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खास खबर: भारत से कारोबार पर कब तक चलेगी चीन की दादागीरी ?

चीन के साथ सिर्फ भारत ही कारोबारी घाटे में नहीं है। अमेरिका से लेकर यूरोपीय यूनियन तक इसी समस्‍या से जूझ रहे हैं।

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नई दिल्‍ली। भारत-चीन के बीच 11वीं ज्‍वाइंट इकोनॉमिक ग्रुप (JEG) की मीटिंग सोमवार को खत्‍म हो गई। पर्दे के पीछे से जो बात निकल कर आई है, उसके मुताबिक, इस मीटिंग को लेकर दोनों देश दि्वपक्षीय बयान पर नहीं सहमत हो पाए। दरअसल चीनी अधिकारी भारतीय अधिकारियों को इस बात का जवाब नहीं दे पाए कि आपसी कारोबार में भारत के 51 अरब डॉलर के घाटे को चीन की सरकार कैसे पूरा करेगी। यह पहली बार नहीं है जब चीन ने आपसी कारोबार में भारत के घाटे को पूरा करने के सवाल पर आड़ा तिरछा जवाब दिया है। कारोबारी घाटे को पूरा करने के लिए भारत पिछले 10 साल से फॉर्मा, जेम्‍स एंड ज्‍वैलरी और IT जैसे सेक्‍टर चीन से खोलने की बात कर रहा है, लेकिन चीन है कि मानता नहीं। बड़ा सवाल यह है कि आखिर चीन का इरादा क्‍या है। ऐसा कौन सा पेच है, जिसे भारत निकाल नहीं पा रहा और चीन हर बार उसके सामने बहाने बनाकर निकल जाता है। 

 

एक दशक से भारतीय कपनियों के लिए बंद हैं दरवाजे 
इसके पीछे एक कारण नहीं है। इसमें चीन की कॉम्पिटेंट प्राइस, चालबाजी और हमारी नाकामी सब एक साथ काम कर रही हैं। इंटरनेशनल ट्रेड पर नजर रखने वाले जेएनयू के प्रोफेसर विश्‍वजीत धर के मुताबिक, चीन के साथ सिर्फ भारत ही कारोबारी घाटे में नहीं है। अमेरिका से लेकर यूरोपीय यूनियन तक इसी समस्‍या से जूझ रहे हैं। चीन ने एक तरफ तो अपने प्रोडक्‍ट्स को ग्‍लोबल मार्केट से भी सस्‍ता बनाकर रखा है, वहीं दूसरी ओर नॉन टैरिफ बैरियर्स लगाकर ऐसे प्रोडक्‍ट्स को अपने मार्केट में इंट्री नहीं करने देता, जिसमें वह पीछे है। फार्मास्युटिकल एक्‍सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ऐसा नहीं है कि चीन ने फॉर्मा सेक्‍टर को प्रवेश देने से मना कर दिया है। हालांकि उन्‍होंने पिछले 1 दशक से लटका कर रखा है। इरादा साफ है कि वो अपनी डोमेस्टिक इंडस्‍ट्री को प्रोटेक्‍ट करना चाहते हैं। 

 

भारत के प्रोडक्‍ट के लिए दरवाजे नहीं खोल रहा चीन 
भारत सरकार लंबे समय से अपने कई प्रोडक्‍ट के लिए चीनी मार्केट में प्रवेश की अनुमति मांग रही है। इसमें फॉर्मा, जेम्‍स एंड ज्‍वैलरी और आईटी सेक्‍टर का नाम शामिल है। भारतीय फॉर्मा एक्‍सपोर्टर्स के 240 से अधिक अप्‍लीकेशन चीन के पास लंबित पड़े हुए हैं। हालांकि चीन की सरकार अपना मार्केट खोलने को तैयार नहीं दिख रहा है।   

 

वक्‍त के साथ बढ़ता गया घाटा 
भारत और चीन के बीच कारोबार की बात करें तो साल दर चीन के साथ हमारा व्‍यापार घाटा बढ़ाता ही रहा है। आकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो यह 2012-13 के 36.21 अरब डॉलर के मुकाबले अब 2016-17 में 51 अरब डॉलर पहुंच गया है। अगर सिर्फ 2017 की बात करे तो दोनों देशों के बीच करीब 84.4 अरब डॉलर का ट्रेड हुआ और इसमें भारत का घाटा करीब 51.75 अरब डॉलर का रहा।

 

क्‍या भारत इस घाटे को पूरा नहीं कर सकता है? 


धर के मताबिक, ऐसा नहीं है कि भारत इस घाटे को भरने में सक्षम नहीं है। लेकिन अभी यह चीन की शर्तों पर ही होगा। चीन फॉर्मा, जेम्‍स एंड ज्‍वैलरी और आईटी जैसे सेक्‍टर में अपना मार्केट खोले तो भारत इस घाटे को काबू कर सकता है। दरअसल इन तीनों सेक्‍टर में हम ग्‍लोबल पॉवर हैं। चीन ऐसा करने के मूड में नहीं दिख रहा। हां अगर भारत को इस घाटे को पूरा करना है, तो चीनी मार्केट को कॉम्‍पीट करना ही होगा। इसके लिए पॉलिसी बनाने के साथ इम्‍प्‍लीमेंटेशन पर जोर देना होगा। हमें उनसे सस्‍ती मैन्‍यूफैक्‍चरिंग करनी होगी।    

 

आखिर क्‍या है चीन का इरादा ?  


धर के मुताबिक, चीन के साथ हम सिर्फ द्विपक्षीय वार्ताओं में मुद्दा उठाकर कारोबारी घाटा पूरा नहीं कर सकते हैं। दरअसल चीन हमेशा कारोबार में सरप्‍लस रहना चाहता है। इसके लिए चीनी सरकार करंसी के डिवैल्‍यूएशन से लेकर इनडायरेक्‍ट इन्‍सेन्टिव्‍स जैसे क‍दम उठाती है। एक्‍सपोर्ट बेस्‍ड इकोनॉमी होने के चलते सरकार का इसपर खास फोकस होता है। अमेरिका के साथ भी उनका यही  पेच है। 

 

अागे पढ़ें- क्‍योंं मात खा रहा भारत  

 

 

आखिर क्‍यों मात खा रहा है भारत 

 

1: सस्‍ती मैन्‍यूफैक्‍चरिंग 
चीन मैन्‍यूफैक्‍चरिंग में आज सुपर पॉवर है। वहां लागत कम पड़ती है। खुद का घरेलू मार्केट भी बड़ा है। इसके चलते वहां बल्‍क प्रोडक्‍शन होता है। यही कारण है कि वह ग्‍लोबल मार्केट में प्राइस से कॉम्‍पीट करते हैं और हम उन्‍हें टक्‍कर नहीं दे पाते हैं।  

 

2 : सस्‍ता स्किल्‍ड वर्कफोर्स 
चीन ने 1950 के दशक से ही शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य पर विशेष ध्‍यान दिया। इसके चलते आज उनके बड़े पैमाने पर सस्‍ता और स्किल्‍ड वर्कफोर्स है। हमारा एजुकेशन सिस्‍टम ऐसा वर्कफोर्स पैदा करने में अब भी नाकाम है।  

 

3: फास्‍ट पॉलिसी इम्प्लिमेंटेशन 
धर के मुताबिक, चीन में डेमोक्रेटिक सेटअप नहीं है। इसके चलते वहां पॉलिसी इम्प्लिमेंटेंशन हमारे मुकाबले तेज है। हमारे देश में पॉलिसी बनाने में ही 4 से 5 साल लग जाते हैं। इतने समय में चीन की सरकार रिजल्‍ट देने शुरू कर देती है। 

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