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खास खबर: इतिहास नहीं अब इकोनॉमी है भारत-रूस दोस्ती की कड़ी, पुतिन करेंगे मजबूत

नई दिल्‍ली। आजादी के बाद से रुस भारत का सबसे भरोसेमंद दोस्त माना गया है। चाहे भारत में पीएसयू का गठन हो या फिर पंचवर्षीय योजनाएं कहीं न कहीं वह रुस के प्रभाव में रही है। लेकिन बढ़ते उदारीकरण ने 90 के दशक के बाद अमेरिका से भारत की नजदीकी, कहीं न कहीं यह सवाल उठाने लगी है कि क्या अब भी रुस भारत का भरोसेमंद दोस्त है। हाल ही में रुस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन के चौथी राष्ट्रपति चुनने के बाद सवाल फिर उठने लगे हैं। वह इसलिए है, क्योंकि पिछले कार्यकाल में रुस की पाकिस्तान से लेकर चीन से दोस्ती मजबूत हुई है।

 

पिछले 70 साल में अब भारत-रुस की दोस्ती ऐतिहासिक की जगह इकोनॉमी की जरुरतों पर ज्यादा निर्भर है। चाहे ब्रिक्स संगठन मजबूत करने की बात हो या फिर शंघाई कॉरपोरेशन में भारत की भूमिका बढ़ाने या फिर डोकलाम विवाद में चीन को समझाने की हो, पिछले दिनों रूस ने भारत की बढ़ती इकोनॉमी की महत्व को समझा है। आज की खास खबर में जानते हैं कि ऐतिहासिक दोस्ती कैसे इकोनॉमिक दोस्ती में मजबूत होती जा रही है।

 

हमने इस बारे में जेएनयू में रसियन स्‍टडी सेंटर में प्रोफेसर राजन कुमार से बात की। राजन के मुताबिक, भारत को लेकर रूस की नीति साफ रही है। भारत ब्रिक्‍स का अहम हिस्‍सेदार है। चीन का बढ़ता असर भी दोनों देशों को नजदीक रखेगा। ऐसे में आने वाले समय में पुतिन के लिए भारत की और भारत के लिए पुतिन की अहमियत बनी रहेगी।   
 

भारत रूस ट्रेड का क्‍या होगा ? 
सोवियत यूनियन के दौर से ही भारत और रूस बड़े ट्रेड पार्टनर रहे हैं। 1990 के दौर में सोवियत यूनियन भारतीय एक्‍सपोर्ट का सबसे बड़ा बाजार था। वर्ल्‍ड इंटीग्रेटेड ट्रेड डाटा (WITS) के मुताबिक, उस दौर में भारत का सोवियत यू‍नियन को एक्‍सपोर्ट करीब 2.9 अरब डॉलर का रहा। पुतिन के दौर की बात करे तो भारत का कारोबार लगातार बढ़ता रहा है। 2016-17 में भारत ने रूस को करीब 1.92 अरब डॉलर का एक्‍सपोर्ट किया, जबकि 2007-08  में यह 0.94 अरब डॉलर था। रूस की ओर से भारत को किए जाने एक्‍सपोर्ट की बात करें तो यह 2007-08 में यह जहां 2.4 अरब डॉलर था, वहीं 2016-17 में बढ़कर करीब 5.5 अरब डॉलर पहुंच गया। 

 

डिफेंस डील का क्‍या होगा? 
यह सच है कि भारत फ्रांस और अमेरिका जैसे देशों के साथ डिफेंस सेक्‍टर में रिलेशन बढ़ा रहा है। इन सबके बाद भी रूस  भारत का बड़ा डिफेंस पार्टनर बना हुआ है। अमेरिका के साथ परमाणु समझौता होने के बाद आज तक किसी अमेरिकी कंपनी ने भारत में निवेश नहीं किया। इस बीच रूस कुडनकुलम में कई परियाजनाओं को पूरा कर चुका है। भारत 5 अरब डॉलर की मदद से रूस के साथ S-400 ट्रम्‍प डिफेंस सिस्‍टम खरीद रहा है। दोनों देश मिलकर कोमोव हेलिकॉप्‍टर बना रहे हैं। भारत ने 2015 में करीब 2 अरब डॉलर के हथियारों का इम्‍पोर्ट रूस से ही किया है।  

 

क्‍या होगा भारत रूस के रिश्‍तों का भविष्‍य? 
पुतिन का फिर से चुनाव जीतना एक तरह से भारत के हित में हैं। भारत और रूस लंबे समय से एक दूसरे के सहयोगी रहें हैं। खुद पीएम मोदी और पुतिन दोनों देशों के रिश्‍तों को लेकर पॉजिटिव हैं। भारत को लेकर रूस की पॉलिसी में हमेशा से एक क्‍लैरिटी रही है। अमेरिका के नजदीक जाने के बाद भी ऐसा कोई मौका नहीं आया जब भारत रूस में मतभेद दिखे हों। ऐसे में उम्‍मीद की जा सकती है आने वाले दिनों में भारत-रूस साथ चलते रहेंगे। नए साल पर मोदी ने जिन नेताओं को शुरुआती शिष्‍टाचार फोन किए, उसमें पुतिन का नाम सबसे आगे था। 

 

चीनपाक से रूस की दोस्‍ती भारत के लिए कितनी सही? 
ये सच है कि हाल के दौर में रूस चीन और पाक दोनों के नजदीक गया है, लेकिन इसका भारत के रिश्‍तों पर कोई असर नहीं पड़ेगा। दरअसल अमेरिका और पश्चिमी विश्‍व को काउंटर करने के लिए चीन रूस की जरूरत है। पाकिस्‍तान उसी के जनदीक जाएगा, जिससे चीन की नजदीकी होगी। लेकिन इन सबका भारत फायदा उठा सकता है। जैसा किस डोकलाम गतिरोध के दौरान हुआ। रूस के प्रयासों के चलते ही चीन को यहां पांव खींचने पड़े थे, जबकि पहले उसका रूस बेहद आक्रामक था। 

 

पुतिन ब्रिक्‍स को कितना प्रभावित करेंगे? 
पुतिन एक बड़े नेता हैं। भारत और चीन का सीमा विवाद जगजाहिर है, उसके बाद भी अगर ब्रिक्‍स या संघाई सहयोग परिषद के मंच पर भारत और चीन एकसाथ काम कर रहे हैं तो उसके पीछे रूस का बड़ा रोल है। दोनों मंचों पर रूस चीन को यह समझाने में कामयाब रहा है कि भारत को इग्‍नोर करके इन फोरर्म्‍स को सफल नहीं बनाया जा सकता है। 

 

पुतिन ग्‍लोबल मंचों पर कितने मददगार होंगे? 
ट्रम्प के सत्‍ता में आने के बाद अमे‍रिकी नीतियों पर एतबार थोड़ा मुश्किल हुआ है। अगर कश्‍मीर को लेकर ही बात करें तो अमेरिका का इसपर एक जैसा सुर कभी नहीं रहा। रूस पहले दिन से इसे कश्‍मीर को भारत का हिस्‍सा बताता रहा है। रूस की नीतियों में यह क्‍लैरिटी भारत के हित में आगे भी होगी। भारत के सामने एनएसजी में सदस्‍यता पाने की चुनौती है। रूस भारत की खुलकर तरफदारी करता रहा है। बड़े देशों में सिर्फ चीन भारत का विरोध कर रहा है। भारत अगर डिप्‍लोमेटिक प्रयास करे तो रूस चीन को राजी कर सकता है। 

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