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Home » Economy » PolicyThe Story Of Jacob Diamond And Nizam Who Used It As Paperweight

कोहिनूर से भी बड़े इस हीरे को कभी पेपरवेट की तरह इस्तेमाल करते थे निजाम, दिलचस्प है इसकी कहानी

900 करोड़ रुपए के इस हीरे का सिर्फ 50 रुपए में आप भी कर सकते हैं दीदार

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नई दिल्ली.

दिल्ली स्थित नेशनल म्यूजियम में इन दिनों कोहिनूर की टक्कर का हीरा लोगों को लुभा रहा है। Jacob Diamond नाम का यह हीरा 184.75 कैरेट का है, जबकि कोहिनूर का वजन सिर्फ 105.6 कैरेट था। इस हीरे की खूबसूरती का कोई सानी नहीं है, लेकिन इसके बावजूद हैदराबाद के सातवें निजाम इसे पेपरवेट की तरह इस्तेमाल किया करते थे। दक्षिण अफ्रीका से यह हैदराबाद कैसे पहुंचा इसकी कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। फिलहाल यह दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में सिर्फ 50 रुपए की टिकट पर देखा जा सकता है। इस हीरे को एक डायमंड कलेक्शन के तहत 5 मई तक म्यूजिम में रखा गया है। 

 

दक्षिण अफ्रीका से आया हैदराबाद

यह हीरा 1884 में दक्षिण अफ्रीका की किंबर्ली खदान में पाया गया था, जहां से इसे चोरी-चुपके इंग्लैंड ट्रांसपोर्ट किया गया था, ताकि कस्टम ड्यूटी बचाई जा सके। इसके बाद इसे लंदन के Hutton Garden डायमंड बाजार में जौहरी संघ को बेच दिया गया। यहां से इसे 1887 में एम्सटर्डम भेजा गया जहां एक सीक्रेट वर्कशॉप में इसे पॉलिश किया गया। जब यह तैयार हुआ तो यह कट, क्लैरिटी और कलर के मामले में इसकी खूबसूरती का कोई जवाब नहीं था। यह 185.75 कैरेट का था। इसके बाद यह शिमला में डायमंड का कारोबार करने वाले व्यापारी अलेक्जेंडर जैकब को मिला, जिसने इसे 1891 में हैदराबाद के निजाम महबूब अली खान को बेचा। तब से इसे जैकब डायमंड कहा जाने लगा। इसे Imperial Diamond के नाम से भी जाना जाता है। 

दिलचस्प है इसकी खरीद की कहानी

जब जैकब ने यह हीरा निजाम महबूब अली को बेचने का इरादा किया तो वे कांच का नूमना लेकर उनके पास गए। निजाम को नमूना पसंद आया और हीरे को 46 लाख रुपए में खरीदने पर बात बनी। निजाम ने 23 लाख रुपए की आधी रकम पेशगी के तौर पर बैंक में जमा करा दी। जैकब ने यह हीरा बेचते वक्त निजाम को सलाह दी थी कि वे इसे पेपरवेट की तरह इस्तेमाल करें। इससे उनका रुतबा बढ़ेगा। जब 21 जुलाई, 1891 को जैकब हीरा लेकर आया तो निजाम को काफी निराशा हुई क्योंकि हीरे का आकर कांच के नमूने के काफी छोटा था। लिहाजा निजाम ने हीरा खरीदने से मना कर दिया और पेशगी के तौर पर दी हुई रकम लौटाने को कहा। लेकिन तब तक जैकब ने रकम को बैंक से निकाल लिया था। जैकब ने महबूब अली को बाकी रकम देने को कहा और जब निजाम नहीं माने तो कलकत्ता हाईकोर्ट में केस फाइल कर दिया। ट्रायल के दौरान कोर्ट ने निजाम से पूछताछ करने के लिए उन्हें बुलवाया लेकिन निजाम ने इसे अपना अपमान मानते हुए कोर्ट के सामने पेश होने से मना कर दिया, हालांकि वे निजी तौर पर कमीशन से मिले। कमीशन से मिलकर लौटने के बाद निजाम ने गुस्से में अपना पेन साफ करने वाले कपड़े में लपेटकर एक जूते में रख दिया और उसे कभी न निकालने की कसम खाई।

 

पेपरवेट की तरह इस्तेमाल करते थे निजाम

1911 में जब महबूब अनी खान के बेटे मीर ओसमान अली खान ने अपने पिता का पद संभाला तो उन्होंने इस हीरे का खोजा और इसे पेपरवेट की तरह इस्तेमाल किया। यह हीरा दुनिया का पांचवा सबसे बड़ा हीरा है और 2008 में बीबीसी ने इसकी कीमत 900 करोड़ आंकी थी।

 

जैकब को ले डूबा यह हीरा

जैकब ने निजाम महबूब अली खान के खिलाफ जो केस फाइल किया था, वह उसकी बर्बादी का कारण बन गया। जैकब के सारे पैसे वकीलों को देने में खर्च हो गए। अर्मेनिया में यहूदी माता-पिता के घर पैदा हुए जैकब ने भारत आकर मोटा पैसा कमाया। वह काफी धूर्त और महत्वाकांक्षी इंसान था। वह 1871 में खाली हाथ भारत आया था, लेकिन हीरे-जवाहरातों को बेचकर बहुत अमीर और प्रभावशाली बन गया। जब निजाम के साथ उसके रिश्ते बिगड़े तो बाकी राजाअों और रजवाड़ाें ने उससे मिलना बंद कर दिया। काफी गरीबी की हालत में बंबई में उसकी मृत्यु हो गई।

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