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खास खबर: दबाव नहीं जरूरत करा रही मोदी-जिनपिंग की मुलाकात, ये है पीछे का सच

नई दिल्‍ली। राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन पहुंच गए हैं।इससे पहले चीन में चल रही शंघाई सहयोग संगठन की बैठक से इतर जब विदेश मंत्री सुषमा स्‍वराज ने दुनिया को बताया कि जल्‍द ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनिपिंग आपस में बैठक करेंगे, तो डिप्‍लोमेसी के जानकारों को एकाएक यकीन नहीं हुआ। पिछले एक साल के भीतर भारत और चीन के बीच जो कुछ घटा उसके बाद इस बात की गुंजाइश कम थी कि एशिया की  2 बड़ी इकोनॉमी वाले देशों के रिश्‍ते इतनी आसानी से पटरी पर आए जाएंगे। 

 

डोकलाम गतिरोध, न्‍यूक्लियर सप्‍लायर ग्रुप (NSG) में भारत की दावेदारी का विरोध और आतंकवाद को लेकर यूएन समेत कई बड़े मंचों पर पाकिस्‍तान का समर्थन। चीन के कुछ ऐसे कदम थे, जिन्‍होंने दोनों देशों के रिश्‍तों को असहज स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया था। हालांकि इन सारी कड़वाहटों के बीच दोनों नेता मिलने को तैयार हैं। बड़ा सवाल उठता है कि आखिर ऐसे कौन से कारण थे, जिनके चलते मोदी को चीन के साथ वार्ता की मेज पर आने को मजबूर होना पड़ा और जिनिपिंग को अपनी अकड़ छोड़कर भारत से दोस्‍ती दिखानी पड़ी।  

 

 

चीन और भारत के अपनी अपनी चालें 
चीन मामलों के जानकार और जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर संजय भारद्वाज के मुताबिक, ऐसा नहीं हो सकता है कि भारत चीन के साथ और चीन भारत के साथ लंबे समय तक मुंह मोड़ ले या आपने संबंधों को खत्‍म कर ले। इकोनॉमी, कॉमर्स, डिप्‍लोमेसी समेत मौजूदा समय में ऐसे बहुत से मसले हैं, जहां भारत को चीन की और चीन को भारत की जरूरत है। कई आर्थिक मंचों पर दोनों देश साथ काम कर रहे हैं। ऐसे में विरोध के समय दोनों देश अपनी अपनी चालें चलेंगे, लेकिन इसके बाद भी साथ-साथ काम करना पड़ेगा। भारद्वाज के मुताबिक, दोनों की अपनी आर्थिक जरूरत और जियो पॉलिटिकल मजबूरियां हैं। आइए इसी की पड़ताल करते हैं। 

 

 

चीन की जरूरत और मजबूरियां 

 

1- बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (BRI) प्रोजेक्‍ट
 चीन ने 900 अरब डॉलर की मदद से बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (BRI) प्रोजेक्‍ट शुरू किया है। POk के चलते भारत ने एक बार फिर से इस परियोजना में शामिल होने से मना कर दिया है। दिल्‍ली विश्‍वविद्याल में असिस्‍टेंट प्रोफेसर प्रशांत त्रिवेदी के मुताबिक, चीन को लग रहा था कि वो इस प्रोजेक्ट के लिए भारत को मना लेगा। रूस को छोड़ दिया जाए तो इस प्रोजेक्‍ट को अभी तक किसी भी बड़े देश ने अपना समर्थन नहीं दिया है। ऐसे में उसे लगता है कि भारत का समर्थन इस प्रोजेक्‍ट को एक वैधानिक और वैश्विक स्‍वीकृति दोनों दिला सकता है।    

 

2- भारत के साथ 84.44 बिलियन डॉलर का कारोबार 
अमेरिका को छोड़कर दिया जाए तो भारत चीन का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। हाल में आए चाइनीज जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ कस्टम के आंकड़ों की मानें तो पिछले साल भारत और चीन के बीच कारोबार में 19% की ग्रोथ दर्ज की गई। पहली बार दोनों देशों के बीच 5.5 लाख करोड़ रुपए (84.44 बिलियन डॉलर) का कारोबार हुआ है। 2016 में यह कारोबार 4.62 लाख करोड़ रुपए (71.18 बिलियन डॉलर) था। चीन के लिए राहत की बात यह है कि भारत के साथ उसका कारोबार सरप्‍लस में है। पिछले साल भारत को उसने 68.10 बिलियन डॉलर का एक्‍सपोर्ट किया, जबकि भारत से उसका इम्‍पोर्ट मात्र 16.34 बिलियन डॉलर रहा था। ऐसे में भारत का विरोध मोल लेकर वह कारोबारी बढ़त नहीं गंवाना चाहेगा। 

 

3- अमेरिका से ट्रेड वार 
चीन इस समय अमेरिका के साथ ट्रेड वार चल रहा है। ये वो तीसरी चीज जिसने चीन को भारत के पास आने को मजबूर किया है। दुनिया का दूसरा बड़ा कन्‍ज्‍यूमर बेस होने के साथ ही भारत वर्ल्‍ड इकोनॉमी का बड़ा प्‍लेयर है। चीन के सरकारी अखबार ग्‍लोबल टाइम्‍स की रिपोर्ट के मुताबिक, अगर दुनिया के पुराने जियो पॉलिटिकल ढांचे को बदलना है तो भारत और चीन को साथ-साथ काम करना होगा। चीन अमेरिका की दादागीरी खत्‍म करना चाहता है, लेकिन उसे पता है कि वह भारत की मदद के बिना नहीं कर सकता है।   

 

 

भारत को चीन की जरूरत 

 

1- एनर्जी सिक्‍युरिटी 


भारत इस समय तेजी के साथ अपनी इकोनॉमी को पेट्रोलियम आधारित इकोनॉमी से रीन्‍यूएबल एनर्जी बेस्‍ड इकोनॉमी में तब्‍दील करना चहता है। दोनों देशों को अपनी जरूरत का बड़ा पेट्रोलियम अरब देशों से इम्‍पोर्ट करना पड़ता है। दोनों देशों ने हाल में मिलकर एक क्रूड बास्‍केट बनाने पर विचार शुरू किया है। दोनों इस समय क्रूड के सबसे बड़े इम्‍पोर्टर हैं। दुनिया का तीसरा बड़ा इम्‍पोर्टर जापान भी महंगे क्रूड के मसले पर भारत चीन के सुर में सुर मिला रहा है। ऐसे में भारत को लगता है कि चीन के साथ वह पेट्रोलिमय ऑर्डर को बदल सकता है। 

 

2- ब्रिक्‍स, शंघाई सहयोग संगठन और आसियान 
भारत और चीन इस कई मंचों पर एक साथ काम कर रहे हैं। इसमें दोनों देशों को फायदा है। इसमें ब्रिक्‍स, शंघाई सहयोग संगठन और आसियान का नाम अहम है। ऐसे में दोनों देशों की अनबन इन बड़े मंचों को भी प्रभावित करेगी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण डोकलाम के समय देखा गया था, जब ब्रिक्‍स सम्‍मेलन से ठीक पहले करीब 70 दिनों को गतिरोध खत्‍म करते हुए भारत और चीन की सेनाएं पीछे हटने को राजी हो गई थीं। प्रोफेसर भारतद्वाज के मुताबिक, जब आप कई मंचों पर एक साथ काम कर रहे हों, तो मौजूदा जियो पॉलिटिकल ऑर्डर को देखते हुए आपको छोटे मोटे मतभेद भुलाकर आगे बढ़ना ही होता है। 

 

आगे पढ़ें- ऐसे मसलों के बारे में जहां भारत चीन एक साथ हैं... 

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