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पाक की तरह यहां भी अपने लाखों नागरिक बसाना चाहता था चीन, बुजुर्ग लीडर ने दे दिया झटका

मलेशियाई पीएम महातिर मुहम्मद ने कहा- विदेशियों को नहीं देंगे बसने की इजाजत

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नई दिल्ली.  वन रोड एंड वन बेल्ट (OROB) के तहत अपने देश में चल रहे  1.5 लाख करोड़ रु के प्रोजेक्ट को ठोकर मारने के बाद मलेशिया के 93 साल के बुजुर्ग प्रधानमंत्री महातिम मुहम्मद ने हाल में चीन को एक और झटका दे दिया है। दरअसल चीन मलेशिया में अपने करीब 7 लाख नागरिकों के लिए अलग से एक टाउनशिप बनाना चाहता था, पर महातिम मुहम्मद ने इसमें सख्ती कर दी है। चीनी कंपनी ओर से करीब 100 अरब डॉलर की मदद से यह एक पूरी टाउनशिप बसाई जा रही है। इसे फॉरेस्ट सिटी टाउनशिप प्रोजेक्ट कहा जा रहा है। 

नहीं देंगे विदेशियों को बसने की इजाजत 

महातिर मुहम्मद ने की सरकार ने इस प्रोजेक्ट को डेवलप करने वाली चीनी कंपनी कंट्री गोल्डेन होल्डिंग से साफ कहा दिया है कि यहां जो भी घर बनेंगे, कंपनी उसे विदेशियों को नहीं बेच सकेगी। यही नहीं विदेशियों को इस टाउनशिप में लंबे समय तक बसने की भी इजाजत नहीं होगी। कंपनी यहां करीब 7,00,000 लोगों के लिए टाउनशिप बनाना चाहती थी। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह कदम चीनी कंपनी के लिए झटके से कम नहीं है, क्योंकि अब वह इतना आगे बढ़ चुकी है कि वह इस प्रोजेक्ट से बाहर भी नहीं निकल सकती है। 

 

पाकिस्तान की तरह कॉलोनी बनना चाह रहा था चीन 
बता दें कि ठीक इसी तरह की कॉलोनी चीन पाकिस्तान में भी बसा रहा है।  पाकिस्तान में चल रहे चाइना पाक इकोनॉमिक कॉरिडोर प्रोजेक्ट यानी सीपीईसी के लिए चीन ने यह  प्लान बनाया है। उसने पाकिस्तान में अपने 5 लाख नागरिकों को बसाने का फैसला किया है। चीन सरकार इसके लिए ग्वादर के पास पूरा नया शहर बनाएगी। इस शहर में सिर्फ चीनी नागरिकों को ही रहने की इजाजत होगी। जानकारों को आशंका है कि चीन जिस तरह से अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा है, उस तरह पाकिस्तान, ब्रिटेन के बाद अब चीन का उपनिवेश नहीं बन जाए। इसे चीन के साम्राज्यवाद से जोड़कर देखा जा रहा है। बता दें कि चीन इससे पहले अफ्रीका और मध्य एशिया में भी कुछ इस तरह की कॉलोनी बसा चुका है।

 

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मलेशिया को भी था इसी बात का डर 
बता दें पूर्व की नजीब रजक सरकार के दौरान मलेशिया में चीन की गतिविधियां बढ़ीं थीं। वह मलेशिया में कनेक्टिविटी से जुड़ी कई परियोजनाओं पर काम कर रहा था। इसमें से एक परियोजना ईसीआरएल (ईस्ट कोस्ट रेल लिंक) थी। करीब 20 अरब डॉलर की इस परियोजना के तहत मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर से थाइलैंड के दक्षिणी हिस्से को रेलमार्ग से जोड़ा जाना था। बाकी दो परियोजनाएं गैस पाइपलाइन से संबंधित थीं। नई महातिर मुहम्मद सरकार ने चीन की इन दोनों परियोजनाओं से निकलने का फैसला किया। महातिर ने कहा कि ये परियोजनाएं बहुत खर्चीली हैं। हमारा देश इस कर्ज को अभी झेल नहीं सकता। वैसे भी हमें अभी इनकी जरूरत नहीं है। मलेशिया पर 250 अरब डॉलर (करीब 17.5 लाख करोड़ रुपए) का कर्ज है। इसमें बड़ा हिस्सा चीन का है। महातिर चाहते हैं कि पहले पुराना कर्ज उतारा जाए। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश, श्रीलंका और कंबोडिया जैसे देशों को हाल देखते हुए मलेशिया चीन के कर्ज से डर रहा है। 

 

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कई देशों के लिए मुसीबत बन चुका है चीन का कर्ज
बता दें कि चीन का कर्ज कई देशों के लिए मुसीबत बनना जा रहा है। इसमें श्रीलंका, बांग्लादेश, कंबोडिया, नाइजीरिया और कई लैटिन अमेरिकी देश भी शामिल हैं। अमेरिका समेत कई पश्चिमी देशों का आरोप है कि चीन पहले तो बेहद आसान शर्तों पर कर्ज बांटता था। हालांकि ऊंची ब्याज दर और इकोनॉमी में ग्रोथ पोटेंशियल नहीं होने के चलते छोटे देश अक्सर इसकी चपेट में आ जाते हैं। इसके बाद चीन अपनी शर्तों पर उन देशों से कांट्रैक्ट हासिल करता है। इसी के चलते श्रीलंका को न चाहते हुए भी हम्बनटोटा बंदरगाह चीन को करीब 100 सालों के लिए पट्‌टे पर देना पड़ा और नाइजीरिया को ताइवान के साथ अपने डिप्लोमैटिक रिलेशन तोड़ने पड़े। 

 

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