ट्रेड वार: ट्रंप का भारत पर एक और प्रहार, अमेरिका से लौटने के मजबूर हो जाएंगे सैकड़ों प्रोफेशनल्स 

भारत-अमेरिका के बीच चल रहे ट्रेड वार में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक और प्रहार किया है। उन्होंने अमेरिका नौकरी पर जाने वाले भारतीयों के लिए वीजा शर्तें इतनी कड़ी की हैं कि भारतीय कंपनियां TCS, Infosys, Wipro आदि नौकरी देने से ही कतराने लगी हैं। आईटी कंपनियों ने अमेरिका में भारतीयों के लिए नौकरी के अवसर कम कर दिए हैं। शीर्ष 30 कंपनियों में से छह भारतीय कंपनियों ने लगभग दो-तिहाई वीजा नकार दिए हैं। इसका फायदा अमेरिकन कंपनियों अमेजन आदि को मिल रहा है। 

money bhaskar

Mar 08,2019 01:32:00 PM IST

नई दिल्ली. भारत-अमेरिका के बीच चल रहे ट्रेड वार में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक और प्रहार किया है। उन्होंने अमेरिका नौकरी पर जाने वाले भारतीयों के लिए वीजा शर्तें इतनी कड़ी की हैं कि भारतीय कंपनियां TCS, Infosys, Wipro आदि नौकरी देने से ही कतराने लगी हैं। आईटी कंपनियों ने अमेरिका में भारतीयों के लिए नौकरी के अवसर कम कर दिए हैं। शीर्ष 30 कंपनियों में से छह भारतीय कंपनियों ने लगभग दो-तिहाई वीजा नकार दिए हैं। इसका फायदा अमेरिकन कंपनियों अमेजन आदि को मिल रहा है।

नौकरियों का इतना नुकसान

एक अमेरिकी थिंक टैंक सेंटर फॉर इमिग्रेशन स्टडीज ने एच -1 बी (H-1B) विश्लेषण किया तो चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। इसके मुताबिक ट्रम्प प्रशासन ने वीजा की प्रक्रियाओं को बहुत सख्त कर दिया है जो कि भारत की बजाय अमेरिकी आईटी कंपनियों के पक्ष में है। इससे भारतीय आईटी कंपनियां जैसे कि टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस, TCS), कॉग्निजेंट ( congnigant)और इंफोसिस (Infosys) को वर्ष 2018 के दौरान H-1B वीजा के विस्तार के ज्यादातर आवेदन अस्वीकार करना पड़ा। भारत की शीर्ष आईटी सेवा कंपनियां इंफोसिस और टीसीएस सबसे अधिक प्रभावित हुईं। बंगलुरु स्थित इन्फोसिस ने 2,042 और TCS 1,744 ने आवेदन नामंजूर किए। अमेरिका में मुख्यालय बनाने वाली कॉग्निजेंट ने 3548 आवेदन रद्द किए जबकि इसके अधिकांश कर्मचारी भारत में हैं। रिपोर्ट के मुताबिक शीर्ष 30 कंपनियों में अकेले छह भारतीय कंपनियां TCS, Infosys, Wipro कॉग्निजेंट, टेक महिंद्रा और HCL टेक्नोलॉजीज ने लगभग दो-तिहाई आवेदन रद्द किए हैं। इस मामले में टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और कॉग्निजेंट ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

यह है एच 1 बी वीजा


अमेरिका में नौकरी पर जाने के लिए एच -1 बी (H-1B) एक्सटेंशन वीजा होता है। यह प्रौद्योगिकी पेशेवरों द्वारा उपयोग किया जाता है जो शुरू में तीन साल के लिए एक समान अवधि के एक्सटेंशन के विकल्प के साथ दिया जाता है।

भारत की छह कंपनियों से ज्यादा वीजा अमेजन के


सेंटर फॉर इमिग्रेशन स्टडीज ने 6 मार्च को किए गए अपने अध्ययन में बताया कि माइक्रोसॉफ्ट, अमेज़ॅन और एपल जैसी प्रमुख यूएस-आधारित फर्मों ने अपने H-1B वाले कर्मचारियों की संख्या में इजाफा किया जबकि बड़ी भारतीय फर्मों जैसे कॉग्निजेंट, टाटा और इन्फोसिस ने शुद्ध कटौती की। वर्ष 2018 में भारत की छह बड़ी फर्मों को सिर्फ 16% या 2,145, एच -1 बी वर्क परमिट मिले जो कि अमेजन के 2,399 वीजा से कम हैं।

गूगल, इंटेल में भारतीय कंपनियों के मुकाबले ज्यादा मौके

ट्रंप चाहते हैं कि भारतीय कंपनियों के मुकाबले अमेरिकन कंपनियों को ज्यादा मौके मिले। इसलिए एच 1 बी वीजा में अमेरिकन कंपनियों के लिए आसान शर्तें रखी गई हैं। इसी का नतीजा यह है कि एक अमेरिकी थिंक टैंक नेशनल फाउंडेशन फ़ॉर अमेरिकन पॉलिसी द्वारा अप्रैल 2018 के अध्ययन में कहा गया है कि अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट, इंटेल और गूगल वर्ष 2017 में H-1B वीजा में शीर्ष 10 नियोक्ताओं में शामिल थे। इसके विपरीत शीर्ष सात भारतीय आईटी सेवा फर्मों ने 2017 में 14,792 से 2017 में वीजा में 8,468 की गिरावट देखी। यही नहीं, जनवरी 2019 में अमेरिका ने एक नया नियम प्रभावी किया। इसके तहत अप्रैल से 65,000 एच -1 बी वीजा की लॉटरी के लिए अमेरिकी के डिग्री धारकों को तरजीह मिलेगी। इसका मतलब यह हुआ कि भारतीय आईटी सेवा कंपनियों की तुलना में भारतीय प्रतिभाओं की तलाश करने वाली अमेरिकी कंपनियों का ज्यादा पक्ष लिया जाएगा।


सिंगापुर व आस्ट्रेलिया का भी यही रवैया


नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज (नैसकॉम) के वैश्विक व्यापार विकास के प्रमुख शिवेंद्र सिंह ने कहा कि आंकड़े यह भी कहते हैं कि अमेरिका में कौशल की कमी है। अगर इस खाई को पाटने की प्रक्रिया को चुनौती मिलती है, तो यह अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने वाला है। यह ऐसी चीज है जिसे वे पिछले कुछ समय से उजागर कर रहे हैं। आउटसोर्सिंग उद्योग के विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिकी कंपनियों के पक्ष में वाशिंगटन का यह रुझान नया नहीं है। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी यही करने की कोशिश की थी। वे अपने देश की कंपनियों के लिए संरक्षणवाद को प्रोत्साहित करते थे। सिर्फ अमेरिकी ही नहीं बल्कि सिंगापुर व आस्ट्रेलिया आदि में भी संरक्षणवाद का प्रोत्साहन मिल रहा है।

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