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नए साल में मोदी के सामने आया सबसे बड़ा चैलेंज, आखिर कैसे पाएंगे पार

क्रूड 2018 में मोदी के लिए सबसे बड़ा चैलेंज बनने जा रहा है...

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नई दिल्‍ली. 3 साल से जिस क्रूड (कच्‍चा तेल) के दम पर मोदी सरकार देश की इकोनॉमी को फास्‍ट ट्रैक पर दौड़ा रही थी, वही क्रूड  2018 में मोदी के लिए सबसे बड़ा चैलेंज बनने जा रहा है। हाल के ग्‍लोबल संकेत और पीछे का इतिहास यही इशारा कर रहा है। मई 2014 में मोदी सरकार देश की सत्‍ता में आई और जून 2014 से इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड की कीमतें तेजी के साथ घटी। इसके चलते इंडियन इकोनॉमी की बैलेंसशीट में सुधार देखने को मिला। निवेश के माहौल के साथ इकोनॉमिक ग्रोथ में भी तेजी दर्ज की गई। हालांकि तेजी के साथ बदले ग्‍लोबल संकेत देखें तो क्रूड मोदी सरकार की नई मुसीबत बन सकता है।  

 

 

क्रूड 69 डॉलर के पार
इंटरनेशनल मार्केट में क्रूड 69 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर 69.25 डॉलर पर पहुंच गया। यह क्रूड का भी 3 साल का रिकॉर्ड स्तर है। वहीं नायमैक्स पर डब्ल्यूटीआई क्रूड 63.5 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंचा। पिछले 6 माह की बात करें तो क्रूड में 54 फीसदी से ज्यादा तेजी आ चुकी है। जून में क्रूड 44.48 डॉलर के लेवल पर था। एनालिस्ट मान रहे हैं कि जल्द क्रूड 70 डालर पर पहुंच सकता है।    
 

3 साल में 58 फीसदी सस्‍ता हुआ क्रूड 
मोदी सरकार के सत्‍ता में आने के बाद इंडियन बास्‍केट में क्रूड की कीमतों में करीब 58 फीसदी की कमी देखने को मिली है। इस दौरान यह 108 डॉलर प्रति बैरल से 48 डॉलर प्रति बैरल के औसत लेवल पर आ गया। 
 
 

ऐसे मोदी के लिए साबित हुआ वरदान 
मोदी के लिए क्रूड की गिरती कीमतें कुछ खास वजहों से वरदान साबित हुईं। दअसल इसके चलते देश का करेंट अकाउंट डेफिसिट काबू में आ गया। इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि भारत का इम्‍पोर्ट खर्च तेजी के साथ घटा। अकेले 2014-15 के आंकड़ों के हिसाब से देखें तो क्रूड की कीमतों में गिरावट के चलते 26.8 बिलियन डॉलर से 22.1 बिलियन डॉलर पर आ गया। इस हिसाब से देखें तो सिर्फ साल भर के भीतर ही करेंट अकाउंट डेफिसिट जीडीपी के 1.3 फीसदी से 1.1 फीसदी तक आ गया। 
 
भरता रहा सरकार का खजाना 
क्रूड की कीमतों में पिछले 3 साल के दौरान करीब 58 फीसदी कमी हुई, हालांकि मोदी सरकार ने इसे उपभोक्‍ताओं तक पासऑन नहीं किया। रिपोर्ट के मुताबिक, पेट्रोलियम पदार्थों की मौजूदा रिटेल प्राइस पर नजर दौड़ाएं तो मौजूदा कीमतें 2014 से सिर्फ 5 फीसदी ही कम हुई हैं। पिछले 3 साल के दौरान सरकार ने पेट्रोल पर एक्‍साइज ड्यूटी 15.5 प्रति लीटर से बढ़ाकर 22.7 रुपए प्रति लीटर कर दिया, वहीं डीजल पर यह 5.8 प्रति लीटर से 19.7 रूपए प्रति लीटर पर पहुंच गया। इसके चलते मोदी सरकार के खजाने में अतिरिक्‍त रेवेन्‍यू आया।  
 
 

अब बन सकता है मुसीबत
हाल के दौर में क्रूड का ग्‍लोबल सेंटिमेंट बिगड़ा है और कीमतें 69 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच चुकी है। शुरुआत में ग्‍लोबल टेंशन के चलते कीमतों में तेजी देखी गई। अब  चीन में पैदा हुए डिमांड, अमेरिका को सप्‍लाई में कमी और प्रोडक्‍शन कटौती में ओपोक देशों की पहली बार  दिखी रजामंदी के चलते कीमतें ऊपर जा रही हैं। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में यह 70 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर जा सकता है। इसके चलते मोदी के लिए कभी वरदान साबित हुआ क्रूड अब 2 तरीकों से मुसीबत बन सकता है।

 

 

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दरअसल इस साल राजस्‍थान, मध्‍य प्रदेश जैसे 8 राज्‍यों में आने वाले वक्‍त में में चुनाव है। ठीक इसी समय क्रूड की कीमतें भी बढ़ रही हैं। मतलब साफ है कि इंटरनेशनल मार्केट से अब कीमतें घटाने के लिए कोई सपोर्ट नहीं मिलने वाला है। सरकार को एक्‍साइज में कमी करना ही पड़ेगा। अगर वह ऐसा करती है कि इकोनॉमी की बैलेंसशीट बिगड़ेगी। बिगड़ी बैलेंसशीट के चलते सरकार पहले ही 52 हजार करोड़ रुपए का कर्ज लेने का फैसला ले चुकी है। अगर सरकार कीमतें घटाने का कदम नहीं उठाती है तो महंगाई बढ़ी सकती है और बढ़ी महंगाई सरकार के लिए नई मुसीबत पैदा करेगी।  

 

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हाल में आई आईएमएफ की रिपोर्ट भी मोदी सरकार के लिए खतरे का इशारा करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, पेट्रोलिम का एक्‍सपोर्ट करने वाले ओपके देशो की इकोनॉमी  2009 के बाद अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। आईएमएफ ने एक बार फिर से ओपोके देशों को तेल से अपनी इकोनॉमी शिफ्ट करने की सलाह दी है। एक्‍सपर्ट्स के मुताबिक, हालात ऐसे हैं कि क्रूड का बढ़ा लगभग तय है। ओपोके देश प्रोडक्‍शन में कटौती करने पर सहमत हो गए हैं। उन्‍होंने रूस, वेनेजुएला जैसे गैर ओपोक देशों को भी प्रोडक्‍टशन कट करने पर मना लिया है। ऐसे में कीमतें बढ़ी तो सरकार के लिए इकोनॉमी की बैलेंसशीट को काबू में लाना मुशिकल हो सकता है। 

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