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किशनगंगा पर पाकिस्‍तान को फिर झटका, मोदी को रोकने का प्‍लान भी फेल

जम्‍मू-कश्‍मीर की किशनगंगा परियोजना विवाद पर विश्‍व बैंक ने पाकिस्‍तान को सलाह दी है कि वह भारत की बात मान लें...

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नई दिल्‍ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 19 मई को देश को समर्पित जम्‍मू-कश्‍मीर की किशनगंगा नदी जल परियोजना पर पाकिस्‍तान को विश्‍व बैंक से झटका लगा है। ग्‍लोबल संस्‍था ने पाकिस्‍तान को सलाह दी है कि वह भारत का बात मान ले। उद्घाटन से पहले पाकिस्‍तान ने इस परियोजना को अंतराष्‍ट्रीय विवाद बनाने की एक और कोशिश की थी, हालांकि ऐसा नहीं हो पाया था। यह तीसरा बड़ा मौका है, जब पाकिस्‍तान को किशनगंगा परियोजना पर विश्‍व बैंक से सीधा झटका लगा है। पाकिस्‍तान ने इस बांध के उद्घाटन का विरोध भी किया था। हालांकि पीएम मोदी ने इसके बाद भी उद्घाटन किया था।  

 

क्‍या कहा विश्‍व बैंक ने ?   
किशनगंगा परियोजना की शिकायत लेकर पहुंचे पाकिस्तान से विश्‍व बैंक ने कहा है‍ कि वह इस विवाद को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत (आईसीए) में ले जाने के बजाय भारत की उस पेशकश को स्‍वीकार कर ले, जिसमें नई दिल्‍ली ने मामले के लिए एक तटस्‍थ विशेषज्ञ (नैचुरल एक्‍सपर्ट) नियुक्‍त करने का प्रस्‍ताव दिया था। भारत ने 2 साल पहले ही इस प्रस्ताव की पेशकश की थी। 


अंतराष्‍ट्रीय विवाद बनाना चाहता था पाकिस्‍तान 
किशनगंगा को लेकर अंतराष्‍ट्रीय मंचों पर पाकिस्‍तान भारत के खिलाफ लंबे समय से लॉबिंग करता रहा है। 2007 में इस परियोजा के निर्माण का काम शुरू होने के बाद पाकिस्‍तान को अंतराष्‍ट्रीय न्‍यायालय और वर्ल्‍ड बैंक से पहले भी नाकामी मिलती रही है। हालांकि परियोजना पूरी होने के बाद पीएम मोदी की ओर से पिछले महीने उद्घाटन से पहले भी पाकिस्‍तान ने इसे अंतराष्‍ट्रीय विवाद बनाने की कोशिश की थी। पाकिस्‍तान ने मई के शुरुआती हफ्ते में विश्‍व बैंक से संपर्क कर इस मामले में मुलाकात के लिए समय मांगा था, लेकिन विश्‍व बैंक ने सुनवाई का वक्‍त ही 19 मई के बाद का दिया। 

 

चूक गया पाकिस्‍तान 
पाकिस्‍तान के अखबार डॉन के मुताबिक, पाकिस्‍तान की कोशिश थी कि वह मोदी के उद्घाटन से पहले इस मामलों को अंतराष्‍ट्रीय विवाद बना दे। हालांकि विश्‍व बैंक ने सुनवाई की तुरंत कोई तारीख नहीं दी तो, अखबार ने लिखा कि उद्घाटन से पहले किशनगंगा परियाजना में विश्‍व बैंक को भी पार्टी बनाने को मौका पाकिस्‍तान चूक गया।  

 

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पाक का आरोप- भारत का तर्क 
पाकिस्तान का आरोप है कि भारत किशनगंगा बांध के जरिए 1960 के सिंधु नदी जल समझौते का उल्लंघन कर रहा है। वह इस मामले को अंतराष्‍ट्रीय अदालत में ले जाना चाहता है। हालांकि भारत का कहना है कि पाकिस्तान व उसके बीच मतभेद बांध के डिजाइन को लेकर है। इसका समाधान किसी तटस्थ विशेषज्ञ द्वारा किया जाना चाहिए। सिंधु नदी के जरिए पाकिस्तान की 80 प्रतिशत खेती की सिंचाई होती है। पाकिस्‍तान का कहना है कि बांध बनने से न सिर्फ नदी का रास्‍ता बदलेगा, बल्कि उसके यहां बहने वाली नदियों के जलस्‍तर में भी कमी आएगी। 

 

पहले भी पाक को नहीं दी थी राहत
12 दिसंबर 2016 को विश्व बैंक के तत्‍कालीन प्रमुख ने तब पाकिस्‍तान के वित्त मंत्री रहे इशाक डार को बताया था कि ग्‍लोबल बॉडी इस मामले में दखल के लिए तैयार नहीं है। विश्‍व बैंक ने इस मामले में इंटरनेशनल कोर्ट के साथ ही निष्पक्ष विशेषज्ञ नियुक्ति प्रक्रिया तत्‍काल रोकने का फैसला किया था। सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर भारत और पाकिस्‍तान के बीच 1960 में हुए समझौते में विश्‍व बैंक का स्‍टेटस एक आर्बिटेशन का है। बिना उसकी अनुमति के पाकिस्‍तान इंटरनेशनल कोर्ट भी नहीं जा सकता है। कोर्ट की नियुक्ति का अधिकार विश्‍व बैंक के पास ही है। दरसअल सिंधु नदी जल समझौते में अहम भूमिका निभाने के चलते दोनों देशों ने विश्‍व बैंक को आर्बिटेशन का स्‍टेटस दिया है।  

 

पाक की कोई बात नहीं मानी

पाकिस्तान ने कई बैठकों में किशनगंगा बांध निर्माण की सैटेलाइट तस्वीरें भी विश्व बैंक के सामने पेश की। यहां तक कि विश्व बैंक ने बांध के निर्माण पर रोक लगाने वाली पाकिस्तान की याचिका को भी खारिज कर दिया था। 22 मई 2018 को विश्व बैंक ने पाकिस्तान की उस याचिका को भी खारिज कर दिया, जिसमें उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किशनगंगा बांध के उद्घाटन को लेकर चिंता व्यक्त करने की मांग की थी। पाकिस्तान का आरोप है कि एक तरफ विश्व बैंक ने आईसीए में यह मामला उठाने से उसके हाथ बांध रखे हैं, दूसरी तरफ उसने भारत को बांध बनाने से नहीं रोका। 

 

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2013 में भारत के पक्ष में हुआ था फैसला
भारत ने साल 2007 में पहली बार किशनगंगा  परियोजना पर काम शुरू किया था। इसके 3 साल बाद पाकिस्तान ने यह मामला हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में उठाया। जहां 3 साल के लिए इस परियोजना पर रोक लगा दी गई। साल 2013 में कोर्ट ने फैसला दिया कि किशनगंगा परियोजना सिंधु जल समझौते के अनुरूप है और भारत ऊर्जा उत्पादन के लिए इसके पानी को मोड़ सकता है। इसके बाद पारियोजना पर काम फिर से शुरू हुआ।  

 

प्रस्ताव मानने को तैयार नहीं
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान इस मामले में भारत का प्रस्ताव मानने को तैयार नहीं है। पाकिस्तान को डर है कि इससे वह अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में अपना पक्ष खो सकता है। साथ ही मध्यस्थता के सभी दरवाजे बंद हो सकते हैं। इसके बाद अन्य मामलों में जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच कोई भी विवाद पैदा होगा तो इसी तरह के निष्पक्ष विशेषज्ञ के जरिए विवाद को सुलझाने की कोशिश की जा सकती है। 

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