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सरकार ने तैयार किया प्लान, अब कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज हो सकेगा सस्ता

कैंसर की कीमोथेरेपी और हार्मोनल ड्रग थेरेपी पर 4 लाख रुपए तक का खर्च आता है।

Cheaper Cancer Treatment Plan

Cheaper Cancer Treatment Plan: नीति आयोग के अंतर्गत एक उच्च स्तरीय समिति बनाई है, जो नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन (NLEM) से बाहर के ड्रग्स की पहचान करेगी और अगर जरूरत महसूस हुई, तो उनकी कीमत तय करने का सुझाव देगी। 

नई दिल्ली. कैंसर के इलाज को काफी खर्चीला माना जाता है। कैंसर की कीमोथेरेपी और हार्मोनल ड्रग थेरेपी पर करीब 4 लाख रुपए तक का खर्च आता है। इसमें बड़ा हिस्सा दवाइयों के खर्च का होता है। बिजनेस टूडे के मुताबिक इस इलाज के लिए इंश्योरेंस कंपनी इसे क्रिटिकल इलनेस कवर के दायरे में लेकर आती हैं। इसमें करीब 10 लाख तक का मेडिकल कवर मिलता है। इसके लिए सालाना 17 से 50 हजार रुपए का प्रीमियम देना होता है। 

 

नीति आयोग बना रहा प्लान 

नीति आयोग के अंतर्गत एक उच्च स्तरीय समिति बनाई है, जो नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन (NLEM) से बाहर के ड्रग्स की पहचान करेगी और अगर जरूरत महसूस हुई, तो उनकी कीमत तय करने का सुझाव देगी। दरअसल दवाइयों की कीमत तय करने का अधिकार नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (NPPA) के पास है, जो कि एक ऑटोनोमस बॉडी है। यह नेशनल लिस्ट ऑफ एसेंशियल मेडिसिन (NLEM) के अंतर्गत आती है।
 

गंभीर बीमारियों का इलाज होगा सस्ता 

नीति आयोग के सदस्य वीके पॉल और ड्रग्स एंड हेल्थ प्रोडक्ट की स्टैंडिंग कमेटी के चेयरमैन के मुताबिक कीमत का निर्धारण लोगों की जरूरत के मुताबिक होगा। इसमें कैंसर जैसी दवाएं शामिल हो सकती हैं। इससे इन गंभीर बीमारियों का इलाज सस्ता हो सकेगा। उन्होंने कहा कि हालिया गठित इस समिति की कोशिश रहेगी कि दवाइयों के प्राइस कैप में समानता हो। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि ऐसा करने के पीछे NPPA के पावर को कम करना नहीं है। पॉल ने कहा कि हमारा मानना है कि NPPA को स्वतंत्र और मजूबत किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हम NPPA उचित सुझाव देंगे।

 

MRP से तीन गुना महंगी बिकती हैं कैंसर की दवा 

सरकार का मानना है कि NPPA दवाओं की पहचान करके उनकी कीमत तय करने में सक्षम नहीं है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक फॉर्मास्यूटिकल कंपनी कैंसर जैसी दवाओं को MRP से 1450 रुपए महंगा बेचा जा रहा है। सरकार की कोशिश है कि ऐसी डिवाइस और तकनीक को भी कीमत निर्धारण के दायरे में लाया जाएं। 

 

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