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35 रुपए का पेट्रोल 75 में, मनमोहन ने जो किया वह मोदी क्‍यों नहीं कर पा रहे?

दिल्‍ली में बिना टैक्‍स के पेट्रोल की कीमतें मात्र 35.20 रुपए पड़ रही हैं, जबकि यह 74.10 रुपए के आसपास बिक रहा है ...

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नई दिल्‍ली। हाल के दिनों में देश ने डीजल-पेट्रोल की कीमतों में जो तेजी देखी है, वैसी 2014 के बाद कभी नहीं देखी गई। देश के ज्‍यादातर हिस्‍सों में पेट्रोल 75 से 80 रुपए के बीच बिक रहा है। वहीं डीजल की कीमतें 65 रुपए के आस पास हैं। पेट्रोल की कीमतों में देश ने भले ही यह तेजी पहले भी देखी हो, लेकिन आजाद भारत के इतिहास में डीजल इतना महंगा कभी नहीं बिका। 

 

यह सबकुछ तब हो रहा है, जब अंतराष्‍ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमतें अब भी 2014 के लेवल पर नहीं है। उस वक्‍त एक बैरल की कीमत 115 डॉलर के पार पहुंच गई थी। उस टॉप ऊंचाई पर भी भी रिटेल में पेट्रोल की कीमतें 75 से 80 रुपए प्रति लीटर के आसपास थी। ब्‍लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा समय में क्रूड की कीमतें जहां हैं, उस लेवल पर दुनिया के किसी भी देश में  आम उपभोक्‍ता को उतनी चोट नहीं लग रही है, जितनी भारत में। बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर क्‍यों 100 डॉलर से ऊपर जाने के बाद 2014 में तब की मनमोहन सरकार उपभोक्‍ताओं को कीमतों के झटके से बचा रही थी, जबकि 2018 में मोदी सरकार के दौरान मात्र 72 डॉलर प्रति बैरल भाव पर ही कीमतों ने ग्राहकों का पसीना छुड़ा दिया है। बड़ा सवाल यह है कि 115 डॉलर कीमतें होने के बाद भी जो मनमोहन ने कर दिया वह, मोदी 72 डॉलर प्रति बैरल के लेवल पर भी क्‍यों नहीं कर पा रहे हैं ? वह भी तक आने वाले दिनों में कई राज्‍यों में विधानसभा चुनाव हैं, 2019 में लोकसभा चुनाव है। 


सोर्स: ब्‍लूमबर्ग      

मार्केट के हवाले हैं कीमतें 
मौजूदा समय में कीमतें बाजार के हवाले हैं। पहले पेट्रोल कीमतें बाजार के हवाले थीं, लेकिन डीजल की कीमतें बाजार भी अब बाजार की ताकतें तय करती हैं। यही कारण है कि डीजल लोगों को सबसे ज्‍यादा तकलीफ दे रहा है। सरकार पहले सब्सिडी देकर डीजल की कीमतों को नियंत्रण में रखती थी। इसके चलते 31 मार्च 2014 तक सब्सिडी का बोझ 9.6 अरब डॉलर पहुंच गया था। 2014 के आखिरी दिनों में सरकार ने सब्सिडी वापस ले ली। अब हालत यह है कि डीजल ही लोगों को सबसे ज्‍यादा तकलीफ दे रहा है। उसका सबसे बड़ा कारण यह है कि देश में ट्रांसपोर्टेशन के लिए करीब 40 फीसदी डीजल का यूज होता है। 

कीमतें घटाते ही लौट आएगा पुराना मर्ज 
सरकार चाहे तो कीमतों में कटौती कर सकती है। इसके लिए उसे एक्‍साइज समेत पेट्रोल की मार्केटिंग और सेल्‍स के दौरान लगने वाले अलग-अलग टैक्‍स के रेट में कमी करनी होगी। यह कदम सरकार का पुराना मर्ज उभार सकती है। यानी पेट्रोलियम पदार्थों पर टैक्‍स कटौती का सीधा असर खजाने पर पड़ेगा। पेट्रोल-डीजल पर एक्‍साइज ड्यूटी और अन्‍य दूसरे टैक्‍स से सरकार को मौजूदा वित्‍त वर्ष में करीब 2.5 लाख करोड़ रुपए की आमद होने का अनुमान है। यह पिछले वित्‍त वर्ष के मुकाबले करीब 77 फीसदी अधिक है। सरकार पहले ही राजकोषीय घाटे को पाटने की जीतोड़ कोशिश कर रही है। ऐसे में अगर वह टैक्‍स हटाती है तो अपने लक्ष्‍य से पीछे हो जाएगी। इसके चलते उसके पास बहुत स्‍कोप नहीं बचता दिख रहा है।   

तो सरकार के पास आखिर चारा क्‍या है 

सरकारी खजाने की सेहत को देखते हुए इस बात की संभावना कम है कि वह टैक्‍स में कमी करके लोगों को पेट्रोल-डीजल की कीमतों के मामले में राहत दे। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर सरकार के पास चारा क्‍या है ? रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार सब्सिडी के अपने पुराने फॉर्मूले की ओर लौट सकती है। सरकार कंपनियों से कह सकती है कि वे उपभोक्‍ताओं के ऊपर पड़ने वाले बोझ को थोड़ खुद भी सहन करें। 

कीमतें क्‍यों पहुंची आसमान में ?  
2014 के बाद इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड की कीमतों में तेजी के साथ गिरावट देखी गई। शुरुआत कीमतें गिरने का फायदा आम जनता को दिया गया। हालांकि पेट्रोल डीजल के भाव एक निश्चित लेवल पर आने के बाद सरकार ने इंटरनेशनल मार्केट में गिरी कीमतों के अनुपात में ही टैक्‍स बढ़ाना शुरू कर दिया। नतीजा यह हुआ कि अंतराष्‍ट्रीय बाजार में क्रूड की गिरती कीमतों के चलते मची खलबली के बीच भी भारत में उपभोक्‍ताओं को एक सीमा तक ही सस्‍ता पेट्रोल-डीजल मिला। अब जबकि क्रूड की कीमतें बढ़ रही हैं, बब भी मोदी सरकार राजकोषीय घाटे की चिंता के चलते बढ़ा टैक्‍स वापस लेने से बच रही है। 

कितना बढ़ा टैक्‍स 
अगर सितंबर 2014 के बाद से बात करें तो अब तक सिर्फ डीजल पर 17.33 रुपए प्रति लीटर अतिरिक्‍त टैक्‍स बढ़ाया जा चुका है। इसमें पिछले साल अक्‍टूबर में मात्र 2 रुपए की कमी की गई है। टैक्‍स में यह कमी पेट्रोल में भी की गई थी। माना जा रहा है कि मात्र 2 रुपए की इस कमी से सरकारी खजाने को 26,000 करोड़ रुपए का नुकसान होगा। अब भी जितनी कीमत पर पेट्रोल बिक रहा है, उसमें आधे से ज्‍यादा हिस्‍सा टैक्‍स का ही है, जो सरकार वसूलती है। अगर दिल्‍ली की बात करे कि बिना टैक्‍स के 19 अप्रैल को पेट्रोल की कीमतें मात्र 35.20 रुपए पड़ रही हैं, जबकि यह 74.10 रुपए के आसपास बिक रहा था।  

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