Advertisement
Home » इकोनॉमी » इंटरनेशनलPakistan general election and it's Democracy, Imran Khan wins Pakistan general election 2018

पाकिस्‍तान में कोई 'चायवाला' आखिर क्‍यों नहीं बनता देश का प्रधानमंत्री

भुट्टो और शरीफ की तरह इमरान भी पाकिस्‍तान के संभ्रांत परिवार से ही आते हैं...

1 of

नई दिल्‍ली. आम चुनाव-2018 के बाद पाकिस्‍तान (pakistan)  में इमरान खान  (imran khan) का प्रधानमंत्री बनना तय माना जा रहा है। क्रिकेट के जरिए पाकिस्‍तान की सत्‍ता के शिखर पर पहुंचने के लिए इमरान (imran khan) को भले ही 22 साल का लंबा वक्‍त लगा, लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह वह एक चायवाले नहीं है। वह यूपी की पूर्व सीएम मायावती के तरह दलित परिवार से भी नहीं आते हैं। न ही ममता बनर्जी की तरह ही उन्‍होंने एक सामान्‍य पार्टी कार्यकता से कॅरियर की शुरुआत करके क्षत्रप बनने का सफर तय किया। पाकिस्‍तान के बड़े जमीदारों के बच्‍चों की तरह ऑक्‍सफोर्ड से पढ़ाई करने वाले पाकिस्‍तान के पूर्व क्रिकेटर इमरान राजनीति में स्‍टार की तरह आए और आज प्रधानमंत्री बनने जा रहेे हैं। इमरान ही नहीं देश के अन्‍य पूर्व प्रधानमंत्रियों नवाज शरीफ, बेजनीर भुट्टो से लेकर शाहिद खकान अब्‍बासी और यूसुफ रजा गिलानी भी किसी चाय वाले या दलित के बेटे नहीं है। 

Advertisement

 

बड़ा सवाल, आखिर क्‍यों भारत की तरह पाकिस्‍तान में कोई चायवाला प्रधानमंत्री क्‍यों नहीं बनता है? हमेशा रसूखदार और राजनीतिक परिवारों से आने वाले लोग ही पाकिस्‍तानी राजनीति की पहली जमात में क्‍यों नजर आते हैं। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में असिस्‍टेंट प्रोफेसर प्रशांत त्रिवेदी के मुताबिक, पाकिस्‍तान का पॉलिटिकल ढांचा अब भी सामंती है। इंडस्ट्रियलाइजेशन, इकोनॉमिक तथा लैंड रिफॉर्म जैसी चीजें नहीं होना इसका सबसे बड़ा कारण है। पाकिस्‍तान में मिडिल क्‍लास कभी पनप ही नहीं पाया। प्रशांत का मानना है कि इसके पीछे इकोनॉमी, समाजशास्‍त्र और राजनीति का एक पूरा मैकेनिजम काम करता है। इसी मैकेनिज्‍म ने पाकिस्‍तान में किसी चाय वाले को पीएम नहीं बनने दिया। आइए जानते हैं इन्‍हीं कारणों के बारे में... 

 

नेता आखिर कैसे पैदा होंगे?

किसी समाज में नेता सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन (जेपी-अन्‍ना जैसे मूवमेंट) से पैदा होते हैं। पाकिस्‍तान की सोसायटी में हमेशा इसका अभाव रहा है। भारत में आज जितने भी क्षेत्रीय नेता हैं वो किसी न किसी सामाजिक आंदोलन से पैदा हुए। दक्षिण भारत में करुणानिधि और एनटी रामाराव से लेकर उत्‍तर में मुलायम सिंह, लालू यादव, मायावती सबके उभार में किसी न किसी आंदोलत ने भूमिका निभाई। पर पाकिस्‍तान में ऐसा नहीं हो सकता। वहां सेना और कुछ राजनीतिक परिवार ही सत्‍ता के लिए आपस में लड़ते रहे। ऐसा नहीं कि वहां दूसरे आंदोलन खड़े नहीं हुए। पर उन्‍हें स्‍पेस देने की बजाय कुचल दिया गया। इसके चलते आम चेहरे कभी सामने आ ही नहीं पाए। 

Advertisement

 

 

आगे पढ़ें- उन कारणों के बारे में जिनके चलते आम पाकिस्‍तानी पॉलिस्टिक्‍स में ऊपर तक नहीं आ पाता है... ​

 

 

 

इंडस्ट्रियलाइजेशन, इकोनॉमिक तथा लैंड रिफॉर्म बड़ा कारण 
दुनिया के ज्‍यादातर हिस्‍सों में आंदोलन हमेशा मिडिल क्‍लास की रहनुमाई में होते हैं। भारत का पूरा स्‍वतंत्रता आंदोलन भी तभी उफान पर पहुंचा जब इसके साथ मिडिल क्‍लास जुड़ा। इसे साधने का काम महात्‍मा गांधी ने किया था। अपने निर्माण से आज तक पाकिस्‍तान में लैंड रिफॉर्म नहीं हुआ। वहां हजारों एकड़ का मालिकाना हक रखने वाले अमीर जमीदार रहते हैं, या फिर छोटे मोटे कामकाज के जरिए गुजारा करने वाले लोवर क्‍लास के लोग। प्रशांत के मुताबिक, मिडिल क्‍लास हमेशा से एस्‍पीरेशनल क्‍लास होता है। उसमें हमेशा से सोसायटी के ऊपरी पायदान पर पहुंचने की आकांक्षा होती है। भारत में ऐसे ही परिवारों से निकले लोग छात्र राजनीति के जरिए राजनीति के बड़े पदों पर पहुंचे। पर पाकिस्‍तान में ऐसा नहीं हो सका। 

 

आगे पढ़ें- पाकिस्‍तान में लोगों को क्‍यों नही मिल पाता पोलिटिकल स्‍पेस.... 

 
 

पॉलिटिकल स्‍पेस की कमी 
पाकिस्‍तान में लोकतंत्र कभी अपनी जड़ें नहीं जमा सका। इसके चलते राजनीतिक संस्‍थान आम लोगों को अपनी ओर आकर्षित ही नहीं कर सके। आजादी के कुछ समय बाद जिन्‍ना की मौत हो गई, लियाकत अली के बाद सत्‍ता सेना के हाथ में चली गई। इसी के साथ ही सत्‍ता को लेकर सेना और पॉलिटिकल पार्टियों के बीच संघर्ष चलता रहा। इस खींचतान में नीचे के तबके के लोगों को पॉलिटिकल स्‍पेस मिलने का रास्‍ता बंद हो गया। इस दौरान कुछ पॉलिटिक मूवमेंट जरूर हुए, लेकिन उन्‍हें जिस तरीके से कुचला गया, उसने पाकिस्‍तान के आम आदमी के मन में सिस्‍टम से सवाल पूछने और सिस्‍टम में आने की उसकी आकांक्षा पर ब्रेक लगा दिया। मतलब आम जिंदगी और पॉलिटिक क्‍लास में एक खास तरह की दूरी बनी रही। इसके ठीक उलट भारत में ऐसा नहीं हुआ। चाहे अन्‍ना और जेपी मूवमेंट हो या फिर नार्थ ईस्‍ट में अपनी पहचान को लेकर चलने वाले सशस्‍त्र आंदोलन हो। इन सभी को स्‍पेस मिला। इसके चलते इन आंदोलनों से जुड़े लोग सत्‍ता में आए। ये वो लोग थे, जो कभी मुख्‍य धारा का हिस्‍सा नहीं थे, लेकिन आंदोलन की बाद भारत की पिछली सरकारों ने इन्‍हें स्‍पेस दिया, इनके नेता सीएम और केंद्रीय मंत्री बने। 

 

आगे पढ़ें- क्‍या आगे संभावनाएं है .... 

 

 

क्‍या आगे संभावनाएं है? 
प्रशांत के मुताबिक, यह तभी संभव होगा, जब वहां लोकतंत्र मजबूत हो, राजनीतिक दल आम लोगों के बीच काम करें। संगठन परिवार की जगह विचारधारा पर आधारित हो। जैसे भारत में भाजपा, कांग्रेस या कम्‍यूनिस्‍ट पार्टियां हैं। छात्र राजनीति को स्‍पेस मिले। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, बिहार के सीएम नीतीश कुमार छात्र राजनीति के चलते राजनीति में बड़ा नाम बने। पार्टियां परिवार की जगह काबिल लोगों को आगे बढ़ाएं। जैसे भाजपा ने मोदी को बढ़ाया। तभी जाकर चाय वाला देश का पीएम बन सकता है। हालांकि, इन सबके लिए पहली शर्त यही है कि वहां लोकतंत्र मजबूत हो।    

 

prev
next
मनी भास्कर पर पढ़िए बिज़नेस से जुड़ी ताज़ा खबरें Business News in Hindi और रखिये अपने आप को अप-टू-डेट
Advertisement