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1857 की हार पर छोड़ना पड़ा था लाल किला, आज चलाते हैं दिल्ली का फेमस रेस्त्रां

मुगलों के बावर्ची हुआ करते थे'करीम' रेस्त्रां के मालिकों के पूर्वज...

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नई दिल्ली. आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने शायद कभी नहीं सोचा होगा कि उनकी मुगलिया रेसिपी उनके मरने के बाद भी जिंदा रहेगी। लाल किले पर अंग्रेजों के कब्जे के बाद उनके खानसामों को वहां से जाना पड़ा था। उनके यही खानसामे उनकी शाही रेसिपी को 500 साल बाद भी लोगों को परोस रहे हैं। यही नहीं उनका यह जायका सरहदों को पार करके विदेश तक पहुंच जाएगा। आज हम आपको करीम होटल प्राइवेट लि. के बारे में बता रहे हैं, जिनके पूर्वज मुगलों के बावर्ची हुआ करते थे....

 

कैसे हुई शुरुआत?

दिल्ली की जामा मस्जिद के पास मौजूद करीम होटल प्राइवेट लिमिटेड के डायरेक्टर जईमुद्दीन अहमद ने बताया कि उनके पूर्वज अकबर, जहांगीर और बहादुरशाह जफर के शाही खानसामों में से एक थे। मुगलों को उनके पूर्वजों का खाना इतना पसंद था कि मुगल जहां जाते अपने शाही खानसामों को साथ लेकर जाते थे। जईमुद्दीन के मुताबिक, उनके पूर्वजों ने बाबर, अकबर, जहांगीर से लेकर बहादुर शाह जफर तक के लिए खाना बनाया।

 

 

विदेश में रेस्त्रां खोलने की है योजना

कंपनी की भविष्य की योजनाओं को लेकर जईम्मुद्दीन ने moneybhaskar.com को बताया कि करीम विदेश में रेस्त्रां खोलने का योजना बना रही है। वह अरब देशों और यूरोपीय मार्केट में अपने लिए जगह तलाश रहे हैं। ‘करीम’ इसके लिए प्राइवेट इक्विटी इन्वेस्टर भी तलाश रहे हैं।

 

लाल किले के पास ही खोला ढाबा

हाजी करीमुद्दीन ने अपना ढाबा खोलने के लिए उसी जगह को चुना, जो मुगलों के लाल किले के सबसे पास थी। साल 1913 में हाजी करीमुद्दीन ने दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में स्थित गली कबाबियां में करीम होटल खोला। वह रॉयल खाने को आम आदमी तक पहुंचाना चाहते थे। मुगल खाने में ही नाम कमाना चाहते थे।

 

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चौथी जनरेशन चला रही है कारोबार

अब करीम होटल प्राइवेट लिमिटेड को हाजी करीमुद्दीन की चौथी जनरेशन चला रह ही है। जामा मस्जिद के बाद करीम होटल प्राइवेट लिमिटेड ने कुछ साल बाद अपना दूसरा रेस्त्रां पश्चिमी दिल्ली के निजामुद्दीन में दस्तर-ख्वां-ए-करीम नाम से खोला।

 

 

करीम के हैं 19 रेस्त्रां

अब करीम के दिल्ली एनसीआर में करीब 19 रेस्त्रां हैं। ये सभी रेस्त्रां परिवार के सदस्य ही मिलकर चला रहे हैं। करीम होटल्स प्राइवेट लिमिटेड के सलाउद्दीन, जैनुलबिद्दीन, जलालुद्दीन और जईम्मुद्दीन चार डायरेक्टर हैं। करीम का सालाना टर्नओवर करीब 25 करोड़ रुपए है।

 

 

अभी भी मुगल काल की रेसिपी को किया जाता है फॉलो

‘करीम’ अब भी मुगल काल की रेसिपी के आधार पर ही खाना बनाता है। सीक कबाब बनाने में ‘करीम’ करीब 45 मसाले डालता है। उनके खाने की लिस्ट में बादशाही बादाम पसंदा, सीक कबाब, मटन स्टू, चिकन जहांगीरी, चिकन मुगलई, शान-ए-तंदूर, शाही दस्तर ख्वान, जहांगीरी कोफ्ता,फिरदौसी कोरमा जैसी मुगल समय के रेसिपी हैं। ये रेसिपी अभी भी मुगल काल के समय से तरीके से ही बनाई जाती है।

 

 

जफर की गद्दी छिनने के साथ चली गई नौकरी

करीम के पूर्वजों की मुगलों के यहां नौकरी 1857 में खत्म हो गई थी, जब मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को अंग्रेजों ने गद्दी से उतार दिया। तब करीम के पूर्वज मोहम्मद अजीज अंग्रेजों के हाथों मारे जाने के डर से अपनी जान बचाकर लाल किले से भाग निकले। वह यूपी के मेरठ से गाजियाबाद गए।

 

आगे पढ़ें - कैसे हुई करीम की शुरुआत

 

मुश्किल दौर में भी नहीं छोड़ा मुगल रेसिपी का साथ

लाल किले से भागने के बाद मोहम्मद अजीज के दिन बेहद खराब गुजर रहे थे। हालांकि इसके बाद भी उन्होंने अपने बच्चों को मुगल काल की खास रेसिपी ‘रॉयल फूड’ बनाना सिखाने में कोई कमी नहीं रखी। उन्होंने अपने बेटों को मुगलों की रेसिपी बनानी सिखाई। उन्होंने अपने बच्चों को कहा कि यही उनकी विरासत है, जो उन्हें सीखनी चाहिए।

 

 

दिल्ली में ढाबा खोलने की थी योजना

साल 1911 में जब अंग्रेजों ने दिल्ली को देश की राजधानी बनाने का निर्णय लिया और दिल्ली में दरबार लगा। तब मोहम्मद अजीज के बेटे हाजी करीमुद्दीन के दिमाग में कारोबारी आइडिया आया। उस वक्‍त किंग जॉर्ज V और क्वीन मैरी की ताजपोशी की जानी थी। उनके राजगद्दी पर बैठे जाने की बहुत बड़ी सेरेमनी होनी थी। तब हाजी करीमुद्दीन यूपी से दिल्ली आए। वह दिल्ली में ढाबा खोलना चाहते थे।

 

 

ऐसे हुई ‘करीम’ की शुरुआत

तब उनका मकसद राजतिलक के समय देश भर से आए लोगों को खाने की सर्विस देना था। हाजी करीमुद्दीन ने शुरुआत में स्टॉल पर आलू गोश्त, दाल और रुमाली रोटी बेचनी शुरू की। मुगलिया स्वाद को कम पैसों में बेचने से उनका काम चल निकला। आगे उन्होंने अपना ढाबा खोलने के बारे में सोचा। दो साल बाद उन्होंने 20 लोगों की सिटिंग वाला ढाबा ‘करीम’ खोला।

 

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