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शेयरों से कमाई के मामले में मोदी रह गए पीछे, मनमाेहन के कार्यकाल में हुई ज्यादा कमाई

UPA 2 के दौरान BSE सेंसेक्स 180 फीसदी बढ़ा था, जबकि मोदी कार्यकाल में सिर्फ 48 फीसदी बढ़ा

Share Market Did Not Grow As Much In NDA Govt As It Did In UPA 1 and 2

Share Market comparision between NDA Govt and UPA 1 and 2: अपने कार्यकाल में व्यापार को सुगम बनाने पर काफी जाेर दिया, इसके बावजूद शेयर बाजार ने जो ऊंचाईयां मनमोहन सिंह के कार्यकाल में छुई थीं, वैसी ऊंचाईयां मोदी के कार्यकाल में नहीं छू पाया। मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल (2004-09) में BSE सेंसेक्स 78 फीसदी बढ़ा था, जबकि दूसरे कार्यकाल (2009-14) में सेंसेक्स 180 फीसदी बढ़ा। वहीं मोदी सरकार के पांव सालों में BSE सेंसेक्स सिर्फ 48 फीसदी बढ़ा।

 

नई दिल्ली.

चुनाव आने वाले हैं और विकास इन चुनावों का बड़ा मुद्दा रहने वाला है। मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में व्यापार को सुगम बनाने पर काफी जाेर दिया, इसके बावजूद शेयर बाजार ने जो ऊंचाईयां मनमोहन सिंह के कार्यकाल में छुई थीं, वैसी ऊंचाईयां मोदी के कार्यकाल में नहीं छू पाया। मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल (2004-09) में BSE सेंसेक्स 78 फीसदी बढ़ा था, जबकि दूसरे कार्यकाल (2009-14) में सेंसेक्स 180 फीसदी बढ़ा। वहीं मोदी सरकार के पांव सालों में BSE सेंसेक्स सिर्फ 48 फीसदी बढ़ा। खास बात यह है कि यूपीए-2 के शासन में सेंसेक्स में 13 सितंबर, 2013 से मई, 2014 के बीच सबसे ज्यादा सेंसेक्स बढ़ा। नौ महीने के इस दौर में सेंसेक्स 25 प्रतिशत मजबूत हुआ था जबकि 2004 में मनमोहन सरकार के शपथ ग्रहण से लेकर सवा चार साल में सेंसेक्स 42 फीसदी ऊपर उठा।

 

उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे Equity Indices 

मोदी ने मई, 2014 में प्रधानमंत्री का कार्यभार संभाला। सरकार बदलने की उम्मीद में तब तक स्टॉक वैल्युएशंस में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हो चुकी थी। उम्मीदें पूरी हुईं तो फरवरी 2015 तक निफ्टी 50 के 12 महीने का फॉरवर्ड पीई ने (प्राइस टु अर्निंग्स) 10 साल (2009-19) के 17.9 अंक के मुकाबले 22.5 का स्तर छू लिया। जाहिर है, तब निवेशक निफ्टी के हरेक रुपए की प्रॉजेक्टेड अर्निंग्स के लिए 22.5 रुपए चुकाने को तैयार थे। हालांकि, आर्थिक सुधार की रफ्तार पकड़ रही थी, फिर भी इक्विटी इंडिसेज अनुमानों के मुताबिक डिलिवर करने में साल-दर-साल फेल होते रहे।

 

घट गया प्राइवेट कंपनियों का मार्केट कैपीटलाइजेशन 

हिंदी वेबसाइट की खबर के मुताबिक यस सिक्यॉरिटीज के प्रेजिडेंट और रिसर्च हेड अमर अंबानी ने कहा, 'अगर कॉर्पोरेट अर्निंग्स का मोर्चा मजबूत होता तो इक्विटीज भी संभवतः बेहतर करते। हमारा एक दशक कमजोर अर्निंग्स ग्रोथ के साथ बीता था। संभव है कि इनोवेटिव मॉडल की नॉन-लिस्टेड कंपनियों की बढ़ती संख्या के कारण कई उद्योगों में पारंपरिक कंपनियों की कीमत निर्धारण की क्षमता कम हो गई हो। कमोडिटी सेक्टर में भी कमजोरी का एक चक्र रहा। यही वजह है कि इनसे संबंधित कंपनियों की शेयर प्राइस में बड़ी वृद्धि नहीं हुई।' इनके अलावा, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के कमजोर प्रदर्शन से दलाल स्ट्रीट को और ज्यादा झटका लगा। जीडीपी वृद्धि के लिए सेवा क्षेत्र पर कुछ ज्यादा ही भरोसा कर लिया गया। कृषि क्षेत्र कमजोर रहा और प्राइवेट कंपनियों का बाजार पूंजीकरण भी घटा।

 

ठीक से लागू नहीं हुई नोटबंदी 

अमर ने कहा, 'नोटबंदी को ठीक ढंग से लागू नहीं किया जा सका और संभव है कि इसी वजह से जीडीपी अपनी पूरी क्षमता से आगे नहीं बढ़ सकी। जीएसटी के साथ भी ऐसा ही हुआ। हालांकि, मुझे लगता है कि तमाम परेशानियों से निबटारे के बाद अब इन दो बड़ी पहलों से आगे औपचारिक अर्थव्यवस्था के विकास को तेज रफ्तार मिलेगी।'

 

कांग्रेस के कार्यकाल में बढ़ी शेयरों की कीमतें

यूपीए 1 के दौरान शेयरों की कीमतों में तेज वृद्धि मुख्य रूप से लाखों करोड़ डॉलर के निवेश के कारण हुई थी क्योंकि अमेरिका में 2007 से 10 के बीच आए वित्तीय संकट के मद्देनजर दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों ने अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए अपनी नीतियां नरम कीं। लेकिन, यूपीए 2 में भारतीय शेयर बाजार में जितनी भी तेजी आई, उसका श्रेय मनमोहन सिंह सरकार को ही जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि तब आसमान छूती कच्चे तेल की कीमतों और नए-नए घोटाले की घटनाओं से सरकार के त्रस्त होने के बावजूद शेयर बाजार ने अच्छा प्रदर्शन किया।

 

कम हो रहा मोदी लहर का असर

यूपीएस शासन के दूसरे कार्यकाल के आखिरी दिनों में जब बीजेपी द्वारा प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद चली मोदी लहर और कच्चे तेल की कीमतों में धीरे-धीरे गिरावट के संकेत मिलने की वजह से शेयर बाजार कुलांचे भरने लगा। लेकिन, मोदी का कार्यकाल खत्म होते-होते शेयर बाजार की चमक फीकी पड़ने लगी।

 

चुनाव के नतीजों का नहीं पड़ेगा शेयर मार्केट पर ज्यादा फर्क 

ऐनालिस्ट्स इस बार फिर से चुनाव से पहले शेयर बाजार में बंपर बढ़त का अंदाजा लगा रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सत्ता में कोई आए, चुनाव के बाद आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया बरकरार रहेगी। उनका कहना है कि सरकार किसी एक दल की बने या गठबंधन की और सरकार विकास को तवज्जो दे या लोकप्रिय फैसले ले, लंबी अवधि में इनका आर्थिक विकास के साथ कोई सीधा संबंध नहीं होता है। यही यूपीए सरकार के पहले कार्यकाल में दिखा था। किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने के बावजूद जीडीपी ग्रोथ की दर औसतन 8.7 फीसदी रही। अंत में अर्निंग्स में स्थिरता ही मायने रखती है।

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