और लॉन्‍ग टर्म में शेल गैस और रिन्‍यूबल इनर्जी यह दो मुद्दे अहम रहेंगे। इसके चलते आगामी 5 से 20 साल में इनर्जी की लागत में कमी आएगी। उनके अनुसार अमेरिका में शेल गैस भंडार और रिन्‍युबल इनर्जी में बड़ा निवेश होने से ऑयल पर निर्भरता भी कम हो रही है।

 

बैंकों को चलाने का तरीका बदलना होगा

उन्‍होंने कहा कि भारत में बैंकों के एनपीए से निपटने के लिए या तो बैंक प्रॉविजन करें या अलग से अासेट मैनेजमेंट कंपनियां तैयार हों। ऐसा करके एनपीए की समस्‍या से निपटा जा सकेगा। सरकारी बैंकों के निजीकरण पर उनका कहना है कि बैंकों को चलाने के लिए गवर्नेंस में सुधार की जरूरत है, नहीं तो इनका निजीकरण किया जा सकता है।

 

 

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