RBI के 2.5 लाख करोड़ पर है मोदी सरकार की नजर, इसलिए बढ़ा टकराव

मोदी सरकार की नजर भारतीय रिजर्व बैंक के 2.5 लाख करोड़ रुपए पर है। मोदी सरकार रिजर्व बैंक के इस आपाता फंड से अपना वित्तीय घाटा पूरा करना चाहती है। लेकिन रिजर्व बैंक मोदी सरकार के इस प्लान से सहमत नहीं है। रिजर्व बैंक मानना है कि सरकार के इस कदम से देश की अर्थव्वस्था कमजोर होगी और वैश्विक निवेशकों का भरोसा भी अर्थव्यवस्था से कम होगा।

moneybhaskar

Nov 01,2018 05:02:00 PM IST

महेंद्र सिंह,नई दिल्ली। मोदी सरकार की नजर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 2.5 लाख करोड़ रुपए पर है। मोदी सरकार रिजर्व बैंक के इस आपात फंड से अपना वित्तीय घाटा पूरा करना चाहती है। हालांकि रिजर्व बैंक मोदी सरकार के इस प्लान से सहमत नहीं है। रिजर्व बैंक मानना है कि सरकार के इस कदम से देश की अर्थव्यवस्था कमजोर होगी और वैश्विक निवेशकों का भरोसा भी अर्थव्यवस्था से कम होगा। इसी वजह से रिजर्व बैंक और मोदी सरकार के बीच टकराव बढ़ गया है। सीनियर इकोनॉमिक जर्नलिस्ट एमके वेणु ने moneybhaskar.com से रिजर्व बैंक और सरकार के बीच जारी टकराव के मुद्दे पर बातचीत की है।

रिजर्व बैंक के काम में दखल दे रही है सरकार

एमके वेणु का कहना है कि आरबीआई के पास लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपए का कांटिजेंसी फंड है। सरकार इस फंड का इस्तेमाल वित्तीय घाटा कम करने में करना चाहती है। सरकार ने इसके लिए आरबीआई एक्ट के सेक्शन 7 के तहत रिजर्व बैंक को तीन पत्र लिखे हैं। ऐसा लगता है कि इसके बाद ही रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने अपनी स्पीच में रिजर्व बैंक के काम काज में सरकार के दखल का मामला उठाया है। डिप्टी गचर्नर की स्पीच को लेकर गवर्नर उर्जित पटेल की भी सहमति थी। वेणु का कहना है कि इसीलिए विरल आचार्य ने अर्जेंटीना का उदाहरण दिया कि किस तरह से वहां की सरकार ने सेंट्रल बैंक के काम में दखल दिया जिससे अजेंटीना की अर्थव्यवस्था पर काफी बुरा असर पड़ा।

बड़े इंडस्ट्री समूह के डिफॉल्ट पर सख्त एक्शन चाहता है रिजर्व बैंक

एमके वेणु के मुताबिक देश के शीर्ष 6-7 इंडस्ट्री ग्रुप पर 6 लाख करोड़ रुपए का लोन बकाया है। इसमें से लगभग 2.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक का लोन डिफॉल्ट हो चुका है। रिजर्व बैंक ने इस डिफॉल्ट पर सख्त एक्शन चाहता है। रिजर्व बैंक ने इन इंडस्ट्री ग्रुप को साफ कर दिया है कि या तो लोन चुकाएं या आपका मामला एनसीएलटी में जाएगा। वहीं सरकार 2019 चुनाव से पहले बड़े औद्योगिक घरानों के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाना चाहती है। वेणु का कहना है कि सरकार एक तरफ आईबीसी कोड को अपनी उपलिब्ध बता रही है कि इसके जरिए बड़े कारोबारियों से कर्ज की वसूली होगी। वहीं सरकार बड़े औद्योगिक घरानों के मामले को एनसीएलटी में नहीं ले जाना चाहती है। वहीं रिजर्व बैंक इस मसले पर कंप्रोमाइज नहीं करना चाहता है।

आरबीआई को मजबूर किया गया तो और खराब हो सकते हैं हालात

वेणु का कहना है कि अब भी सरकार के पास समय और उसे मौजूदा समय में जारी टकराव से पीछे हट जाना चाहिए, क्योंकि अगर सरकार सेक्शन 7 के तहत रिजर्व बैंक के सिर पर बंदूक रखकर अपनी बात मनवाती है तो इसके बहुत बुरे नतीजे हो सकते हैं। अगर पूरी दुनिया में यह मैसेज चला गया कि भारतीय रिजर्व बैंक का तंत्र मजबूत नहीं है और वह अपने हिसाब से काम नहीं कर पा रहा है तो इससे विदेशी निवेशकों का विश्वास कमजोर होगा। साथ ही पूरी दुनिया में भारत को लेकर नकारात्मक इमेज बनेगी।

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