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खास खबर: आपने देखी दलितों की पॉलिटिकल पावर, जानिए कितनी है इकोनॉमिक हैसियत

यह सच है कि बिजनेस और कॉरपोरेट के बड़े बड़े कैनवास पर आपको दलित नहीं दिखें, लेकिन यह आधा सच है।

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नई दिल्‍ली। एससी-एसटी एक्‍ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में शुरू हुआ दलितों का आंदोलन उफान पर है। आंदोलन के चलते हुई हिंसा में अब तक 1 दर्जन लोगों की मौत हो चुकी है और इकोनॉमी को हजारों करोड़ का नुकसान हुआ है। आंदोलन से एक बात साफ है कि दलित अब राष्ट्रीय स्तर पर पॉलिटिकल पावर हैं। एक आम धारणा यह है कि बिना इकोनॉमिक पावर के पॉलिटिकल पावर नहीं आती है। तो क्‍या मान लिया जाए दलित अब आर्थिक रूप से सशक्‍त हो रहे हैं।

क्‍या दलित देश में इकोनॉमिक पावर भी हैं ? 

 हालाांकि पहली नजर में आपको तस्‍वीर शायद साफ नहीं दिखे। देश में शायद ही ऐसा कोई दलित है जो टाटा या अंबानी की टक्‍कर का बड़ा कॉरपोरेट हाउस चला रहा है। इस बारे में moneybhaskar.com ने दलितों के इकोनॉमिक और सोशल इम्‍पॉवरमेंट पर काम करने वाले और दलित चैंबर ऑफ कॉमर्स की स्‍थापना में अहम भूमिका निभाने वाले चंद्रभान प्रसाद से बात की। चंद्रभान के मुताबिक, यह सच है कि बिजनेस और कॉरपोरेट के बड़े-बड़े कैनवास पर आपको दलित नहीं दिखें, लेकिन यह आधा सच है। छोटे लेवल पर दलित अब गहरी लकीर खींचने में कामयाब रहे हैं। 

 

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बदला तेजी के साथ ड्रेंड 

भारत में उदारीकरण के  25 साल पूरे होने पर अमेरिकी थिंकटैंक कॉटो इंस्‍टीट्यूट की आई रिपोर्ट के मुताबिक, बिजनेस को लेकर अब दलितों की अप्रोच में काफी फर्क आया है। 2 दशक पहले मात्र 6 फीसदी दलित ऐसे थे, जो अपना बिजनेस चलाते थे, अब यह संख्‍या बढ़कर 37 फीसदी हो गई है। खेतों में काम करने वाले दलितों की संख्‍या 46 से कम होकर 20.5 फीसदी हो चुकी है। ये उनकी इकोनॉमिक पॉवर को दिखाता है। वहीं दलित इंडस्ट्रियलिस्ट्स के संगठन डिक्की के मुताबिक उसके देश भर में 3 हजार मेंबर हैं। लगभग 1 हजार मेंबर्स का टर्नओवर 100 करोड़ रुपए से ज्यादा है।

 

 

बढ़ा है दलितों का कंजम्प्शन  

रिपोर्ट के मुताबिक, दलितों की इकोनॉमिक पावर जांचना चाहते हैं  तो उनके कंजम्प्शन  के पैटर्न को समझना होगा। पिछले 2 दशक में दलितों के जीवन स्‍तर में फर्क आया है। यूपी के 2 जिलों में किए गए सर्वे के मुताबिक, बीते 2 दशकों के दौरान दलितों के पास टीवी नहीं होता था, जबकि अब 45 फीसदी के घर में टीवी है। अब करीब 36 फीसदी दलित मोबाइल फोन यूज करते हैं। मोटरसाइकिल यूज करने वाले दलितों की संख्‍या संख्‍या 12.3 फीसदी पहुंच चुकी है। 2 दशक पहले करीब 95.9 फीसदी दलितों के बच्‍चे बासी खाना खाते थे, लेकिन अब यह 16.2 फीसदी के लेवल पर पहुंच गया है। 

 

 

दलित चैंबर ऑफ कॉमर्स 
बीते 2 दशकों के दौरान बिजनेस वर्ल्‍ड में भी दलितों की भागीदारी बढ़ी है। हजारों दलित कारोबारियों ने मिलकर दलित चैंबर ऑफ कॉमर्स की स्‍थापना की है। इसका हेड ऑफिस पुणे में है। चंद्रभान के मुताबिक, पूंजीवाद की बदौलत कहीं न कहीं सामंतवाद और जातिवाद का खात्‍मा हुआ है। फ्री मार्केट की खुली प्रतिस्‍पर्धा ने दलितों को भी अपना हुनर दिखाने का मौका दिया है। 

 

पश्चिमी यूपी में ही करीब 100 अस्‍पताल दलित चलाते हैं  
चंद्रभान का दावा है कि अगर सिर्फ पश्चिमी यूपी की ही बात करें तो करीब 100 ऐसे अस्‍पताल हैं, जिन्‍हें अब दलित चलाते हैं। ये सब पिछले 2 दशकों के दौरान संभव हो पाया है। दिल्‍ली एनसीआर में दर्जनों ऐसे कारोबारी हैं, जो हीरो, होंडा, याम्‍हा और बजाज जैसी कंपनियों के लिए ऑटो पार्ट्स सप्‍लाई कर रहे हैं।   

 

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सामाजिक संरचना भी बदली 
सर्वे के मुताबिक, 2 दशक पहले करीब 77.3 फीसदी दलितों को शादी ब्‍याह के अलग बिठाया जाता था, लेकिन अब यह आंकड़ा 8.9 फीसदी पर पहुंच गया है। वहीं दलितों के यहां ऊंची जाति के लोगों का खान पान अब 77.3 फीसदी पहुंच गया है, पहले यह मात्र 8.9 फीसदी था। ऊंची जातियों के हल चलाने वाले दलितों की तादाद अब 32 फीसदी से घटकर 1 फीसदी पर आ गई है। 2 दशक पहले मात्र 33 फीसदी दलित ही शादी ब्‍याह में कार का यूज करते थे, अब यह संख्‍या 100 फीसदी पहुंच गई है।  

 

 

उदारीकरण ने बदली दशा

जैसे-जैसे देश की इकोनॉमिक हालत सुधरी है, ठीक उसी अनुपात में दलित भी इकोनॉमिक तौर पर इम्‍पावर हुए हैं। बड़ी जातियों की तरह दलित भी अब बाइक पर चलाते हैं। AC में सोते हैं। फ्रिज का ठंडा पानी पी रहे हैं और टीवी पर सास बहू से लेकर कौन बनेगा करोड़पति तक वहीं सीरियल देखते हैं, जो कभी उनके लिए सपना हुआ करता था। आज ऐसा कोई भी दलित नहीं होगा, जिसकी शादी में कार यूज नहीं होती हो। 

 

 

ग्रामीण इलाकों में गरीबी रेखा के नीचे दलितों की स्थिति 

 
ग्रामीण  1993-94 2011-12
अनुसूचित जाति ( SC) 62.4% 31.5%
अनुसूचित जनजाति (ST) 65.9% 45.3%

 

शहरी इलाकों में गरीबी रेखा के नीचे दलितों की स्थिति 

 
शहरी इलाका   1993-94 2011-12
अनुसूचित जाति ( SC) 51.7% 21.7%
अनुसूचित जनजाति (ST) 41.1.9% 24.1%
 
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