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इस साल 7.3% रहेगी भारत की विकास दर: विश्‍व बैंक

विश्‍व बैंक ने कहा है कि इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.3 फीसदी रह सकती है।

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नई दिल्‍ली. विश्‍व बैंक ने कहा है कि इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.3 फीसदी रह सकती है। विश्‍व बैंक का कहना है कि नोटबंदी और जीएसटी जैसे नीतिगत रिफॉर्म्‍स का असर अर्थव्यवस्था पर धीरे-धीरे खत्‍म हो रहा है। अर्थव्‍यवस्‍था इसके झटकों से धीरे-धीरे उबर रही है। दो साल में एक बार जारी होने वाली साउथ एशिया इकोनॉमिक फोकस रिपोर्ट में विश्‍व बैंक ने कहा है कि भारत की ग्रोथ रेट 2017 के 6.7 फीसदी से बढ़कर 2018 में 7.3 फीसदी पर पहुंच सकती है। निजी निवेश बढ़ने और खपत बढ़ने विकास दर को सपोर्ट मिलेगा। 

 


2019 और 2020 में 7.5% होगी GDP  
विश्व बैंक का मानना है कि 2019 और 2020 में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर 7.5 फीसदी रहेगी। विश्व बैंक ने यह भी कहा कि नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों से अर्थव्यवस्था में गिरावट आई थी। जिसका सीधा असर भारत के निचले तबके पर देखने को मिला। बता दें, नरेंद्र मोदी सरकार ने 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी करते हुए 500 और 1000 के पुराने नोटों को चलन से बाहर कर दिया था। इसके बाद 1 जुलाई, 2017 को टैक्स सुधार के लिए गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) लागू किया था। 

 

चीन को पीछे छोड़ा
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2017-18 के तीसरी तिमाही में देश की जीडीपी विकास दर बढ़कर 7.2% हो गई। इसके साथ ही भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था चीन को पीछे छोड़कर सबसे तेजी से बढ़ने वाली इकोनॉमी बन गई। दिसंबर तिमाही में चीन की जीडीपी विकास दर 6.8% रही थी। इस साल संसद में पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे में 2018-19 में विकास दर 7 से 7.5 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया था।

 

हर साल 81 लाख नौकरियों की जरूरत
विश्व बैंक ने कहा- भारत को वैश्विक विकास में जगह बनाए रखने के लिए निवेश और निर्यात को बढ़ाना होगा। हर महीने 13 लाख नए लोग ऐसे होते हैं जिन्हें काम की जरूरत होती है। यही वजह है कि भारत को अपनी रोजगार दर बरकरार रखने के लिए सालाना 81 लाख रोजगार पैदा करने की जरूरत है, जो कि 2005-15 के आंकड़ों के एनालिसिस के मुताबिक लगातार गिर रही है। इसकी मुख्य वजह महिलाओं का नौकरी बाजार से दूर होना है।

 

 

 

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निजी निवेश बढ़ाना चुनौती 
विश्व बैंक ने मिडियम टर्म में भारत के लिए निजी निवेश की वापसी को बड़ी चुनौती बताया है। बैंक का कहना है कि देश में निजी निवेश बढ़ने में कई स्थानीय बाधाएं हैं। इनमें कंपनियों पर बढ़ता कर्ज, रेग्‍युलेटर और नीतिगत चुनौतियां आदि प्रमुख हैं। वर्ल्ड बैंक के मुताबिक, अमेरिका में ब्याज बढ़ने का भी भारत में निजी निवेश के रुख पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। 

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