नोटबंदी क्रूर, व्यापक और मौद्रिक झटका : पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार

पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम् पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम्

मोदी सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने नोटबंदी को देश के लिए बड़ा, क्रूर और मौद्रिक झटका करार देते हुए कहा है कि इससे अनौपचारिक क्षेत्र पर काफी बुरा प्रभाव पड़ा। नवंबर 2016 में जब सरकार ने नोटबंदी का फैसला लिया था तब सुब्रमण्यन ही मुख्य आर्थिक सलाहकार का पद संभाल रहे थे।

Money Bhaskar

Nov 29,2018 05:59:00 PM IST

नई दिल्ली

मोदी सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने नोटबंदी को देश के लिए बड़ा, क्रूर और मौद्रिक झटका करार देते हु कहा है कि इससे अनौपचारिक क्षेत्र पर काफी बुरा प्रभाव पड़ा। नवंबर 2016 में जब सरकार ने नोटबंदी का फैसला लिया था तब सुब्रमण्यन ही मुख्य आर्थिक सलाहकार का पद संभाल रहे थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 08 नवंबर 2016 की रात आठ बजे राष्ट्र के नाम विशेष टेलीविजन संबोधन में अचानक उस समय प्रचलित 500 रुपये और 1000 रुपये के नोटों को आम इस्तेमाल के लिए प्रतिबंधित करने की घोषणा की थी। उस रात 12 बजे से यह फैसला लागू हो गया था।

नोटबंदी के बाद घटी विकास दर

सुब्रमण्यन ने इसी साल जून में निजी कारणों से पद छोड़ दिया था लेकिन उसके बाद उन्होंने अपनी पुस्तक में इस फैसले को देश के लिए घातक करार दिया है। उन्होंने अपनी इस पुस्तक ‘फ काउंसेल : द चैलेंजेज फ द मोदी जेटली इकोनॉमी’ में मोदी सरकार के इस फैसले के बारे में लिखा है “नोटबंदी एक बड़ा, क्रूर, मौद्रिक झटका था, एक ही झटके में 86 प्रतिशत मुद्रा प्रचलन से बाहर हो गयी। स्पष्ट रूप से इससे वास्तविक जीडीपी विकास प्रभावित हुआ। नोटबंदी से पहले की सात तिमाहियों में औसत विकास दर आठ प्रतिशत थी जो नोटबंदी के बाद की सात तिमाहियों में घटकर 6.8 प्रतिशत रह गयी।”

नहीं मिले विकास के सही आंकड़े

पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार ने पुस्तक में लिखा है कि आम तौर पर प्रचलन में मौजूद मुद्रा और जीडीपी का ग्राफ समानांतर चलता है। लेकिन, नोटबंदी के बाद जहां मुद्रा का ग्राफ बिल्कुल नीचे आ गया, वहीं जीडीपी के ग्राफ पर काफी कम असर पड़ा। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जीडीपी के आंकड़े औपचारिक अर्थव्यवस्था के आधार पर तैयार किये जाते हैं। अनौपचारिक क्षेत्र की गतिविधियों को मापने के लिए अभी कोई तरीका नहीं है। इसलिए, औपचारिक क्षेत्र के आंकड़ों के आधार पर अनौपचारिक क्षेत्र के लिए अनुमानित आंकड़े तैयार किए जाते हैं। आम परिस्थितियों में यह तरीका सही हो सकता है, लेकिन नोटबंदी जैसे बड़े झटके के बाद जब मुख्य रूप से अनौपचारिक क्षेत्र ही प्रभावित हुआ हो इस तरीके से विकास दर के सही आंकड़े नहीं मिलते।

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