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खास खबर: इलेक्‍टोरल ट्रस्‍ट के जरिए राजनीति दलों को चंदा कितना सही?

इलेक्‍टोरल ट्रस्‍टों के जरिए राजनीतिक दल कॉरपोरेट घरानों से चंदा भी पाते हैं और दोनों का गठजोड़ भी सामने नहीं आ पाता..

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नई दिल्‍ली. चुनाव सुधारों के लिए काम करने वाले संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (ADR) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राजनीतिक दलों को जो चंदा मिल रहा है, उसमें सबसे बड़ा योगदान इलेक्‍टोलर ट्रस्‍टों का है। ज्‍यादातर इलेक्‍टोरल ट्रस्‍टों को देश के कॉरपोरेट घराने चलाते हैं। ऐसे समय में जब राजनीतिक दलों पर कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने और दोनों में आपसी साठगांठ के आरोप लग रहे हैं, तब इलेक्‍टोरल ट्रस्‍टों के जरिए कॉरपोरेट चंदे का रूट आखिर कितना सही है। कहीं ऐसा तो नहीं हैं कि इन इलेक्‍टोरल ट्रस्‍टों को बनाया ही इसीलिए गया कि ताकि राजनीतिक दलों और कॉरपोरेट घरानों के बीच के लेनदेन और उससे पैदा होने वाला गठजोड़ कभी जनता के बीच आ ही नहीं पाए। इलेक्‍टोरल ट्रस्‍ट के जरिए राजनीति दलों को चंदा मिलना आखिर कितना सही है? 

 

कुल चंदे का 47.19% हिस्‍सा एक इलेक्‍टोरल  ट्रस्‍ट से मिला 


एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक, 2016-17 में सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट ने बीजेपी को 251.22 करोड़ रुपए का चंदा दिया। यह भाजपा को मिलने वाले कुल चंदे का 47.19 फीसदी है। इस ट्रस्‍ट ने कांग्रेस को 13.90 करोड़ रुपए का चंदा दिया। अगर 2013-14 से 2016-17 के बीच का आंकड़ा देखें तो 9 चुनावी ट्रस्टों ने राजनीतिक दलों को 637.54 करोड़ रुपए का चंदा दिया। भाजपा को इस अवधि में 488.94 करोड़ और कांग्रेस को 86.65 करोड़ रुपए चंदे में मिले हैं। चुनावी ट्रस्टों की ओर दिए गए कुल चंदे में से 92.30 फीसदी यानी करीब 588.44 करोड़ रुपये की राशि पांच राष्ट्रीय दलों को मिली है। 16 क्षेत्रीय दलों को चंदे में महज 7.70 फीसदी यानी 49.09 करोड़ रुपए मिले हैं।

 

ज्‍यादातर ट्रस्‍ट कॉरपोरेट घरानों के 


एडीआर से जुड़े जगदीप चोकर के मुताबिक, राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए इस्‍तेमाल किए जाने वाले ज्‍यादातर इलेक्‍टोरल ट्रस्‍ट किसी ने किसी कॉरपोरेट घरानों से जुड़े हुए हैं। इन ट्रस्टों के बारे में जो जानकारी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है, उसके मुताबिक राष्ट्रीय पार्टियों को सबसे ज्यादा चंदा देने वाले सत्या इलेक्टोरल ट्रस्ट को देश की सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी चलाने वाले सुनील मित्तल के भारती समूह ने 2013 में गठित किया था। इसका ऑफिस दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित हंस भवन में है। चंदा देने के मामले में दूसरे नंबर पर रहने वाला जनरल इलेक्‍टोरल ट्रस्‍ट का गठन नब्बे के दशक के अंत में आदित्य बिरला समूह ने किया था। इसका पता भी मुंबई के वर्ली में स्थित आदित्य बिरला सेंटर में ही स्थित है। प्रोग्रेसिव इलेक्‍टोरल ट्रस्‍ट टाटा ग्रुप से जुड़ा हुआ है। 

 

इलेक्‍टोरल ट्रस्‍ट और उनसे जुड़े कॉरपोरेट हाउस 

सत्‍या इलेक्‍टोरल ट्रस्‍ट- भारती एयरटेल समूह 
जनरल इलेक्‍टोरल ट्रस्‍ट- आदित्‍य बिड़ला ग्रुप 
प्रोग्रेसिव इलेक्‍टोरल ट्रस्‍ट- टाटा समूह
समाज इलेक्‍टोरल ट्रस्‍ट-  केके बिरला ग्रुप  

 

कॉरपोरेट हाउस के नाम पर ट्रस्‍ट का नाम क्‍यों नहीं ?  
आम तौर पर देश के ज्‍यादातर कॉरपोरेट हाउस अपनी कंपनियों का नाम कॉरपोरेट हाउस के नाम पर ही रखते हैं। टाटा की ज्‍यादातर कंपनियां टाटा के नाम से शुरू होती हैं! अंबानी परिवार रिलायंस के नाम से, जबकि बिडला परिवार बिडला के नाम पर कंपनियों के नाम रखता है। पर इन ट्रेस्‍टों के नाम कॉरपोरेट घरानों के नाम पर नहीं है। चोकर के मुताबिक, कॉरपोरेट घराने इन ट्रस्‍टों से खुद को अलग दिखना चाहते हैं। यही कारण है कि इन ट्रस्‍टों के नाम कॉरपोरेट घरानों के नाम पर नहीं है। 

 

क्‍यों इलेक्‍टोरल  ट्रस्‍ट का रूट अपना रहे कॉरपोरेट घराने 
चोकर मानते हैं कि इसके कई कारण है। इन ट्रस्‍टों के जरिए चंदा देने पर किसी कॉरपोरेट घराने पर किसी खास राजनीतिक दल से जुड़े होने का ठप्‍पा नहीं लगता  है। ट्रस्‍ट के जरिए चंदा देने पर कॉरपोरेट घरानों को अपने खातों में राजनीतिक दलों का नाम नहीं लिखना पड़ता। इसके चलते इंडस्‍ट्री फाइलिंग में भी यह नहीं पता चल पाता कि किस कॉरपोरेट हाउस ने किसी पार्टी को कितना चंदा दिया। जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 29सी के मुताबिक अगर देश की राजनीतिक पार्टियों को खुद को मिले धन पर कर में छूट चाहिए तो उन्हें ऐसी हर मिली राशि के बारे में हर साल चुनाव आयोग को बताना पड़ेगा जो 20 हजार रुपए से ज्यादा हो। ट्रस्‍ट के जरिए मिली राशि पर राजनीतिक दल छूट भी हासिल कर लेते हैं और यह बताने से भी बच जाते हैं कि उन्‍हें किस राजनीतिक दल ने चंदा दिया। 

 

आखिर यह कितना सही ? 
चोकर के अनुसार भले ही, यह दावा किया जाए कि इलेक्‍टोरल ट्रस्‍टों के जरिए कॉरपोरेट चंदा जुटाना एक पारदर्शी और सरल तरीका है, लेकिन असल में यह राजनीति‍क दलों और कॉरपोरेट घराने के बीच गठजोड़ का मुखौटा ही है। इससे राजनीति दल यह बताने से बच जाते हैं कि उन्‍हें किस कॉरपोरेट घराने से कितना पैसा मिला और कॉरपोरेट घराने इस बात को बताने से बच जाते हैं, कि उन्‍होंने किस पार्टी को कितना चंदा दिया। वास्‍तव में यह डेमोक्रेसी के बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ है। 

 

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