Utility

24,712 Views
X
Trending News Alerts

ट्रेंडिंग न्यूज़ अलर्ट

अगले 2 महीनों में 85 डॉलर/बैरल तक पहुंच सकता है क्रूड, और महंगा होगा पेट्रोल-डीजल GST रिटर्न भरने के लिए आएगा सिंगल पेज का फार्म, 6 महीने में लागू होगी व्‍यवस्‍था इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस को 1030 करोड़ का हुआ मुनाफा, लोन ग्रोथ मजबूत हुई खास खबर : क्‍या रोड इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर से बदलेगी भारत की इकोनॉमी ? डीजल स्‍कैंडल: फॉक्सवैगन के ब्रांड पोर्श का मैनेजर हिरासत में चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव कांग्रेस का रिवेंज पिटीशन: अरुण जेटली व्‍हीकल्‍स को दूसरे राज्‍य में ले जाना होगा आसान, GoM ने दि‍या यूनि‍फार्म टैक्‍स का सुझाव इस लापरवाही से फंस सकता है पीएफ का पैसा, सरकार ने दि‍या गलती सुधारने का मौका CJI के खिलाफ विपक्ष ने उपराष्‍ट्रपति को सौंपा महाभियोग का नोटिस सरकारी बैंकों में बिकवाली से टूटा मार्केट, सेंसेक्स 12 अंक गिरा, निफ्टी 10564 अंक पर बंद मुकेश अंबानी का ये स्‍कूल तैयार करता है ‘कमांडो’, फार्म भरने की लास्‍ट डेट है 28 अप्रैल सोना की तीन दिनों के तेजी पर लगा ब्रेक, 240 रुपए हुआ सस्‍ता आज का खास स्टॉक: बेहतर नतीजों से साइंट में 13% तक तेजी, बनाया 52 हफ्तों का हाई 500 करोड़ इन्‍वेस्‍ट करेगा एटीएस होमक्राफ्ट, पहला प्रोजेक्‍ट लॉन्‍च किया पीएम मोदी की कोशिशों को झटका, 19 करोड़ भारतीय युवाओं के पास बैंक अकाउंट नहीं
बिज़नेस न्यूज़ » Economy » Policyखास खबर: आपने देखी दलितों की पॉलिटिकल पावर, जानिए कितनी है इकोनॉमिक हैसियत

खास खबर: आपने देखी दलितों की पॉलिटिकल पावर, जानिए कितनी है इकोनॉमिक हैसियत

नई दिल्‍ली। एससी-एसटी एक्‍ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में शुरू हुआ दलितों का आंदोलन उफान पर है। आंदोलन के चलते हुई हिंसा में अब तक 1 दर्जन लोगों की मौत हो चुकी है और इकोनॉमी को हजारों करोड़ का नुकसान हुआ है। आंदोलन से एक बात साफ है कि दलित अब राष्ट्रीय स्तर पर पॉलिटिकल पावर हैं। एक आम धारणा यह है कि बिना इकोनॉमिक पावर के पॉलिटिकल पावर नहीं आती है। तो क्‍या मान लिया जाए दलित अब आर्थिक रूप से सशक्‍त हो रहे हैं।

क्‍या दलित देश में इकोनॉमिक पावर भी हैं ? 

 हालाांकि पहली नजर में आपको तस्‍वीर शायद साफ नहीं दिखे। देश में शायद ही ऐसा कोई दलित है जो टाटा या अंबानी की टक्‍कर का बड़ा कॉरपोरेट हाउस चला रहा है। इस बारे में moneybhaskar.com ने दलितों के इकोनॉमिक और सोशल इम्‍पॉवरमेंट पर काम करने वाले और दलित चैंबर ऑफ कॉमर्स की स्‍थापना में अहम भूमिका निभाने वाले चंद्रभान प्रसाद से बात की। चंद्रभान के मुताबिक, यह सच है कि बिजनेस और कॉरपोरेट के बड़े-बड़े कैनवास पर आपको दलित नहीं दिखें, लेकिन यह आधा सच है। छोटे लेवल पर दलित अब गहरी लकीर खींचने में कामयाब रहे हैं। 

 

यह भी पढ़ें-मिलिए देश के पहले दलित अरबपति से, पिता ने नहीं रखा नाथू या कालू जैसा नाम

 

बदला तेजी के साथ ड्रेंड 

भारत में उदारीकरण के  25 साल पूरे होने पर अमेरिकी थिंकटैंक कॉटो इंस्‍टीट्यूट की आई रिपोर्ट के मुताबिक, बिजनेस को लेकर अब दलितों की अप्रोच में काफी फर्क आया है। 2 दशक पहले मात्र 6 फीसदी दलित ऐसे थे, जो अपना बिजनेस चलाते थे, अब यह संख्‍या बढ़कर 37 फीसदी हो गई है। खेतों में काम करने वाले दलितों की संख्‍या 46 से कम होकर 20.5 फीसदी हो चुकी है। ये उनकी इकोनॉमिक पॉवर को दिखाता है। वहीं दलित इंडस्ट्रियलिस्ट्स के संगठन डिक्की के मुताबिक उसके देश भर में 3 हजार मेंबर हैं। लगभग 1 हजार मेंबर्स का टर्नओवर 100 करोड़ रुपए से ज्यादा है।

 

 

बढ़ा है दलितों का कंजम्प्शन  

रिपोर्ट के मुताबिक, दलितों की इकोनॉमिक पावर जांचना चाहते हैं  तो उनके कंजम्प्शन  के पैटर्न को समझना होगा। पिछले 2 दशक में दलितों के जीवन स्‍तर में फर्क आया है। यूपी के 2 जिलों में किए गए सर्वे के मुताबिक, बीते 2 दशकों के दौरान दलितों के पास टीवी नहीं होता था, जबकि अब 45 फीसदी के घर में टीवी है। अब करीब 36 फीसदी दलित मोबाइल फोन यूज करते हैं। मोटरसाइकिल यूज करने वाले दलितों की संख्‍या संख्‍या 12.3 फीसदी पहुंच चुकी है। 2 दशक पहले करीब 95.9 फीसदी दलितों के बच्‍चे बासी खाना खाते थे, लेकिन अब यह 16.2 फीसदी के लेवल पर पहुंच गया है। 

 

 

दलित चैंबर ऑफ कॉमर्स 
बीते 2 दशकों के दौरान बिजनेस वर्ल्‍ड में भी दलितों की भागीदारी बढ़ी है। हजारों दलित कारोबारियों ने मिलकर दलित चैंबर ऑफ कॉमर्स की स्‍थापना की है। इसका हेड ऑफिस पुणे में है। चंद्रभान के मुताबिक, पूंजीवाद की बदौलत कहीं न कहीं सामंतवाद और जातिवाद का खात्‍मा हुआ है। फ्री मार्केट की खुली प्रतिस्‍पर्धा ने दलितों को भी अपना हुनर दिखाने का मौका दिया है। 

 

पश्चिमी यूपी में ही करीब 100 अस्‍पताल दलित चलाते हैं  
चंद्रभान का दावा है कि अगर सिर्फ पश्चिमी यूपी की ही बात करें तो करीब 100 ऐसे अस्‍पताल हैं, जिन्‍हें अब दलित चलाते हैं। ये सब पिछले 2 दशकों के दौरान संभव हो पाया है। दिल्‍ली एनसीआर में दर्जनों ऐसे कारोबारी हैं, जो हीरो, होंडा, याम्‍हा और बजाज जैसी कंपनियों के लिए ऑटो पार्ट्स सप्‍लाई कर रहे हैं।   

 

यह भी पढ़ें-ये हैं देश के 5 अमीर दलित बिजनेसमैन, करोड़ों में करते हैं बिजनेस

 

सामाजिक संरचना भी बदली 
सर्वे के मुताबिक, 2 दशक पहले करीब 77.3 फीसदी दलितों को शादी ब्‍याह के अलग बिठाया जाता था, लेकिन अब यह आंकड़ा 8.9 फीसदी पर पहुंच गया है। वहीं दलितों के यहां ऊंची जाति के लोगों का खान पान अब 77.3 फीसदी पहुंच गया है, पहले यह मात्र 8.9 फीसदी था। ऊंची जातियों के हल चलाने वाले दलितों की तादाद अब 32 फीसदी से घटकर 1 फीसदी पर आ गई है। 2 दशक पहले मात्र 33 फीसदी दलित ही शादी ब्‍याह में कार का यूज करते थे, अब यह संख्‍या 100 फीसदी पहुंच गई है।  

 

 

उदारीकरण ने बदली दशा

जैसे-जैसे देश की इकोनॉमिक हालत सुधरी है, ठीक उसी अनुपात में दलित भी इकोनॉमिक तौर पर इम्‍पावर हुए हैं। बड़ी जातियों की तरह दलित भी अब बाइक पर चलाते हैं। AC में सोते हैं। फ्रिज का ठंडा पानी पी रहे हैं और टीवी पर सास बहू से लेकर कौन बनेगा करोड़पति तक वहीं सीरियल देखते हैं, जो कभी उनके लिए सपना हुआ करता था। आज ऐसा कोई भी दलित नहीं होगा, जिसकी शादी में कार यूज नहीं होती हो। 

 

 

ग्रामीण इलाकों में गरीबी रेखा के नीचे दलितों की स्थिति 

 
ग्रामीण  1993-94 2011-12
अनुसूचित जाति ( SC) 62.4% 31.5%
अनुसूचित जनजाति (ST) 65.9% 45.3%

 

शहरी इलाकों में गरीबी रेखा के नीचे दलितों की स्थिति 

 
शहरी इलाका   1993-94 2011-12
अनुसूचित जाति ( SC) 51.7% 21.7%
अनुसूचित जनजाति (ST) 41.1.9% 24.1%
 

और देखने के लिए नीचे की स्लाइड क्लिक करें

Trending

NEXT STORY

Disclaimer:- Money Bhaskar has taken full care in researching and producing content for the portal. However, views expressed here are that of individual analysts. Money Bhaskar does not take responsibility for any gain or loss made on recommendations of analysts. Please consult your financial advisers before investing.