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  • Indias GDP losses by 2.8 percent due to climate change loss of around 82 lakh crores

असर /जलवायु परिवर्तन से भारत की GDP को 2050 तक सालाना 2.8% होगा नुकसान, 82 लाख करोड़ रुपए की लगेगी चपत

  • आधी आबादी पर होगा असर 
  • कम होगी खेती की पैदावार 

Money Bhaskar

May 02,2019 03:40:11 PM IST

नई दिल्ली. भारत के करीब 50 प्रतिशत लोगो खेती से जुड़े हैं। लेकिन साल 2015-16 के आंकड़ों के मुताबित जीडीपी में इसका योगदान महज 17.5 प्रतिशत रह गया है, जबकि 1950 के दशक में जीडीपी में कृषि का योगदान 50 प्रतिशत था। खेती के गर्त में जाने की कई वजह रही हैं. इसमें से एक जलवायु परिवर्तन है। इस मामले में ब्रिटेन दुनिया में सबसे आगे निकला, जहां जलवायु परिवर्तन आपात स्थिति घोषित की गई। ब्रिटेन जलवायु परिवर्तन को आपतकाल घोषित करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है। भारत को इस मामले में बहुत कुछ करना है। एचएसबीसी बैंक की तरफ से जारी रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 67 विकसित और उभरते देशों में भारत की स्थिति को सबसे खतरनाक बताया। भारत के बाद पाकिस्तान, फिलीपींस और बांग्लादेश का नाम आता है।

भारत की जीडीपी पर होगा असर

विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2050 तक भारत की जीडीपी करीब 2.8 प्रतिशत कम हो सकती है। इससे भारत को करीब 82 लाख करोड़ रुपए के नुकसान की संभावना है। इसकी चपेट में आने वाले दस सबसे प्रभावित जिलों में महाराष्ट्र के सात, छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव एवं दुर्ग और मध्य प्रदेश का होशंगाबाद होगा. यह सभी जिले अगले 32 सालों में देश के सबसे गरम स्थान होंगे।

आधी आबादी पर होगा असर

रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान में एक से दो प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो सकती है साथ ही मानसूनी बारिश का चक्र में बदलाव दिखेगा। इससे वर्ष 2050 तक देश की लगभग आधी आबादी का जीवन स्तर प्रभावित होगा। रिपोर्ट के मुताबिक, इसका असर देश की करीब 60 करोड़ आबादी पर पड़ेगा। वहीं इसकी सबसे ज्यादा मार कृषि क्षेत्र पर पड़ेगी, जिसकी उत्पादकता में काफी गिरावट आ सकती है। स्वास्थ्य पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा।

खेती पर असर

भारत में जलवायु परिवर्तन की वजह से सूखा, बाढ़ और बेमौसम बरसात होती है। इसकी वजह से खेती को जबरदस्त नुकसान पहुंच रहा। ऐसे में किसान आत्महत्या जैसे कदम उठान को मजबूर है। साथ ही जलवायु परिवर्तन की वजह से खेती की पैदावार पर भी असर पड़ रहा है। सरकार किसानों के नुकसान के कर्जमाफी जैसे कदम उठा रही है, जो कि ज्यादा वक्त तक कारगर साबित नहीं हो सकते हैं। सरकार को जलवायु परिवर्तन पर ध्यान देना होगा, जिससे खेती सीधे तौर पर प्रभावित हो रही है।

कम होगी खेती की पैदावार

कृषि मंत्रालय ने वरिष्ठ भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसद की प्राक्कलन समिति को बताया कि अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, सरसों जैसी फसलों पर जलवायु परिवर्तन का काफी बुरा प्रभाव पड़ सकता है. समिति ने इस समस्या को हल करने के लिए सरकार की कोशिशों को नाकाफ़ी बताया है। अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो 2050 तक गेहूं का उत्पादन छह से 23 प्रतिशत तक कम हो सकता है. इसी तरह मक्के का भी उत्पादन 2050 तक 18 प्रतिशत कम हो सकता है. वहीं 2020 तक जलवायु परिवर्तन की वजह से चावल का उत्पादन चार से छह प्रतिशत तक कम हो सकता है. आलू का उत्पादन भी 2020 तक 2.5 प्रतिशत, 2050 तक 6 प्रतिशत और 2080 तक 11 प्रतिशत कम हो सकता है.


डूर रहे हैं भारत के तटवर्ती इलाके

जलवायु परिवर्तन से भारत में कम से कम 60 करोड़ लोगों के प्रभावित होने की आशंका है, जिनमें से ज्यादातर कृषि से जुड़े या मछली पकड़ने वाले लोग शामिल हैं। भारत में अगस्त 2010 को लेह शहर बादल फटने के कारण तबाह हो गया था। इस कहर में 200 लोग मरे थे। जून 2013 में उत्तराखण्ड में बारिश से महात्रासदी, सितम्बर 2014 में जम्मू-कश्मीर ने 60 वर्षों की सबसे भयानक बाढ़ के अभिशाप को झेला जिसमें छःलाख लोग प्रभावित हुए और लगभग 200 से ज्यादा लोग मरे। केरल और तमिलनाडु की बाढ़ में कई लोगों की जान चली गई साथ ही आर्थिक तौर पर काफी नुकसान हुआ। तापमान बढ़ने की वजह ग्लेशियर्स की बर्फ पिघल रही हैं। इसकी वजह से भारत के तटवर्ती इलाके पानी में डूब रहे हैं।

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