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चीन के 1.50 लाख करोड़ को इस वर्ल्ड लीडर ने मारी ठोकर, भारी पड़ा मोदी का दांव

तीन महीने पहले की थी मोदी से मुलाकात, अब कहा-हमें नहीं चाहिए चीन का पैसा

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नई दिल्ली. श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे देशों से सबक लेते हुए मलेशिया ने भी अब चीनी कर्ज के जाल से बचने का फैसला ले लिया है। मलेशिया के नए प्रधानमंत्री महातिर मुहम्मद ने वन रोड एंड वन बेल्ट (OROB)के तहत चल रहे चीनी प्रोजेक्ट को अब दूसरा झटका दे दिया है। महातिर मुहम्मद ने चीनी कंपनी ओर से करीब 100 अरब डॉलर की मदद से बसाई जाने वाले वाले फॉरेस्ट सिटी टाउनशिप प्रोजेक्ट पर सख्ती कर दी है। महातिर ने इस प्रोजेक्ट को डेवलप करने वाली चीनी कंपनी कंट्री गोल्डेन होल्डिंग से साफ कहा दिया है कि यहां जो भी घर बनेंगे, कंपनी उसे विदेशियों को नहीं बेच सकेगी। यही नहीं विदेशियों को इस टाउनशिप में लंबे समय तक बसने की भी इजाजत नहीं होगी। कंपनी यहां करीब 700,000 लोगों के लिए टाउनशिप बनाना चाहती थी। 

1.5 लाख करोड़ के प्रोजेक्ट को मारी ठोकर 

बता दें कि महातिर सरकार अपने देश में जारी करीब 22 अरब डॉलर (1.5 लाख करोड़ भारतीय रुपए) के चीनी प्रोजेक्ट को जुलाई में बंद करने  का फैसला किया था। मोलेशिया में महातिर मुहम्मद की नई सरकार के आने के बाद चीन को मिला यह पहला झटका था। बता दें कि चीन समर्थित इन परियोजनाओं को पूर्व की नजीब रजक सरकार ने अपनी मंजूरी दी थी।  

 

हमें नहीं चाहिए चीन का पैसा 
महातिर ने कहा कि उनकी सरकार देश की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए यह कदम उठाने जा रही है। इन परियोजनाओं में एक ईसीआरएल (ईस्ट कोस्ट रेल लिंक) है। इसके तहत मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर से थाइलैंड के दक्षिणी हिस्से को रेलमार्ग से जोड़ा जाना था। बाकी दो परियोजनाएं गैस पाइपलाइन से संबंधित थीं। महातिर ने कहा कि ये परियोजनाएं बहुत खर्चीली हैं। हमारा देश इस कर्ज को अभी झेल नहीं सकता। वैसे भी हमें अभी इनकी जरूरत नहीं है।' मलेशिया पर 250 अरब डॉलर (करीब 17.5 लाख करोड़ रुपये) का कर्ज है। महातिर चाहते हैं कि पहले पुराना कर्ज उतारा जाए।

 

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पीएम मोदी ने 3 महीने पहले किया था दौरा 

महातिर मुहम्मद के पीएम बनने के कुछ ही दिनों बाद प्रधानमत्री नरेंद्र मोदी ने मलेशिया का दौरा किया था। इस दौरान दोनों नेताओं ने आपसी सहयोग को नए लेवल पर ले जाने पर सहमित जताई थी। बता दें कि मोदी खास तौर पर महातिर से मुलाकात के लिए मलेशिया गए थे। भारत और मलेशिया के बीच बड़ी सामरिक साझेदारी भी रही है। विदेश मंत्रालय के अनुसार- मलेशिया भारत की लुक ईस्ट पॉलिसी का अहम किरदार है। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी महातिर से मिलने वाले शुरुआती वर्ल्ड लीडर्स में से एक थे। 

 

 

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काम कर गई मोदी की पॉलिसी  

 

मलेशिया साउथ ईस्ट एशिया में मौजूदा प्रमुख आसियान देशों में है। एक समय आसियान देशों के इकोनॉमी के इंजन के रूप में काम करने वाली मलेशियाई सरकार अन्य साथी देशों की तरह दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते असर को कम करने के लिए भारत से सहयोग की इच्छुक रही रही हैं। इसी के चलते मोदी सरकार ने लुक ईस्ट पॉलिसी पर फोकस किया है। हाल में भारत ने मलेशिया समेत तमान आसियान देशों के साथ कई तरह के कारोबारी करार भी किए हैं। एक सॉफ्ट पावर और पुराने कल्चरल रूट के चलते ये देश भारत के साथ कारोबार और प्रोजेक्ट शुरू करने को लेकर ज्यादा उत्सुक रहे हैं। यही कारण है कि भारत और आसियान देशों के बीच कारोबार बढ़ा है। वहीी चीन के साथ मलेशिया की दूसरी बढ़ी है। 

 

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कई देशों के लिए मुसीबत बन चुका है चीन का कर्ज
बता दें कि चीन का कर्ज कई देशों के लिए मुसीबत बनना जा रहा है। इसमें श्रीलंका, बांग्लादेश, कंबोडिया, नाइजीरिया और कई लैटिन अमेरिकी देश भी शामिल हैं। अमेरिका समेत कई पश्चिमी देशों का आरोप है कि चीन पहले तो बेहद आसान शर्तों पर कर्ज बांटता था। हालांकि ऊंची ब्याजदर और इकोनॉमी में ग्रोथ पोटेंशियल नहीं होने के चलते छोटे देश अक्सर इसकी चपेट में आ जाते हैं। इसके बाद चीन अपनी शर्तों पर उन देशों से कांट्रैक्ट हासिल करता है। इसी के चलते श्रीलंका को न चाहते हुए भी हम्बनटोटा बंदरगाह चीन को करीब 100 सालों के लिए पट्‌टे पर देना पड़ा और नाइजीरिया को ताइवान के साथ अपने डिप्लोमैटिक रिलेशन तोड़ने पड़े। 

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