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खास खबर: मोदी जी! कब पूरा करेंगे वादा, कहीं तेल न बिगाड़ दे 2019 का गणित

नई दिल्ली. मोदी सरकार जहां अपना पहला टर्म देश में बेहतर मैक्रो-इकोनॉमिक स्कोरकार्ड के साथ खत्म करना चाहती है। वहीं, लगातार महंगे हो रहे कच्चे तेल से सरकार की पूरी गणित बिगड़ सकती है। इकोनॉमी के फ्रंट पर ट्रेड वार, महंगाई, ग्रोथ में सुस्ती और जॉब क्राइसिस जैसी दिक्कतों का सामना कर रही सरकार के लिए नए फाइनेंशियल ईयर में क्रूड सबसे बड़ा चैलेंज साबित हो सकता है। इंडियन बास्केट में लगातार क्रूड की बढ़ती कीमतों की वजह से पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान पर पहुंच चुकी हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2019 के आम चुनावों में जब एक साल से कुछ ज्यादा समय ही बचा है, नया फाइनेंशियल ईयर मोदी के लिए कई चुनौतियों के साथ शुरू हो रहा है। 

 

महंगा क्रूड बिगाड़ सकता है इकोनॉमी का गणित 
 

# पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान पर
जून 2017 के बाद से कच्चे तेल की कीमतें इंटरनेशनल मार्केट में 50 फीसदी से ज्यादा बढ़ चुकी हैं। इकोनॉमी सर्वे के मुताबिक FY-19 में यह 12 फीसदी और महंगा हो सकता है। वहीं, इंडियन बास्केट में क्रूड 10 महीनों में 58 फीसदी महंगा हो चुका है। महंगे क्रूड की वजह से पेट्रोल-डीजल की कीमतें भी आसमान पर पहुंच गई हैं, जो सीधे आम आदमी को प्रभावित कर रही हैं। दिल्ली में पेट्रोल 73 रुपए और डीजल 63 रुपए प्रति लीटर से ऊपर है। 

 

# वादा पूरा करने में पीछे क्यों 
पिछले दिनों पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच सरकार ने संकेत दिए थे कि इंडियन बास्केट में क्रूड 65 डॉलर के ऊपर जाता है तो एक्साइज ड्यूटी में कटौती की जाएगी। लेकिन इंडियन बास्केट में क्रूड मार्च में एवरेज 73 डॉलर प्रति बैरल के आस-पास बना हुआ है। एक्साइज ड्यूटी में कटौती के कोई संकेत नहीं हैं। फाइनेंस मिनिस्ट्री के सूत्रों के मुताबिक टाइट फिस्कल सिचुएशन के चलते एक्साइज ड्यूटी में कटौती की फिलहाल संभावना नहीं दिख रही है। जानकार मानते हैं‍ कि एक्साइज ड्यूटी नॉन जीएसटी रेवेन्यू का बड़ा सोर्स है, ऐसे में जब करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ने का डर बरकरार है, बैलेंसशीट बिगड़ने के डर से एक्साइज ड्यूटी में कटौती करना सरकार के लिए मुश्किल है।

 

# सरकार के खजाने पर बढ़ा बोझ
पिछले 10 महीनों से क्रूड महंगा बना हुआ है, जिससे क्रूड का इंपोर्ट बिल भी बढ़ रहा है। करंट फाइनेंशियल में अप्रैल-फरवरी के दौरान भारत का क्रूड इंपोर्ट बिल 25 फीसदी महंगा होकर 8070 करोड़ डॉलर हो गया है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के मुताबिक इन 11 महीनों में भारत का ग्रॉस इंपोर्ट बिल 25 फीसदी बढ़कर 9100 करोड़ डॉलर रहा है। अप्रैल-फरवरी के दौरान भारत ने एवरेज 55.74 डॉलर प्रति बैरल कीमत पर क्रूड ऑयल का इंपोर्ट किया, जबकि 2016-17 में यह आंकड़ा 47.56 डॉलर था। 

 

# पेट्रोल-डीजल पर लेवी से बैलेंस हो रहा खजाना  
असल में सरकार को पेट्रोल-डीजल से मिलने वाले रेवेन्यू में एक्साइज ड्यूटी का सबसे ज्यादा योगदान है। फाइनेंशियल ईयर 2017 में सरकार को पेट्रोल-डीजल पर एक्साइजड ड्यूटी से 2.43 लाख करोड़ रुपए के करीब आय हुई थी। यह पेट्रोल-डीजल से आने वाले कुल रेवेन्यू का 46 फीसदी है। बाकी रेवेन्यू सेल्स टैक्स और वैट से आता है। जब फिस्कल सिचुएशन पहले से टाइट है, ऐसे में एक्साइज ड्यूटी घटाने से सरकार के खजाने पर बड़ा असर होगा। 

 

# आम आदमी पर दोगुना बोझ
इसे ऐसे समझ सकते हैं कि पेट्रोल-डीजल की बात करें तो उस पर लगने वाला टैक्स एक्चुअल प्राइस से ज्यादा होता है। मसलन अगर 68-69 डॉलर प्रति बैरल क्रूड का प्राइस है और डॉलर के मुकाबले रुपया 64 से 65 की रेंज में है तो 1 लीटर पेट्रोल की कीमत दिल्ली में 35 रुपए होगी। इसमें डीलर कमिशन भी शामिल है। वहीं, इस पर 27 फीसदी वैट यानी 15 रुपए और 22 रुपए के आस-पास एक्साइज ड्यूटी लगेगी। यानी कुल टैक्स का 60 फीसदी एक्साइज ड्यूटी होगी। इस तरह से 35 रुपए का पेट्रोल करीब 71 रुपए का हो जाएगा। इसी तरह से डीजल के मामले में भी आम आदमी को एक्चुअल प्राइस के बराबर ही टैक्स देना होता है जो सरकार के खजाने में जाता है। 

 

# FY-19 के H1तक सस्ता होने के आसार नहीं 

केडिया कमोडिटी के डायरेक्टर अजय केडिया का कहना है कि नए फाइनेंशियल के पहले 6 महीने तक क्रूड में ज्यादा कमी आने की उम्मीद नहीं है। ओपेक देश रूस सहित कुछ नॉन ओपेक देशों के साथ मिलकर प्रोडक्शन लंबे समय तक सीमित रखने पर राजी हो चुके हैं। वहीं, जियोपॉलिटिकल टेंशन और ट्रेड वार ने भी सेंटीमेंट बदला है। फाइनेंशियल ईयर के पहले 2 तिमाही की बात करें तो क्रूड इंटरनेशनल मार्केट में ऊपर की ओर 75 डॉलर प्रति बैरल जा सकता है, जो अभी 70 डॉलर के आस-पास है। नीचे की ओर यह 62 डॉलर से कमजोर होता नहीं दिख रहा है। सिर्फ यूएस की क्रूड पॉलिसी से ही क्रूड में बैलेंस दिख रहा है। 

 

# क्रूड से ऐसे प्रभावित होती है GDP
इकोनॉमिक सर्वे में कहा गया है कि कच्चे तेल की कीमतें फाइनेंशियल ईयर 2019 में 12 फीसदी तक बढ़ सकती हैं। अगर ऐसा होता है कि देश की इकोनॉमी पर इसका असर दिखेगा। सर्वे के अनुसार कच्चे तेल में हर 10 डॉलर की बढ़ोत्तरी से जीडीपी 0.3 फीसदी तक गिर सकती है, वहीं महंगाई दर भी 1.7 फीसदी ऊंची हो सकती है। 

 

महंगाई बढ़ने का डर
फरवरी में रिटेल महंगाई दर कम होकर 4 महीने के निचले स्‍तर 4.44 फीसदी आ गई थी, लेकिन जानकार इसे स्टेबल नहीं मान रहे हैं। आरबीआई खुद यह अनुमान गला चुका है कि फाइनेंशियल ईयर 2018-19 के पहले 6 महीनों में महंगाई दर 5 फीसदी से ऊपर निकल सकती है। असल में फरवरी में क्रूड में नरमी आई थी और भाव 62 डॉलर के आस-पास आ गया था। जिसकी वजह से महंगाई में राहत रही। मार्च में क्रूड वापस 3 साल के हाई के आस-पास आ चुका है। पेट्रोल-डीजल भी रिकॉर्ड लेवल की ओर हैं। ऐसे में महंगाई आगे और बढ़ सकती है। 

 

ट्रेड वार का डर

यूएस और चीन में शुरू हुआ ट्रेड वार भारत सहित दुनियाभर के लिए चिंता है। आर्थिक मामलों के जानकार पनिंदकर पई का कहना है कि मौजूदा समय में अमेरिका नेशन फर्स्ट की पॉलिसी पर काम कर रहा है। अगर यूएस इसी तरह से एग्रेसिव ट्रेड पॉलिसी पर काम करता रहा तो दूसरे बड़ी इकोनॉमी वाले देश भी यूएस के साथ नेशन फर्स्ट की पॉलिसी पर काम करना शुरू कर देंगे। इस बात का डर है कि इसकी आंच भारत सहित कई देशों तक फैल जाएगी। ऐसा हुआ तो ट्रेड वार में फंसे देशों के साथ दूसरे देशों की व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित होंगी, जिससे नेशनल इनकम कमजोर होगी। पई ने इस संभावना से भी इंकार नहीं किया कि अगर ट्रेड वार लंबा खिंचता है तो दुनिया एक और मंदी की ओर जा सकती है। 

 

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