मोदी सरकार /मोदी सरकार के 5 आर्थिक सुधार जिनका नहीं बज सका डंका

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मृदा स्वास्थ्य कार्ड मृदा स्वास्थ्य कार्ड
सिंचाई योजना सिंचाई योजना
न्यूनतम समर्थन मूल्य न्यूनतम समर्थन मूल्य
ग्रामीण कृषि बाजार ग्रामीण कृषि बाजार

 

  • इन योजनाओं ने बिगाड़ा मोदी सरकार का रिकॉर्ड

Money Bhaskar

Apr 18,2019 05:40:31 PM IST

नई दिल्ली। नरेंद्र मोदी की एनडीए सरकार ने अपने 5 साल के कार्यकाल में ग्रामीणों और किसानों के लिए बहुत सी चीजें करने का वादा किया। सरकार ने इसके लिए भारी-भरकम बजट भी सेट किया। लेकिन इन 5 सालों में सरकार की ओर से किए गे खर्चों और प्रचार का किसानों के हालातों पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। आज हम आपको मोदी सरकार के उन वादों के बारे में बताने जा रहे हैं जो उन्होंने किसानों से किए थे लेकिन वह पूरे नहीं हो सके। नरेंद्र मोदी की सरकार ने किसानों की आमदनी को 2022 तक दोगुना करने का वादा किया था। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी की सरकार में कृषि की वृद्धि दर 2014 से 2019 के बीच औसतन 2.7 फीसदी कांग्रेस के 10 साल की तुलना में काफी कम रही है।

राष्टीय कृषि बाजार या ई-नाम- इसे अप्रैल 2016 में लॉन्च किया गया था। इसका मकसद कृषि उपज मंडी समितियों को एक इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग पोर्टल से जोड़ना था। जहां कृषि उत्पादों का कारोबार हो सके। एपीएमसी से जुड़ी सभी सूचनाओं और सेवाओं के लिए एकल खिड़की प्लेटफॉर्म की तरह इसे तैयार किया जाना था। इसे कृषि मार्केटिंग और व्यापार में उल्लेखनीय तरक्की के इरादे से लाया गया था, लेकिन सभी राज्यों ने ई-नाम से जुड़ने के लिए अपने एपीएमसी कानूनमें संशोधन नहीं किया। भारत के छोटे और सीमांत किसानों तक इसकी पहुंच ही नहीं है।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड- नरेंद्र मोदी सरकार ने 2015 में सभी किसानों तो तीन मसाल में एक बार मुफ्त दिया जाने वाला मृदा स्वास्थ्य कार्ड लॉन्च किया था। SHS में किसानों का पसंद की 6 फसलें शामिल होती हैं। मृदा कार्ड किसानों को मिट्टी में शामिल पोषक तत्वों के बारे में बताता है। लेकिन इसका वितरण गैर बराबर रहा। छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों मे वितरण में 95 फीसदी कामयाबी का दावा किया। वहीं बिहार, पश्चिम बंगाल और तेंलगाना ने मात्र 50 फीसदी कामयाबी का ही दावा किया।

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना- मोदी सरकार ने 1 जुलाई 2015 में 50 हजार करोड़ खर्च के साथ इस योजना को लॉन्च किया था। इस योजना का मकसद हर खेत तक पानी पहुंचाना, पानी के इस्तेमाल की दक्षता बढ़ाना था। लेकिन PMKSY में हर खेत को पानी मुहैया करने के लिए जहां 50 हजार करोड़ का निवेश करने का वादा किया गया था पर 2015-16 से लेकर 2019-20 के बीच सिर्फ 9,050 करोड़ रुपए ही खर्च किए गए।

न्यूनतम समर्थन मूल्य- यह भाजपा का वादा था। 2017 के बजट में न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाकर किसान की उत्पाजन लागत को डेढ़ गुना किया गया था। लेकिन असली चालाकी एमएसपी की गणना के तरीके में छपी थी। किसानों के संगठन ने सी2 तरीके से गणना करने की मांग की। जिसमें जमीन, किराए, देखरेख और प्रबंधन की लागत को भी उत्पादन लागत में शामिल किया जाता है। लेकिन मोदी सरकार ए2+एफएल तरीके का इस्तेमाल कर रही है। पहले केवल गेंहू और चावल के लिए सरकारी खरीद होती थी। लेकिन पीएम आशा योजना के तहत 23 वस्तुओं दाल, तिलहन, मोटे अनाज, कपास, और जूट के लिए एमएसपी तय किया गया है। पंजाब और हरियाणा में खरीद प्रणालियां उपलब्ध हैं, वहीं बिहार जैसे पूमर्वी राज्यों में इस किस्म का कुछ भी नहीं है।

ग्रामीण कृषि बाजार- एपीएमसी से सीधे लेनदेन नहीं कर पाने वाले 86 फीसदी छोटे और सीमांत किसानों के लिए एनडीए सरकार ने 22 हजार ग्रामीणहाट बाजारों को उन्नत करके ग्रामीण कृषि बाजार बनाने का लिया लिया था। इसके लिए 50 हजार करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। एपीएमसी के नियमों से मुक्त यह बाजार किसानों को अपनी उपज सीधे उपभोक्ताओं और थोक खरीदारों को बेचने में मदद कर सकते हैं। इसका नतीजा यह निकला कि किसानों को अपनी उपज का वजन करवाने और कीमत तय करने के लिए लंबी कतारों में खड़ा रहना पड़ा। मनरेगा का अधिकांश फंड कृषि कामगारों को देने में ही खत्म हो गया।

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