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खास खबर: इकोनॉमी बचाने के लिए भिड़े US- चीन, ट्रेड वार में भारत कितना सेफ

दो देशों के बीच शुरू हुई ट्रेड वार की आंच दूसरे देशों तक भी पहुंची तो दुनिया एक और मंदी की ओर बढ़ जाएगी।

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नई दिल्ली। अपनी इकोनॉमी को बचाने के लिए दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं यूएस और चीन में ट्रेड वार शुरू हो चुका है। पिछले दिनों कुछ देशों के साथ व्यापार घाटे को लेकर अपेन ही देश में आलोचना के बाद यूएस गवर्नमेंट ने चीन की ट्रेड पॉलिसी पर हमला बोला है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि फिलहाल भारत तक अभी ट्रेड वार की आंच आती नहीं दिख रही है। लेकिन दो देशों के बीच शुरू हुई ट्रेड वार की आंच दूसरे देशों तक भी पहुंची तो दुनिया एक और मंदी की ओर बढ़ जाएगी, जिसमें भारत पर भी असर होगा। 

 

अमेरिका और चीन में क्या है ट्रेड वार

 

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से चीन पर 60 अरब डॉलर के व्यापार शुल्क लगाने की तैयारी है , इसके खिलाफ चीन का    करारा जवाब सामने आया है। चीन ने अमेरि‍का को चेतावनी दी है कि‍ वह 'ट्रेड वार' से नहीं डरता। चीन ने धमकी दी है कि‍ वह इंपोर्ट के खि‍लाफ उठाए गए डोनाल्ड ट्रंप के कदम के बदले 3 अरब डॉलर की लागत वाले अमेरि‍की गुड्स पर टैरि‍फ लगाएगा। असल में चीन के अलावा कोरिया, जापान जैसे एशियाई देश भी यूएस को इंपोर्ट के मुकाबले एक्सपोर्ट ज्यादा करते हैं। ऐसे में ट्रम्प सरकार आने वाले दिनों में इन देशों के साथ भी अपनी ट्रेड पॉलिसी सख्‍त कर सकती है। जिसका रिएक्शन चीन की तरह ही ये देश भी दिखा सकते हैं। वहीं, इनमें कुछ और देश भी शामिल हो सकते हैं।  बता दें कि अमेरिका की रंसरक्षणवादी नीति को लेकर मैक्सिको, कनाडा और यूरोपीयन संघ ने विरोध किया था। यूरोपीयन संघ के अधिकारियों ने यह भी कहा था कि स्टील और एल्युमीनियम पर आयात शुल्क लगाने के बाद वे भी अमरीका में बनी हार्ले डेविडसन बाइक, बरबन व्हिस्की और लेवी जींस सहित अमेरीकी प्रोडक्ट पर नए कर लगाएंगे। 

 

बढ़ सकता है ट्रेड वार का दायरा
आर्थिक मामलों के जानकार पनिंदकर पई का कहना है कि मौजूदा समय में अमेरिका नेशन फर्स्ट की पॉलिसी पर काम कर रहा है। अगर यूएस इसी तरह से एग्रेसिव ट्रेड पॉलिसी पर काम करता रहा तो दूसरे बड़ी इकोनॉमी वाले देश भी यूएस के साथ नेशन फर्स्ट की पॉलिसी पर काम करना शुरू कर देंगे। इसमें चीन, जापान और यूरोपीय देशों की प्रमुख भूमिका हो सकती है। ऐसे में इस बात का डर बन गया है कि 2 देशों के बीच शुरू हुए ट्रेड वार की आंच कई देशों तक फैल जाएगी। ऐसा हुआ तो ट्रेड वार में फंसे देशों के साथ दूसरे देशों की व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित होंगी, जिससे नेशनल इनकम कमजोर होगी। पई ने इस संभावना से भी इंकार नहीं किया कि अगर ट्रेड वार लंबा खिंचता है तो दुनिया एक और मंदी की ओर जा सकती है। 

 

ट्रेड वार से भारत कितना सेफ 
फॉर्च्युन फिस्कल के डायरेक्टर जगदीश ठक्कर का कहना है कि फिलहाल ट्रेड वार की आंच भारत पर आती नहीं दिख रही है, क्योंकि अभी यूएस उन देशों के साथ ट्रेड पॉलिसी को लेकर ज्यादा सख्‍त है, जिनके साथ व्यापार घाटा ज्यादा है। मसलन चीन, जापान, कोरिया जैसे देश। ये देश यूएस को इंपोर्ट के मुकाबले एक्सपोर्ट ज्यादा करते हैं। वहीं, जिन प्रोडक्ट पर यूएस को व्यापार घाटा हो रहा है, उसके एक्सपोर्ट में भारत की हिस्सेदारी बहुत कम है।  

 

भारत के मुकाबले चीन के साथ कई गुना ट्रेड डेफिसिट   
यूएस जहां चीन को 13040 करोड़ डॉलर का एक्सपोर्ट करता है, वहीं, चीन से वह 50560 करोड़ डॉलर का इंपोर्ट करता है। यानी चीन के साथ व्यापार घाटा 37500 करोड़ रुपए है। चीन यूएस के साथ लीडिंग ट्रेड पार्टनर है, वहीं भारत टॉप ट्रेडिंग पार्टनर्स में शामिल नहीं है। हालांकि भारत बड़ी मात्रा में यूएस में आईटी सर्विस, टेक्सटाइल, कीमती पत्थरों का निर्यात करता है। वहीं, जापान के साथ यूएस का व्यापार घाटा 6880 करोड़ डॉलर, जर्मनी के साथ 5420 करोड़ डॉलर और मैक्सिको के साथ 7100 करोड़ डॉलर है। वहीं, इस तुलना में भारत के साथ यूएस का व्यापार घाटा करीब

2290 करोड़ डॉलर है जो बहुत कम है। 

 

भारत पर किस तरह से पड़ सकती है आंच 
1.
पई का कहना है कि ट्रेड वार की आंच भारत तक पहुंचेगी, इसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। यूएस ने जिस तरह से चीन से आयात पर टैरिफ लगाया है, उसी तरह से वह भारत से आयात होने वाले इंपोर्ट पर भी ड्यूटी बढ़ा सकता है। असल में भारत के साथ भी यूएस का कारोबार देखें तो घाटे में अमेरिका ही है। भारत का यूएस के साथ व्यापार WTO के नियमों और 2005 के ट्रेड पॉलिसी फोरम के आधार पर होता है। 

 

2. पिछले साल भारत-अमेरिका में 6700 करोड़ डॉलर का करोबार हुआ था। वहीं, चीन के साथ 7148 करोड़ डॉलर का कारोबार भारत ने किया था। यानी ट्रेड पार्टनर की बात करें तो भारत-अमेरिका, भारत-चीन आपस में बड़े ट्रेड पार्टनर हैं। भारत के लिहाज से अमेरिका और चीन टॉप ट्रेड पार्टनर हैं। ऐसे में अगर यूएस-चीन के बीच वार से व्यापारिक माहौल बिगड़ता है तो इसका असर भारत पर पड़ना तय है। 

 

3. जगदीश ठक्कर का कहना है कि मौजूदा समय में भारत को जिस बात की चिंता है, वह बाजार को लेकर है। अमेरिका द्वारा चीन के आयात पर टैरिफ लगाने के बाद से दुनियाभर के बाजारों में बिकवाली रही है। घरेलू शेयर बाजार 5 महीने के निचले स्तर पर आ गए। वहीं, एक दिन में बीएसई का मार्केट कैप 1.60 लाख करोड़ घट गया। ट्रेड वार बढ़ने की आशंका से विदेशी निवेशक बाजार से और ज्यादा निवेश निकाल सकते हैं। मार्केट में लिक्विडिटी की पोजिशन पहले से ही टाइट है, एफआईआई इसे और ज्यादा टाइट कर सकते हैं। इससे मार्केट में गिरावट का डर बना हुआ है।  

 

आगे पढ़ें, ट्रेड वार को लेकर कौन ज्यादा परेशान.......

 

 

 

भारतीय कंपनियां ज्यादा परेशान: सर्वे 
दुनियाभर में बढ़ रहे संरक्षणवाद को लेकर भारतीय कंपनियां सबसे ज्यादा चिंतित हैं। इसकी वजह क्रॉस बॉर्डर ट्रेड की लागत बढ़ना है। एचएसबीसी के ग्लोबल सर्वे में यह बात कही गई है। एचएसबीसी के ग्लोबल सर्वे के मुताबिक, देश में 10 में से 9 कंपनियों को लगता है कि सरकारें तेजी से संरक्षणवादी नीतियां अपना रही हैं। सर्वे में 26 बाजारों की 6000 कंपनियों को शामिल किया गया था।

 

दुनियाभर में चिंता
नेविगेटर: नाउ, नेक्स्ट ऐंड हाउ फॉर बिजनेस' नाम से हुए सर्वे के मुताबिक ग्लोबल स्तर पर 5 में से 3 यानी 61 फीसदी  को लगता है कि अलग-अलग देश अपनी इकोनॉमी के लिए अधिक संरक्षणवादी बनते जा रहे हैं।इसकी वजह से इंटरनेशनल ट्रेड करने की लागत बढ़ी है। वहीं, ट्रेड करना भी पहले से कठिन हो रहा है। इससे बचने के लिए कंपनियां क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देने में लगी हैं। इसके अलावा डिजिटल टेक्नोलॉजीज और कन्ज्यूमर डिमांड में रुख को भुनाने में लगी हैं। 
 

क्या है ट्रेड वार
ट्रेड वॉर 2 देशों के बीच होने वाले संरक्षणवाद का नतीजा है। जब कोई देश किसी देश से होने वाले इंपोर्ट पर टैरिफ ड्यूटी बढ़ाता है तो इसके जवाब में सामने वाला देश भी उसी तरह से ड्यूटी बढ़ाने लगता है। कोई भी देश यह कदम तब उठाता है जब वह अपनी घरेलू इंडस्ट्री और कंपनियों का संरक्षण करना चाहता है। इस ट्रेड वॉर का असर धीरे-धीरे पूरी दुनिया पर दिखने लगता है। इसकी वजह से ग्लोबल स्तर पर कारोबार को लेकर अनिश्चितता का माहौल तैयार हो जाता है।

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