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खास खबर: अरब देशों में ऐसा क्या है, जिससे जान जोखिम में डालते हैं भारतीय

इराक के मोसुल में 39 भारतीयों का 'नरसंहार' हुआ। इस खबर से पूरा देश स्‍तब्‍ध है।

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नई दिल्‍ली. इराक के मोसुल में 39 भारतीयों का 'नरसंहार' हुआ। इस खबर से पूरा देश स्‍तब्‍ध है। दो साल से ज्‍यादा समय की पड़ताल के बाद विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज ने मंगलवार को खुद संसद में इसकी जानकारी दी। मृतकों के परिजनों पर तो यह बयान कहर बनकर टूटा है। अरब देशों में भारतीयों की मौत या उनके खिलाफ हिंसा की यह पहली वारदात नहीं है। इसमें फर्क यह है कि यह पहली बार किसी आतंकी संगठन की ओर से इतने बड़े पैमाने पर भारतीयों का किया गया नरसंहार है। अब सवाल यह है कि यदि अरब देश में भारतीयों की सुरक्षा की पुख्‍ता गारंटी नहीं है तो वे वहां का रुख क्‍यों करते हैं? 


पैसा खींच ले जाता है अरब देश 
दिल्‍ली यूनिवर्सिटी के असिस्‍टेंट प्रोफेसर और विदेश मामलों के जानकार प्रशांत कुमार ने कहा कि भारतीयों के अरब देशों में जाने की सबसे बड़ी वजह पैसे की बचत होती है। उदाहरण के लिए अगर किसी भारतीय मजदूर को अरब के देश में 3 हजार रियाल (सऊदी अरब की करंसी) हर महीने मिलते हैं तो वह अमाउंट भारत में करीब 53 हजार रुपए हो जाएगी। चूंकि अरब देशों में खाने-पीने का खर्च भी कम है, इसलिए कोई भी आसानी से 2 हजार से ज्‍यादा रियाल बचा सकता है। यानी वह हर महीने 35 हजार रुपए से ज्‍यादा की सेविंग कर रहा है। 

 

किसी काम से नहीं होती गुरेज 
प्रशांत का कहना है कि अधिकतर लोग ग्रुप बनाकर अरब देशों में जाते हैं, इसलिए भी खर्चे कम और बचत ज्‍यादा होती है। परिवार का साथ नहीं होना भी बचत की गारंटी होती है। इसके अलावा अधिकतर भारतीय अपने देश में किसी का नौकर बनना या मजदूरी करना शान के खिलाफ समझते हैं। वहीं, अरब देशों में जाकर वह इसे खुशी - खुशी स्‍वीकार कर लेते हैं और फिर वह इन देशों में होने वाले खतरों को नजरअंदाज भी कर देते हैं। 

 

आगे पढ़ें - ज्‍यादातर काम कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनी का 

 

 

ज्‍यादातर काम कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनी का 
अरब देशों में ज्‍यादातर काम कंस्‍ट्रक्‍शन सेक्‍टर का है। जिसमें बड़े पैमाने पर कामगारों की जरूरत है। भारतीय कामगार आसानी से इन कंपनियों के लिए काम करने को तैयार हो जाते हैं। जिन 40 भारतीयों को आईएस ने 2014 में अगवा कर दिया था, जिनमें से 39 को मार डाला, वो सभी भी मोसुल की कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनी तारिक नूर अल हुदा में काम करते थे। यह कन्‍स्‍ट्रक्‍शन के अलावा ट्रेडिंग और पेट्रोल सर्विस में भी है। इसके अलावा, भारतीय कामगारों का ज्‍यादातर जॉब सर्विसेस में मिलती है।

 

कंपनी ने यहां 2011 में करीब 87,776 अरब दिनार की मदद से 1000 फ्लैट की पूरी कॉलोनी का निर्माण किया। इसमें इलेक्ट्रिक स्‍टेशन के साथ सीवेज स्‍टेशन, वॉटर सप्‍लाई, मॉल, मस्जिद, स्‍कूल, सड़क, स्‍पोर्ट्स स्‍टेडियम के साथ इंटरनेट और टेलिफोन नेटवर्क डेवलप करने जैसे काम भी शामिल थे। इसका अलावा कंपनी पवित्र शहर कर्बला में कई सड़कों और मस्जिद का निर्माण कर चुकी है।   

 

मुस्लिम मजदूरों को ज्‍यादा तवज्‍जो 
इन देशों में उन भारतीय मजदूरों को ज्‍यादा तवज्‍जो दी जाती है जो मुस्लिम होते हैं। दरअसल, मुस्लिम लोगों को इन देशों के कल्‍चर में इन्‍वॉल्‍व होने में आसानी होती है। हालांकि प्रशांत बताते हैं कि पिछले कुछ समय से अरब देशों की प्राइवेट कंपनियां अपने फायदे के लिए मुस्लिमों की बजाए हिंदुओं को ज्‍यादा तवज्‍जो दे रही हैं। ताकि उनका अधिक से अधिक दोहन हो सके। दरअसल, प्राइवेट कंपनियां चाहती हैं कि मजदूर अपना हर वक्‍त कंपनी को दें और कम से कम छुट्टिटयां लें। आगे पढ़ें - क्‍या कहते हैं आंकड़े?  

 

 

क्‍या कहते हैं आंकड़े?  


2017 के सितंबर में आए विदेश मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 85 लाख भारतीय अरब देशों में काम करते हैं। 2017 के पहले 7 महीनों में 2.77 लाख भारतीय रोजगार की तलाश में खाड़ी देश गए। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने सबसे ज्यादा 1.10 लाख भारतीयों को रोजगार मुहैया कराया। उसके बाद सऊदी अरब (59,911), ओमान (42,095), कुवैत (40,010) और बहरीन (7,591) का नंबर आता है। 


खाड़ी देशों की विस्थापितों की सूची में उत्तर प्रदेश 62,438 लोगों के साथ पहले स्थान पर है जबकि उसके ठीक पीछे बिहार (50,247), पश्चिम बंगाल (25,819) और तमिलनाडु (24,003) हैं। पिछले कुछ सालों में केरल से खाड़ी देश जानेवालों की तादाद तेजी से घटी है। 

 
कहां से कितना पैसा आता है भारत
देश                     पैसा 
सऊदी अरब       1051 करोड़ डॉलर
यूएई                   1267 करोड़ डॉलर
कुवैत                 461 करोड़ डॉलर
बहरीन               125 करोड़ डॉलर 
ओमान              307 करोड़ डॉलर   
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