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खास खबर: एक साल में अब क्या कर पाएंगे पीएम मोदी, बीत गए चार साल

चार साल बीत गए, मोदी सरकार के पास अब सिर्फ एक साल बचे हैं। अगले साल 2019 में आम चुनाव है।

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नई दिल्‍ली. चार साल बीत गए, मोदी सरकार के पास अब सिर्फ एक साल बचे हैं। अगले साल 2019 में आम चुनाव है। इन बचे दिनों में सरकार ऐसे क्‍या कदम उठाएगी जिसका लाभ उसे चुनाव में हो। जरूरी यह भी है कि उन कदमों       का फायदा देश की अर्थव्‍यवस्‍था, विदेश नीति और विदेशी निवेश पर भी दिखाई दे।

जानकार भी मानते हैं कि मोदी सरकार अहम पड़ाव पर है। अब नई योजना लाने या लागू करने का वक्‍त नहीं है। अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर कुछ ऐसे फैक्‍टर हैं, जो सरकार के कंट्रोल में नहीं है। दूसरे देशों से रिश्‍तें भी राजनय संबंधों के साथ-साथ अर्थव्‍यवस्‍था के लिए अहम है। इन सभी चुनौतियों के बीच चुनाव अहम है, ऐसे में मोदी सरकार बचे दिनों में क्‍या करेगी? 

 

क्‍या गांव-किसान-रोजगार पर ही होगा फोकस? 

 

अर्थशास्‍त्री प्रणब सेन का कहना है कि मोदी सरकार के पास वक्‍त अब नहीं है। अगले साल आम चुनाव है। इस बात की गुंजाइश नहीं है कि सरकार कोई नई स्‍कीम लाए क्‍योंकि उसे लागू करने और उसका असर आम लोगों तक होने में समय लगता है। ऐसे में किसी नई स्‍कीम के जरिए लोगों खासकर मतदाताओं को लुभाना संभव नहीं है। 

 

सेन मानते हैं कि सरकार के पास एक साल बचे हैं, इसमें वह दो स्‍तर पर बड़ी पहल कर सकती है। पहला, किसानों को लागत का डेढ़ गुना न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य (एमएसपी) लागू करना। एमएसपी के मसले पर सरकार देर नहीं करेगी। खरीफ की बुवाई से पहले यदि सरकार इसे लागू करती है, तभी इसका फायदा होगा।

 

बता दें, वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने बजट में किसानों को इनपुट कॉस्‍ट का 150 फीसदी एमएसपी का एलान किया था। प्रधानमंत्री मोदी खुद अपने 'मन की बात' कार्यक्रम में कह चुके हैं कि फसल के लिए इनपुट कॉस्‍ट का डेढ़ गुना न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य (मूल्‍य) तय करने के दौरान किसान की सभी तरह की लागत और खर्चे को ध्‍यान में रखा जाएगा। 

 

सेन का कहना है दूसरा एक्‍शन सरकार महात्मा गांधी  राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के मामले में कर सकती है। क्‍योंकि, इसका सीधा असर ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर होगा। नौकरी के मसले पर बीते चार साल से मोदी सरकार विपक्ष के निशाने पर रही है। पीएम मोदी का हर साल 2 करोड़ युवाओं को रोजगार देने का पिछला चुनावी वादा हकीकत पर नहीं उतर पाया। इस तरह यदि शहरों के साथ-साथ कस्‍बाई या ग्रामीण वोटरों को साधना है तो एमएसपी के साथ जॉब गारंटी स्‍कीम को बूस्‍ट देना बेहतर साबित हो सकता है। 
 
बता दें, वित्‍तमंत्री अरुण जेटली ने 2018-19 के बजट प्रस्‍तावों में मनरेगा के मद में आवंटन 55 हजार करोड़ रुपए ही रखा। इससे पिछले साल जेटली ने अपने प्रस्‍ताव में मनरेगा के लिए 48 हजार करोड़ रुपए का आवंटन किया था, जिसे बाद में बढ़ाकर 55 करोड़ रुपए किया गया था। इस तरह, मोदी सरकार बचे एक साल में मुमकिन है अपना फोकस गांव-किसान-रोजगार पर करती दिखाई दे। 

 

क्‍या लोकलुभावन घोषणाएं होंगी? 
मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर असहमति जताते हुए अर्थशास्‍त्री मोहन गुरुस्‍वामी कहते हैं, चार साल बीते गए अब एक साल में सरकार क्‍या कर लेगी। मुझे नहीं लगता की कुछ नया दिखाई देगा। चूंकि सरकार का मकसद चुनाव जीतना है, इसलिए मुमकिन है लोकलुभावन घोषणाएं सामने आए। इसमें एक कदम पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कमी (एक्‍साइज घटाकर) के रूप में दिखाई दे सकता है। 

 

बता दें, देश में पेट्रोल-डीजल के दाम रिकॉर्ड लेवल पर पहुंच गए हैं। राजधानी दिल्‍ली में पेट्रोल का भाव 77 के ऊपर और डीजल 68 रुपए के लेवल के पार चुका है। अभी केंद्र सरकार पेट्रोल पर 19.48 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर 15.33 रुपए प्रति लीटर एक्साइस ड्यूटी वसूलती है। 
 
10 करोड़ परिवारों को 5 लाख रुपए तक कैशलेस स्‍वास्‍थ्‍य बीमा योजना आयुष्‍मान भारत स्‍कीम, जिसे 'मोदीकेयर' भी कहा जा रहा है, इसे चुनाव से पहले लागू कराना मुमकिन है या नहीं, इस पर गुरुस्‍वामी कहते हैं, फिलहाल इसे लागू करा पाना आसान नहीं है। इसमें सबसे बड़ा रोड़ा सरकारी तंत्र है, क्‍योंकि उसमें अभी पुराने लोग ही हैं।


विदेशी निवेश पर क्‍या सीमित है अवसर?
फॉर्च्‍यून फिस्‍कल के डायरेक्‍टर जगदीश ठक्‍कर का कहना है, बाजार में विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के मसले पर मोदी सरकार के पास अगले एक साल में करने के लिए बहुत अवसर नहीं है। सरकार के पास सीमित मौके हैं। सरकार अधिक से अधिक रिफॉर्म्‍स को तेज करने के कदम उठा सकती है। लेकिन, कच्‍चा तेल (क्रूड) और डॉलर में मजबूती जैसे फैक्‍टर ऐसे हैं, जो सरकार के कंट्रोल में नहीं है। 

 

ठक्‍कर बताते हैं, दूसरी अहम बात है कि विदेशी निवेश का सेंटीमेंट राजनीतिक स्थिरता पर भी निर्भर करता है। हाल में हुए कर्नाटक के चुनाव केंद्र सरकार के पक्ष में नहीं रहा और 2019 में लोकसभा चुनाव है। ऐसे में कोई नया रिफॉर्म करने की गुंजाइश कम है लेकिन मौजूदा रिफॉर्म्‍स की रफ्तार तेज सकती है। 

 

क्‍या कहते हैं आर्थिक मानक? 

आर्थिक मानक FY14 FY15 FY16 FY17 FY18
जीडीपी (%) 6.6 7.2 8.0 7.1 6.6
महंगाई (%) 9.5 6.0 5.0 4.5 3.6
सीएडी/जीडीपी (%) 1.7 1.3 1.1 0.7 1.9*
वित्‍तीय घाटा/जीडीपी (%) 4.6 4.0 3.9 3.5 3.5
एफडीआई (USD bn) 22 31 36 36 24*

सोर्स: CSO, RBI, वित्‍त मंत्रालय 
*वित्‍त वर्ष 2018 में अप्रैल-दिसंबर 2017 तक 

 


आगे पढ़ें... विदेश नीति पर क्‍या होगा मोदी का कदम? 

 

डिप्‍लोमेसी की पिच पर क्‍या कम्‍फर्ट दिखेंगे मोदी?  

 

प्रधानमंत्री मोदी अबतक करीब 54 देशों की यात्रा कर चुके हैं। इस दौरान उन्‍होंने तकरीबन डेढ़ सौ दिन विदेश में बिताए, यानी हर दस दिन में उन्‍होंने एक दिन विदेश में गुजारे। परंपरागत विदेश नीति से हटकर मोदी ने कुछ नई पहल की। अमेरिका से रिश्‍तें मजबूत हुए तो रूस से भी नजदीकी बढ़ी। सऊदी अरब से लेकर इजराइल और फिलिस्‍तीन तक सब पर मोदी ने एक अलग बेंचमार्क बनाया। अब अगले एक साल में मोदी कैसी डिप्‍लोमेसी करेंगे। 

 

विदेश मामलों के जानकार और दिल्‍ली यूनिवर्सिटी में असिस्‍टेंट प्रोफेसर प्रशांत त्रिवेदी कहते हैं, पश्चिम एशिया में भारत की धाक बनी रहेगी। सीरिया समेत पूरे इलाके में उथल-पुथल होने के बाद भी भारत के सभी देशों से रिश्‍ते सबसे बेहतर हैं। भारत एक साथ इजराइल और फलस्‍तीन के साथ तालमेल बनाने में कामयाब रहा है। सऊदी अरब, यूएई, इराक, ईरान, ओमान और कतर जैसे देशों के साथ भारत के रिश्‍ते बेहतर बने रहेंगे। 

 

प्रशांत का कहना है, कई मसलों पर अमेरिका की ट्रम्‍स सरकार ने जिस तरह का कड़ा रुख अपनाया है, उससे और चीन के साथ इक्‍वेशन अच्‍छा होगा। अगर पाकिस्‍तान की बात करें तो भारत नगोशिएशन की टेबल पर रहेगा। दरसअल पाक के पास चीन के अलावा कोई विकल्‍प नहीं है। पाक के भीतरी राजनीतिक हालात पाकिस्‍तान को बातचीत की टेबल पर हमेशा भारत के सामने रखेंगे। 

 

उनका मानना है कि भारत के खिलाफ अगर चीन की बात करें तो उसके पास पास अब कोई ऑप्‍शन नहीं दिख रहा है। खासकर अमेरिका के साथ ड्रेड वॉर के बाद चीन भारत के साथ आसानी से नेगोशिएट करता दिखेगा। रूस की भी स्थिति कमोबेश वही है। 5वें साल में मोदी डिप्‍लोमेसी की पिच पर काफी कम्‍फर्ट दिखेंगे।

 

 

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